आज पीडीपी कश्मीर घाटी में अपने ही ‘सेल्फ रूल’ के गोरख धन्धे में फंसती दिख रही है

27 Jan 2016 17:12:45


दया सागर

1990 की त्रासदी के बाद भी केंद्र ने जमीनी स्तर पर जम्मू कश्मीर के प्रति अपनी न निति बदली थी और न ही अपने सलाहकारों की श्रेणी वदली थी. यह भी एक मुख्य कारण है कि प्रिथिक्ताबादी विचारों की परिभाषा और असर जम्मू कश्मीर  राज्य में, ख़ास कर के कश्मीर घाटी में, काफी हद तक साल 1947 में जो था  उस से आज के दिन स्थिति काफी वदल चुकी है. पहले भी जम्मू कश्मीर से संबंधित सामाजिक , प्रशासनिक और राजनीतिक विवादों को  ‘कश्मीर विवाद’ से जोड़ कर इस राज्य में लोगों और वाहरी दुनियां के सामने 1947 के भारत के विभाजन के बाद कुछ लोग रखते रहे हैं पर केन्द्र की असंवेदनशील नीतिओं के कारण जम्मू कश्मीर की समस्याओं को ‘कश्मीर विवाद’ के नाम पर 1947 में जम्मू कश्मीर के भारत के साथ हुए अधिमिलन से जोड़ कर देखा जाना आम जन के लिए साल 1999 आते –आते कोई ख़ास अनहोनी बात नहीं रह गई थी . अनुच्छेद -370 , ‘ऑटोनोमी’, भारत के जम्मू कश्मीर राज्य में इस राज्य के   स्थायी निबासी के इलावा भारत के अन्य नागरिकों के सिमित अधिकार  , जम्मू कश्मीर राज्य में स्थायी सम्पति , जम्मू कश्मीर राज्य के ध्वज चिन्ह   और जम्मू कश्मीर की वैधानिक प्रणाली को कुछ मुख्यधारा के कहे जाने बाले जन एवम दल  भी भारतीयता कम और भारत गणराज्य से सम्बिधानिक एवम राष्ट्रीयता की दृष्टि से दूरियां दीखाने के लिए ज्यादा प्रयोग करते रहे हैं  पर केंद्रीय सरकारों ने इस दिशा में आम जन के मन में पैदा होती जा रही शंकाओं और उलझनों को सुलझाने के लिए कुछ नहीं किया. अगर किया है तो बस आर्थिक अनुदान (ग्रांट्स) देने या कुछ नेताओं को लुभाने की कोशिश करने के इलावा कुछ खास नहीं किया . इसी बदले संधर्व में  साल 1998-99 में  मुफ़्ती मोहमद सईद ने पीडीपी के नाम से एक क्षेत्रीय दल की  नींब रख कर शेख अब्दुल्लाह की  नेशनल कांफ्रेंस की ‘अटोनोमी’ के मुकाबले  भारत गणराज्य से कश्मीर घाटी की कुछ अधिक दूरी दिखाते हुए अपने ‘सेल्फ रूल फ्रेमवर्क’ के साथ राजनीतिक प्रतिस्पर्धा में कदम रखा था.

जम्मू कश्मीर से लाखों कश्मीर घाटी के स्थनीय  हिन्दू परिवार साल 1990 में पाकिस्तान केन्द्रित  विचारधारा के वड़ते  प्रभाव और अपने को मुजाहिद कहने बाले अत्तंक्वादियों के दवाव से कश्मीर घाटी से पलायन कर गये थे और साल 1999 आने तक भी भारत सरकार उन को वापिस  ले जाने के लिए कुछ भी ठोस नहीं कर पाई थी. ऐसे हालात में भारत के साथ राष्ट्रियता  की स्पर्धा में लोगों को धकेलना किसी नए राजनीतिक दल के लिए उतना कठिन नहीं था. और जिस प्रकार से पीडीपी ने साल 2002 में  साल 1996 में विधानसभा में 87 में से करीब 60 सीटें लेनी बाली नेशनल कांफ्रेंस को सत्ता से वाहर निकाल दिया उस से साफ़ निष्कर्ष निकाला जा सकता था  कि ऐसे विचार जो इस रियासत को भारत नहीं भारत का एक  सहयोगी दिखाते हों कश्मीर घाटी में आम आदमी का ध्यान अपनी और खींच सकते हैं.

