मुफ़्ती मोहद सईद के निधन के बाद पीडीपी को नई निति बनाने का अवसर मिला

14 Feb 2016 00:36:41

आगे पीडीपी को अगर किसी राष्ट्रीय दल ने केन्द्र ने साथ ले कर चलना है तो एक नई निति बनानी होगी और अगर वैसा नहीं किया गया तो फिर पीडीपी ही बिना अपनी सेल्फ रूल जैसे सोच में संशोधन किए किसी भी ऐसे दल के साथ नहीं चल पाएगी जिस के लिए भारत राष्ट्र का हित सर्वोपरि हो.

by  

दया सागर


यदि हम जम्मू कश्मीर पीडीपी के आज के बडे नेता  के अब तक के वक्तव्य और कहे पर जाएं तो यह कहा जा सकता है कि महबूबा मुफ़्ती जी महसूस कर रही हैं कि उन का कश्मीर घाटी का मतदाता भी कम से कम बीजेपी पीडीपी की 10 महीने की सरकार पर यह तो आरोप लगाता है कि जम्मू कश्मीर के वारे में जो अपना दृष्टिकोण पीडीपी ने उस के सामने रखा था उस से पीडीपी व्यवहारिक स्तर पर क्या कहीं कोई समझोता तो नहीं कर रही। इस के साथ-साथ पहले दिन से बीजेपी के साथ पीडीपी के हाथ मिलने को घाटी में आम जन तो क्या अधिकांश राजनिति से परे स्थानीय बुद्धिजीवी वर्ग, लेखक एवम  कुछ वकील भी एक अपवित्र गठ्वंधन की तरह देखने लगे थे और 10 महीने के गठ्बंधन के दौरान दोनों दलों ने बीजेपी के बारे में कश्मीर घाटी में भावनात्मक स्तर पर सद्भाव पैदा करने के लिए कुछ नहीं किया है


जिस प्रकार से जम्मू कश्मीर में, खास कर के कश्मीर घाटी  में पिछले 6 दशक से भी ज्यादा समय से बीजेपी के पूर्णरूप जनसंघ को कश्मीरियो के शत्रु के रूप में चित्रित किया जाता रहा है और इस संस्था के विरुद्ध प्रचार को भारत राष्ट्र के प्रति शंकाएं पैदा करने के लिए भी किया गया है उस से आज पीडीपी को लग रहा है कि उस का मतदाता इस गठ्वंधन को एक धोखे की तरह देख रहा है इस लिए उस को यह चिंता सता रही है कि आने वाले दिनों में नेशनल कांफ्रेंस का घाटी में और जम्मू में कैसे मुकाबला किया जा सकेगा। जहाँ तक पीडीपी की नीतिओं का सवाल है पीडीपी एक तरह से अपने लक्ष्य और विचारधारा  के प्रति  पूरी तरह से वचनबद्ध है जिस का श्रोत पीडीपी के सेल्फ रूल फ्रेमवर्क (चाहे पीडीपी जानती है कि उस को हकीकत में रूप देना एक तरह से असंभव है) में देखा जा सकता है। पीडीपी यह भी जानती है कि सेल्फ रूल की वात कर के उस के लिए जम्मू क्षेत्र में नेशनल कांफ्रेंस और कांग्रेस से आगे निकल पाना निकट समय में सम्भव नहीं है। यह कुछ कटु सत्य हैं और इन को आज के दिन पीडीपी नजरअंदाज कर सकती।

