राज्य की राजनीति को एक नई दिशा देनी होगी जिस से कश्मीरियत भारतीयता की प्रतिद्वंदी न दिखे

27 Feb 2016 13:35:01


Daya Sagar

बीजेपी यह कह रही है की 1 मार्च 2015 वाले पीडीपी बीजेपी के जम्मू कश्मीर में सरकार बनाने के पहले लिखे गए एजेंडा ऑफ़ अलायन्स पर उस की आस्था पूरी है। हाँ भीतरी मन में बीजेपी जानती है कि इस में पीडीपी द्वारा लिखवाई गई कुछ बातें पूरी नहीं होने वाली हैं और उस में शामिल कुछ कुछ बातें बीजेपी के लिए आने बाले समय में प्रश्न खड़े करती रहेंगी। इस लिए अगर अब बीजेपी पीडीपी की सरकार जिस तरह से पीडीपी आगे आगे भाग रही है उस तरह बन भी जाति है तो यह बीजेपी के लिए क्षेत्रवाद की राजनीति और राष्ट्रवाद के नारों वाली राजनिति के संदर्भ में घातक हो सकता है।

जव दोनों दलों ने 1 मार्च 2015 को इस बात का दम भरते हुए हाथ मिलाये थे कि वे अपने सारे राजनीतिक और संवैधानिक स्रोत इस अवसर को राज्य को एक शांति और विकास के दोर में ले जाने के लिए संजोएँगे। कहाँ तक यह दोनों दल इस बिगड़ी राजव्यवस्था को सुधारने में सफल हुए हैं इस का विश्लेषण करने के बजाए इन का एक दूसरे पर दस महीने के बाद ही, और वह भी मुफ़्ती मोहमद सईद के निधन के एक दम बाद,  प्रत्यक्ष /अप्रत्क्ष रूप से आरोप लगाते दिखना राज्य के लिए बड़ा ही दुर्भाग्य पूर्ण है।

मुफ़्ती मोहमद सईद ने एक तरह से कुछ ऐसा कहा था कि दोनों दल रेल की 2 पटरिओं की तरह हैं जो साथ साथ तो चलती हैं पर  आपस में मिल नहीं सकती और उन्होंने फिर भी राज्य के हित के लिए बीजेपी का हाथ पकड़ा है। यहाँ पर यह कहना असंगत नहीं होगा कि बीजेपी की निति जम्मू कश्मीर राज्य की भारत से नजदीकियों पर टिकी है जब के पीडीपी का आधार इस राज्य की आने वाले समय में भारत से व्यवहारिक   दूरिओं की आस दिलाने में टिका है। लगता है शायद मुफ़्ती साहिब इस बात को समझने में चूक गये कि रेल की पटरियां अगर कहीं मिलती हैं तो कभी कभी दुर्घटना भी हो जाति है, पर जब वही पटरियां एक कांटे से हो कर गुजरती हैं तो गाड़ी को एक नई दिशा में ले जाति हैं। इसी लिए इस अभियान में  पीडीपी को ही अपनी राजनीतिक सोच को बीजेपी के नजदीक लाना था जिस से कश्मीरियत भारतीयता की प्रतिद्वंदी न दिखे क्यों कि बीजेपी के लिए दिशा में उतना वदलाव करना सम्भव नहीं होगा।

जिस प्रकार से नेशनल कांफ्रेंस के नेता उमर अदुल्लाह ने कहना शुरू कर दिया है कि नेशनल कांफ्रेंस और बीजेपी के साथ गठ्वंधन के बारे में सोच भी नहीं सकती है इस से भी राज्य के हित में कुछ अच्छे संकेत नहीं मिलते। पीछे नेशनल कांफ्रेंस बीजेपी के साथ केन्द्र में सत्ता में रह चुकी है और अब एनसी के लिए बीजेपी इतनी अछूत कैसे हो गई इस पर विचार करना होगा। कहीं इस का कारण यह तो नहीं है कि कश्मीर घाटी में आज की वोट निति पूरी तरह से घाटी केन्द्रित, कश्मीरियत वनाम भारतीयता और केन्द्र विरोधी लहरों पर सवार है? इस बात पर भी ध्यान देने कि जरूरत है कि कहीं केन्द्रीय नेताओं का कश्मीर घाटी के आम आदमी का विश्वास जीतने के लिए लगातार कश्मीरियत, इंसानियत और जम्हूरियत के मुहावरों का इस्तमाल ज्यादा करना और विरोधियों एवं पृथकतावादियों के मिथ्या प्रचार को तथ्यों के आधार पर धूमिल करने के प्रयास नहीं करना, भी कहीं कश्मीर घाटी के आम जन के भारत केन्द्रित नीतिओं और विचारधारा के प्रति घटते लगाव का कारण तो नहीं है? लगता है हालात कुछ ऐसे ही हो गये है और नेशनल कांफ्रेंस भी इस सोच से ग्रस्त है कि इस समय अगर चुनाव होतें हैं तो कश्मीर घाटी में नेशनल कांफ्रेंस पीडीपी के अपने  द्वारा ही बुने जाल में फंसे होने के कारण शायद अपना राजनीतिक स्तर कुछ सुधार सके क्यों की जम्मू क्षेत्र में बीजेपी के प्रश्नों में घिरे होने के कारण कुछ लाभ अगर मिला भी तो फिर  कश्मीर घाटी में पीडीपी को पछाडे बिना कुछ वनने वाला नहीं है।