साल 2002 से साल 2008  तक कांग्रेस और  पीडीपी ने जम्मू कश्मीर में सरकार चलाई. इन 6 सालों में कभी भी राष्ट्रवादी तत्बों एवं विषयों  की ओर  केन्द्रीय नेत्रृत्व का ध्यान नहीं गया . पीडीपी ने अधिकारिक स्तर पर लिखित रूप में अपना सेल्फ रूल फ्रेम्बर्क भी साल 2008 में सब के सामने रख दिया था. पीडीपी के सेल्फ रूल से जम्मू कश्मीर की पूरी भारतीयता पर जरूर प्रश्न उठते थे क्यों कि इस में यह कहा गया है कि जम्मू कश्मीर के कुछ विषयों पर भारत और पाकिस्तान दोनों का कंट्रोल हो सकता है. यह दाबे से कहा जा  सकता है कि  उस समय की केन्द्र सरकार ने इस में कोई दोष नहीं देखा था यहाँ तक के जस्टिस सगीर अहमद वर्किंग  ग्रुप ( प्रधान मंत्री मन मोहन सिंह जी का पांचबां वर्किंग ग्रुप) ) ने अपनी रिपोर्ट में साल 2010 में सेल्फ रूल की बात करते हुए यह कहा कि  पीडीपी से उस को लिखित सेल्फ रूल का विवरण नहीं मिला है पर भारत सरकार को जव भी पीडीपी से सेल्फ रूल का विवरण मिले तो उस पर विचार करना चाहिए. वर्किंग ग्रुप कितना सम्वेधनशील था इस बात का अंदाजा इस बात से लगाएया जा सकता है कि  साल 2008 में ही पीडीपी अपने सेल्फ रूल फ्रेमवर्क  को सार्वजानिक कर चुकी थी और न ही सरकार ने यह रिपोर्ट मिलने के बाद इस को नजदीक  से देखने की कोशिश की थी और न ही सगीर अहमद वर्किंग ग्रुप ने अपना काम  संजीदगी से किया था.  इस प्रकार के भारत के नेताओं और सरकारों के आचरण से अगर जम्मू कश्मीर का कोई आम निबासी सेल्फ रूल जैसे सुझाव में कोई वुराई न देखे तो उस को भारत राष्ट्र की दृष्टि से दोषी ठहराना किसी के लिए भी न्यायसंगत नहीं कहा जा सकता है. आज तक की केंद्र सरकारों और कांग्रेस जैसे दलों ने कश्मीर घाटी के आम जन को बैचारिक स्तर पर भारतीयता के आगोश से दूर ले जाने बाले विचारों और आन्दोलनों को पराजित करने को कभी भी सजीदगी से प्राथमिकता नहीं  दी है. राजनिति से ऊपर उठ कर इस राज्य में शांति और सद्भाव बनाए रखने के प्रयास वहुत कम हुए हैं और भारत सरकार ने अब तक इस राज्य में शंकाओं का निवारण सिर्फ आर्थिक प्रावधानों में देखने की गलती की  है. इससे बड़ी चिंता की बात और क्या हो सकती है कि आज 25 साल वाद भी भारत सरकार 1990 से घाटी के वाहर रह रहे कश्मीर घाटी के हिन्दू को उस के घर वापिस ले जाने के लिए सम्मानजनक निवास एवं जान-माल की सुरक्षा का विस्वास नहीं दिला पा रही है. जिस प्रकार की मानसिक और आर्थिक प्रताड़ना अपने ही देश में कश्मीरी माईग्रेंट्स 25 साल से  झेल रहे हैं उस को देखते हुए अगर वे अपना रोष कश्मीर घाटी के बहुसंख्यक समाज के धार्मिक उन्माद के नाम अपनी विपदाओं को जड़ कर व्यक्त करते है तो इस पर कश्मीर घाटी के आम बहुसंख्यक समाज को क्रोधित नहीं होना चाहिए. पर सरकार को भी इस विषय को प्राथमिकता देनी होगी नहीं तो विस्थापितों और बहुसंख्यक घाटी के परिवारों के बीच दूरियां और ग़लतफ़हमियाँ और बढती जायेंगी .  