मुफ़्ती मोहद सईद के निधन के बाद पीडीपी को एक तरह से नई निति वनाने का अवसर मिल गया है। जिस तरह से पीडीपी के वरिष्ठ नेता करा ने 3 फरवरी को इकनोमिक टाइम्स को दिए इंटरव्यू में नरेन्द्र मोदी जी के व्यक्तित्व के वारे में कटाक्ष किए हैं उन से लगता है कि पीडीपी में सब ठीक नहीं है। और अगर इसी तरह से बीजेपी और पीडीपी बिना तथ्यों को माने गठ्वंधन सिर्फ सरकार में बने रहने के लिए करने का फिर से प्रयास करेंगे तो अगले पांच साल भी उलझनों भरे होंगे जिस से राज्य का विकास तो रुकेगा ही दोनों दलों का आगे का  राजनीतिक सफ़र भी काँटों भरा होगा। पीडीपी और ज्यादा देर दिल्ली पर आर्थिक सहायता न देने के आरोपों के सहारे कश्मीर घाटी में भी राजनीति नहीं कर पाएगी क्यों कि अगर जम्मू कश्मीर सरकार अपनी जरूरत तथ्यों के आधार पर केन्द्र को देगी तो केन्द्र सहायता नहीं रोक सकता। पीडीपी को यह भी मानना पड़ेगा की कुछ लोग पीडीपी पर यह भी आरोप लगा रहे हैं कि क्योंकि मुफ़्ती सरकार केन्द्र को पहले दिए पैसे का हिसाव नहीं नहीं दे रही थी इस लिए केन्द्र से आर्थिक प्रावधान आने में देरी हो रही थी।

जम्मू कश्मीर पीडीपी अध्यक्षा ने 16 जून 2014 लोक सभा में राष्ट्रपति के बीजेपी सरकार के ‘विज़न’ पर दिए भाषण पर चर्चा के दौरान अपने दल के सन्दर्भ में एक सुलझी हुई राजनीतिक और वैचारिक परिपक्वता एवम प्रोढता का परिचय देते हुए अपना दृष्टिकोण देश के सामने रख दिया था लेकिन लगता है बीजेपी नेतृत्व ने उन के वक्तव्य को संवेदनशीलता से नहीं लिया था नहीं तो पीडीपी के साथ गठ्वंधन और एजेंडा ऑफ़ अलायन्स की रूपरेखा बनाते हुए पीडीपी की सोच नियति को ध्यान में जरूर रखा जाता। लोक सभा में 16 जून को वोलते  हुए महबूबा जी ने बड़े साफ़ शब्दों में भारत और पाकिस्तान की मुद्रा कश्मीर में चलने और जम्मू कश्मीर को सार्क का संपर्क सूत्र बनाए जाने बाले सुझावों की और स्पष्ट इशारा किया था। यहाँ तक कि मुफ़्ती जी ने जम्मू कश्मीर के विशेष दर्जे को बनाए रखने की बात तो एजेंडा ऑफ़ अलायन्स में लिखवा ली पर सेल्फ रूल फ्रेमवर्क के जो विन्दु जम्मू कश्मीर के भारत होने पर प्रश्न लगाते थे उन को नकारने की कोई बात नहीं होने दी।

 

इस के अलावा संक्षेप में पीडीपी–बीजेपी के मार्च 2015 के एजेंडा ऑफ़ एलाएंस से जो सन्देश आम जन और दुनिया को जाता है वे है कि पीडीपी और बीजेपी दोनों मानते हैं कि   (i) जिस प्रकार के हालात जम्मू कश्मीर में हैं उन के अनुसार इस राज्य के लोगों की सामाजिक एवम राजनीतिक आकाँक्षाओं और सरकारों के प्रति मनोमालिन्य एवं रंजिशों मे वहुत दूरियां हैं और क्यों कि यहाँ के लोग दोनों क्षेत्रों (जम्मू और कश्मीर) में हमेशा से लगातार बनी रही  वैचारिक और भानात्मक विरोधी स्थिति में रहे हैं इस लिए इस राज्य में सिर्फ आर्थिक विकास अपने बूते पर शांति नहीं स्थापित कर सकता है (ii) जम्मू कश्मीर की आज  की राजनीतिक एवं वैधानिक सच्चाईयों को मानते हुए बीजेपी और पीडीपी की जम्मू कश्मीर के संवैधानिक दर्जे के बारे में मान्यताओं में  मानने योग्य भिन्नता है (iii) जम्मू कश्मीर में शांति, निश्चयता एवं स्थिरता का वातावरण पैदा करने के लिए जम्मू कश्मीर के विशेष दर्जे के साथ-साथ जम्मू कश्मीर संबंधित भारत के संविधान के आज के सभी संवैधानिक पप्रावधानों को जैसे हैं वैसे ही बनाए रखना होगा।

