सरफेसी के बाद अनुच्छेद 370?

30 Dec 2016 19:31:41

डॉ. शिवपूजन प्रसाद पाठक

भारत के सर्वोच्च न्यायालय  ने 16 दिसम्बर 2016 को जम्मू और काश्मीर के संदर्भ एक ऐतिहासिक निर्णय दिया जिसका प्रभाव दूरगामी होगा। इस निर्णय मेँ सर्वोच्च न्यायालय ने  जम्मू और काश्मीर मेँ नागरिकता, अनुच्छेद 370, संसद की शक्तियाँ व जम्मू और काश्मीर के संविधान की स्थिति के विषय मेँ स्पष्ट आदेश दिया। कुरियन जोशफ और आर एफ नारीमन न्यायाधीशों की दो सदस्यी खंडपीठ ने ‘स्टेट बैंक ऑफ इंडिया बनाम संतोष गुप्ता’ के वाद में कहा कि जम्मू और काश्मीर में भारत से पृथक कोई संवैधानिक व्यवस्था नहीं है। वह भारतीय संवैधानिक व्यवस्था के सम्मत है। साथ में जम्मू और काश्मीर उच्च न्यायालय के उस आदेश को भी निरस्त कर दिया जिसमें सरफेसी (वित्तीय संपत्तियो के प्रतिभूतिकरण तथा वित्तीय सम्पत्तियों व हितों का परवर्तन)  अधिनियम को जम्मू और काश्मीर के विषय में अमान्य करार दिया गया था। संसद ने 2002 मेँ सरफेसी अधिनियम पारित किया था जिसका उद्देश्य वित्तीय संस्थाओं को यह अधिकार देना है कि वे न्यायालय से बाहर अपने ऋण के बदले उन सम्पत्तियों को जब्त कर सकें जिसके आधार पर ऋण दिया गया है। यह व्यवस्था जब जम्मू और काश्मीर मेँ लागू की गयी तो वहाँ पर अनुच्छेद 370 व 35A को  आधार मानकर विशेष अधिकार की बात की गयी।

सरफेसी अधिनियम के निर्णय का प्रभाव जम्मू और कश्मीर में दूरगामी होगा। इसके बाद अब कई और नियमों और प्रावधानों पर विवेचना शुरू होगी। 

      इस संदर्भ मेँ 16 जुलाई 2015 में जम्मू और काश्मीर का उच्च नयायालय ने कहा था कि जम्मू और काश्मीर का अपना सविधान है और यह एक संप्रभु व्यवस्था है। इसलिय ‘सरफेसी अधिनियम’ 2002  यहाँ लागू नहीं किया जा सकता। 74 पृष्ठ के इस निर्णय में न्यायाधीश मुहम्मद हसन अत्तर और अली मोहम्म्द मगेरी ने कहा कि संसद की विधायी शक्तियाँ सीमित हैं। इसलिय इस अधिनियम के सेक्शन 13, 17ए, 18बी, 34, 35, 36 के प्रावधान को लागू नहीं किया जा सकता। संसद जम्मू और काश्मीर के लिए विशेष परिस्थिति में ही बिधि बना सकती है और वह अनुछेद 370 में निर्धारित व्यवस्था के अनुरूप हो, विशेषकर भूमि और अचल संपत्ति के संबंध में।

      इस उच्च न्यायालय के निर्णय को  सर्वोच्च न्यायालय में सिविल आपील संख्या 12237-12238-2016  में चुनौती दे गयी । न्यायालय ने अपने निर्णय में कहा कि भारतीय सविधान सर्वोच्च है। जम्मू और काश्मीर को कोई संप्रभुता प्राप्त नहीं है । वह भारतीय संविधान के अधीन व्यवस्था है। इसके तर्क मेँ न्यायालय ने कहा कि भारतीय  संविधान के प्रस्तावना में लिखा है कि ‘भारत एक संप्रभु, समाजवादी, पंथनिरपेक्ष, प्रजातांत्रिक गणतन्त्र’ है  लेकिन ‘संप्रभु’ शब्द का जम्मू और काश्मीर के संविधान में कहीं उल्लेख नहीं है । जम्मू और काश्मीर का संविधान का निर्माण एक संवैधानिक सभा ने किया था जो वयस्क मताधिकार के आधार पर चुनी गयी थी। इस सभा ने स्वीकार किया था कि ‘जम्मू और काश्मीर राज्य भारत का अभिन्न हिस्सा है  और रहेगा’ । जम्मू और काश्मीर के संविधान की धारा 3 को उद्धृत करते हुए न्यायालय ने यह बात कही । साथ में धारा 147 का उल्लेख करते हुए कहा कि इसमें कोई संशोधन नहीं किया जा सकता है।