जिस प्रकार से आज भी पाकिस्तान अधिकृत जम्मू कश्मीर के इलाकों को कश्मीर घाटी के समाचार पत्र, घाटी के बुद्धिजीवी, पीडीपी का सेल्फ रूल  और यहाँ तक के दिलीप पद्गओंकर की वार्ताकारों की टीम ने भी  पाकिस्तान प्रशासित जम्मूकश्मीर कहा है और कहते है  से साफ़ जाहिर होता है कि अगर भारत सरकार ने इस राज्य की समस्याओं को आर्थिक  प्रभ्दानों से ऊपर उठ कर नहीं देखा तो इस राज्य की दुविदाओं का अंत निकट भविष्य में नहीं दीखता है. साल 2015 में जम्मू कश्मीर में सत्ता में आने के लिए पीडीपी और बीजेपी ने यह कहते हुए अपना एजेंडा फार एल्लाएंस इस राज्य के लोगों के सामने रखा था कि उनकी सरकार का मूल उदेश्य  जम्मू कश्मीर राज्य के लोगों की  आर्थिक एवं वैचारिक प्रगति करना है. पर दोनों दल क्षेत्रीय विवादों में ज्यादा फंसे रहे और 7 जनबरी को मुफ़्ती मोहमद सईद जी के निदन के वाद आज बीजेपी तो जम्मू क्षेत्र में सबालों के घेरे में घिरी है महबूबा मुफ़्ती भी कश्मीर घाटी में अपने समर्थकों के प्रश्नों से चिंतित है.

डॉ फारूक अब्दुल्लाह की नेशनल कांफ्रेंस के कुछ नेताओं ने हो सकता है कभी 1947 में भारत के साथ हुए अधिमिलन पर ऊंगली उठाने  के संकेत दीये हों पर डॉ फारूक अब्दुल्लाह ने कभी भी अक्टूबर 1947 के भारत के साथ हुए अधिमिलन पर प्रश्न नहीं किए हैं और कई बार यहाँ तक कह दिया है कि जिन को  भारत अच्छा नहीं लगता है उन के लिए वे  भारत की अन्तरराष्ट्रीय सीमाएं खुलवा सकते हैं . भारत से ‘कश्मीर’ को दूर करने की बात करने बाले प्रथिक्तावादियों को जिस सख्ती से अकसर वे  ललकारते रहे हैं उतना तो कम से कम साल 2002 तक तो किसी ने नहीं ललकारा था. साल 2002 के बाद अगर कभी फारूक अब्दुल्लाह ने कुछ विरोधात्मक विचार व्यक्त किए भी हैं तो इस को वदले संधर्व में राजनीतिक मजबूरी कहा जा सकता है. जिस प्रकार के मर्जर और अधिमिलन के नाम पर उमर  अब्दुल्लाह ने साल 2010 के बाद प्रश्न खड़े किए हैं ऐसे तो फारूक अब्दुल्लाह ने साल 2010 से पहले कभी नहीं  किया. पर पीडीपी के लिए भी अव अपने सेल्फ रूल के नोरों से लोगों को भरमाना आसान नहीं होगा और महबूबा जी को नेशनल कांफ्रेंस से आगे रहने के लिए नई राह तलाशनी होगी नहीं तो अगर पीडीपी बीजेपी को छोड़ भी देती है तो  घाटी का वोटर उस से फिर भी यह सवाल कर सकता है की ‘कब आयेगा सेल्फ रूल ?” आज पीडीपी कश्मीर घाटी में अपने ही ‘सेल्फ रूल’ के गोरख धन्धे में फंसती दिख रही है.

हाँ यह भी एक तथ्य है कि भारत के राष्ट्रीय स्तर के दलों ने भी कभी भी जम्मू कश्मीर को राजनीतिक वोट के स्वार्थ से ऊपर उठ कर नहीं देखा है.

आज के दिन अगर कश्मीरियत को राष्ट्रीयता की तरह कुछ लोग देखने लगे हैं तो इस के लिए सिर्फ कश्मीर घाटी के कुछ स्थानीय नेताओं को दोषी नहीं ठहराएया सकता क्यों की राष्ट्रीय स्तर के नेताओं ने भी अकसर अपने व्यव्हार से या चुपी साध कर प्रतक्ष या अप्रतक्ष रूप में ऐसी सोच को नकारा नहीं है.

केन्द्र में बैठे लोगों को भी चिंतन करना होगा नहीं तो कश्मीर घाटी के वाहर से  और इस राज्य के अल्पसंख्यक वर्ग से भी जम्मू कश्मीर राज्य की भारत से दूरियां  दिखाने बाले प्रस्तावों के समर्थक वड सकते हैं.

( * दया सागर एक बरिष्ठ पत्रकार और जम्मू कश्मीर विषयों के अध्येता हैं )

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