इस प्रकार के उल्लेख गठबंधन के 1 मार्च 2015 के एजेंडे में होने के वावजूद भी जिन में यह कहा गया है कि जम्मू कश्मीर के विशेष दर्जे के साथ साथ जम्मू कश्मीर सबंधित भारत के संविधान के आज के सभी संवेधानिक प्रावधानों को जैसे हैं बैसे ही बनाए रखना होगा केन्द्र में आसीन बीजेपी (एनडीए) सरकार ने तारांकित प्रश्न संख्या 138 ( “क्या यह सच है कि अनुच्छेद 370 के माध्यम से संविधान जम्मू कश्मीर को विशेष दर्जा देता है?) के उत्तर में राज्य सभा में 11 मार्च 2015 को लिखित रूप में कहा कि  भारत के संविधान में जम्मू कश्मीर के लिए ‘विशेष दर्जा’ होने का कोई उल्लेख नहीं है। इस प्रकार की स्थिति में अजेंडा ऑफ़ अलायन्स के  बीजेपी की ओर से architects से पूछना गलत नहीं होगा कि उन्होंने अपने अजंडे में जम्मू कश्मीर के लिए किस संवैधानिक विशेष दर्जे को बनाए रखने की बात की है? इस लिए जिस तथ्यों में विरोधावास और विचारधाराओं के मक्कडजाल में यह दोनों ‘साथी’ दल फंसे हुए हैं को देखते हुए इन के लिए यह उपयुक्त समय है कि यह आत्मचिंतन, अपनी विचारधाराओं पर पुनर्विचार करने और इस राज्य के जन मानस की आवश्यकताओं को फिर से इंकित करने की जरुरत सरकार बनाने के मसले पर प्राथमिकता दें नहीं तो हर दूसरे दिन यह एक दुसरे को नीचा दीखने के लिए राज्य के झंडे को  राष्ट्रिय ध्वज के प्रतिद्वंदी दिखाने जैसे विवादों में उलझे रहेगे।  और  जम्मू कश्मीर में तब तक शांति, सद्भाव और आर्थिक स्थितता नहीं आ सकती जव तक इस राज्य की राजनिति से सत्ता के लोभ को पीछे धकेला नहीं जाएगा। राज्यपाल को 2 फरवरी के दिन मिलने के वाद महबूबा जी ने कहा है कि वे केंद्र सरकार से कुछ कॉन्फिडेंस बिल्डिंग मेजर्ज लेने के कह चुकी हैं और जब तक केंद्र सरकार इस पर अपनी स्थिति साफ़ नहीं करती वे सरकार बनाने की बात नहीं छेड़ सकती। इस के साथ महबूबा जी ने और बीजेपी ने यह भी कहा है की एजेंडा ऑफ़ एलायंस बड़े सोच विचार के बाद बना है और इस के अलावा और कोई शर्त पीडीपी ने नहीं रखी है। ऐसे हालात में अगर महबूबा जी ने फिर भी किस विश्वास को जीतने की बात की है इस पर केन्द्र सरकार और बीजेपी नेतृत्व तो क्या कांग्रेस पार्टी के नेतृत्व को भी  को संवेदनशीलता से विचार करना होगा जिस के लिए महबूबा जी के 14 जून 2014 के लोक सभा में दिए गए भाषण को गम्भीरता से फिर से सुनना होगा और आगे पीडीपी को अगर किसी राष्ट्रीय दल ने केन्द्र ने साथ ले कर चलना है तो एक नई निति बनानी होगी और अगर वैसा नहीं किया गया तो फिर पीडीपी ही बिना अपनी सेल्फ रूल जैसे सोच में संशोधन किए किसी भी ऐसे दल के साथ नहीं चल पाएगी जिस के लिए भारत राष्ट्र का हित सर्वोपरि हो. पीडीपी के लिए भी बिना एजेंडा फॉर अलायन्स की रूप रेखा में कुछ संशोधन किए और अपने सेल्फ रूल फ्रेमवर्क पर नजरसानी किए 2020 के चुनाव बड़ी चुनौती हो सकते हैं

( * दया सागर एक वरिष्ठ पत्रकार और जम्मू कश्मीर विषयों के अध्येता हैं )

JKN Twitter