      न्यायालय ने नागरिकता के विषय में कहा कि जम्मू और काश्मीर राज्य के निवासी सर्वप्रथम और केवल भारत के नागरिक है। वहाँ की नागरिक किसी  विशेष श्रेणी या अलग समूह मेँ नहीं आते हैं। जम्मू और काश्मीर के संविधान में केवल ‘स्थायी निवासी’ की उल्लेख है जिसका अर्थ ‘दोहरी नागरिकता’ नहीं है। वह केवल भारत का नागरिक है। जम्मू और काश्मीर का संविधान भारतीय संविधान के अधीनस्थ है और भारतीय संविधान सर्वोच्च है।

   उच्च न्यायालय के निर्णय के विषय में कहा कि वह गलत धारणा से शुरू करता है इसलिए उसका निर्णय भी गलत हो जाता है। अर्थात गलत मान्यताओं के कारण वह गलत निष्कर्ष पर पहुंचा हैं। निर्णय के पैरा 12 में उच्चतम न्यायालय ने कहा कि अनुच्छेद 370 जम्मू और काश्मीर के संदर्भ में एक अस्थायी प्रावधान है लेकिन अधीन्स्थ नयायालय ने इस स्थायी मान लिया । इस निर्णय में अनुच्छेद 370 को अस्थायी माना गया है। इसके अतिरिक्त निर्णय मेँ यह भी कहा गया कि संसद को सातवीं अनुसूची के संघीय व समवर्ती सूची में वर्णित विषयों पर कानून का पूर्ण अधिकार है। बैंकिंग विषय संघीय सूची में 45वां स्थान पर वर्णित है। संसद का विधायन अधिकार निर्बाध है।   

निर्णय के बाद की स्थिति

सरफेसी अधिनियम के निर्णय का प्रभाव जम्मू और कश्मीर में दूरगामी होगा। इसके बाद अब कई और नियमों और प्रावधानों पर विवेचना शुरू होगी। उसकी पुर्नव्याख्या होनी शुरू होगी और पर्त-दरपर्त उकेरा जाएगा। इसका पहला वाद अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति का सेवों मेँ आरक्षण का विषय है। 9 अक्तूबर 2015 ई अशोक कुमार और अन्य के बाद में भी जम्मू और कश्मीर के उच्च न्यायालय ने निर्णय दिया था कि अनुसूचित जाति और जनजाति को सरकारी सेवाओं में पदोन्नति में आरक्षण नहीं दिया जा सकता। भारत सरकार ने पचासीवाँ संविधान संशोधन अधिनियम 2001 को पारित कर के अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के लिए सरकारी सेवाओं के पदोन्नति में आरक्षण का प्रावधान किया था। अनुच्छेद 370 के आड़ में यह अधिनियम वहाँ पर लागू नहीं है । सरफेसी वाद मेँ सर्वोच्च न्यायालय ने इसे न लागू करने के पीछे सभी तर्कों को निरस्त कर दिया। साथ ही भारत सरकार को निर्वाचन क्षेत्र के परिसीमन का द्वार भी खुल गया है।

      इस निर्णय से भारत सरकार के उस विचार की भी पुष्टि हो जाती है जिसमे 11 मार्च 2015 को एक तारांकित प्रश्न संख्या 138 के उत्तर में कहा था कि “भारत के संविधान में, “जम्मू और कश्मीर को विशेष दर्जा” का कहीं उल्लेख नहीं है। अनुच्छेद 370 में “जम्मू और कश्मीर राज्य के संबंध में अस्थायी उपबंधों” के लिए प्रावधान हैं।‘ यह निर्णय भारत की वैधानिक स्थिति की और सही ढंग से स्थापित कर दिया और अनुच्छेद 370 को अस्थायी माना है ।

(लेखक, दिल्ली विश्वविद्यालय के आर्यभट्ट महाविद्यालय में सहायक प्राध्यापक हैं)

JKN Twitter