फिर भी अगर यह दोनों दल ( खास कर के पीडीपी) अगर दिल से अपने जन मानस के कल्याण के लिए समर्पित हैं तो इन को दयानतदारी से इस बात के लिए आत्म विश्लेषण करना होगा कि मुफ़्ती मो सईद के  7 जनवरी को निधन के 2 दिन बाद ही पीडीपी ने अप्रत्क्ष रूप में बीजेपी और केन्द्र सरकार पर विश्वास तोड़ने के आरोप लगाना क्यों शुरू कर दिया था? जब दोनों दल पीडीपी के पैट्रन और जम्मू कश्मीर सरकार के मुख्यमंत्री मुफ़्ती सईद के निधन के करीव 6 सप्ताह बाद भी कह रहे हैं कि दोनों का गठबंधन टूटा नहीं है तो फिर सरकार बना कर पीडीपी ने क्यों पहले की कमियों को दूर करने के पर्यास नहीं किए हैं और राजनिति से ऊपर उठ कर अपनी राजनीतिक सोच को नई दिशा देने के लिए चिंतन शुरू क्यों नहीं किया है?

इसी सन्दर्भ में एक और बात जिस की और ध्यान देने की जरूरत है वह यह है कि क्या कहीं मुफ़्ती साहिब की सरकार घुट-घुट कर तो नहीं चल रही थी और उन के निधन के बाद पीडीपी ने अपनी कश्मीर घाटी और ‘कश्मीर समस्या’ केन्द्रित ‘मूल’ निति में ही अपना राजनीतक हित देखा? और अगर ऐसा है तो फिर यह पीडीपी के लिए आने बाले समय में घातक होगा क्यों कि यदि पीडीपी को भारत की दृष्टि से एक मुख्यधारा का राजनीतिक दल बने रहना है तो फिर अपने सेल्फ रूल के कुछ केन्द्र विन्दुओं को धूमिल कर के ही नेशनल कांफ्रेंस के विरूद्ध एक  नई रणनीति वनानी होगी।

यहाँ तक पीडीपी का संबंध है इस दल ने तो अधिकारिक स्तर पर काफी हद तक अस्पष्ट बाते ही कही है जैसे कि यह दल मुफ़्ती जी के विजन से बंधा हुआ है, केंद्र सरकार को कुछ विश्वास बनाने वाले कदम उठाने के मसोदे पीडीपी के सामने रखने होंगे और राज्य की स्थिति इतनी दुर्गम है कि मुफ़्ती मोहमद के बाद पीडीपी के किसी नेता के लिए सरकार को संभाल पाना कठिन है। इस से यही सन्देश जाते हैं की अभी तक के पीडीपी बीजेपी शासन से जमीनी स्तर पर शांति और स्थिरता की दिशा में कुछ और क्षति ही हुई है।

 

लगता है आज पीडीपी यह महसूल करने लगी है कि अपने ‘सेल्फ रूल फ्रेम वर्क’ में जो विज़न पीडीपी ने जम्मू कश्मीर राज्य की ‘इंडिया नेशन स्टेट’ से दूरियां दिखाते हुए नेशनल कांफ्रेंस की ‘ग्रेटर अटोनोमी’ को कश्मीर घाटी में पछाड़ने के लिय संजोएया था वह तो पूरा नहीं हो सकता है और न ही बीजेपी के साथ गठबंधन रख कर उस की बात की जा सकती है तो इस लिए आज कश्मीर घाटी में अगर स्थिरता का माहौल बन जाता है तो आने वाले दिनों में पीडीपी का शीर्ष नेतृत्व आम जन के मन में उठने वाले सवालों के घेरे में घिर जाएगा। पीडीपी के वक्ता नईम अख्तर जी ने 14 जनबरी 2016 को एनडी टीवी से कहा था कि महबूबा जी मुफ़्ती मोहमद सईद जी की निर्विरोध उत्तराधिकारी हैं पर मुफ़्ती सहिब का राजनीतिक कद बहुत ऊंचा था  जो हर प्रकार के उतार चड़ाव को सह सकता था इस लिए आज की पीडीपी के लिए सीधे जा कर मंत्री की कुसी में बैठ जाना और जैसे हालात हैं उन को ले कर चल पड़ना आसान नहीं है। नईम अख्तर ने यह भी कहा कि पीडीपी का जम्मू कश्मीर के बारे में एक ‘विज़न’ है और ‘तब’ ( गठ्वंदन होने के बाद ) से कुछ बदला नहीं है?

नईम अख्तर पीडीपी के अधिकारिक वक्ता ने जो कहा है उस पर बीजेपी और आज केन्द्र सरकार को तो कम से कम सरकार बनाने के विषय से कुछ हट कर विचार करना होगा क्यों की जब कांग्रेस ने पीडीपी के साथ 2002 से 2008  तक सरकार चलायी थी तो तब पीडीपी ने अपना विज़न पिछड़ने की कोई बात नहीं की थी।

नईम अख्तर ने 14 जनवरी को यह भी कहा था कि उन के लिए बीजेपी- पीडीपी एजेंडा ऑफ़ एल्लांस एक पवित्र दस्तावेज है और एक तरह से बीजेपी की केन्द्र सरकार पर उडी और दुल हस्ती जैसी जलविद्युत परियोजनाओं का राज्य सरकार के हवाले न करने, श्रीनगर और जम्मू को स्मार्ट सिटी प्रोग्राम के अन्दर न लाने, ‘आर्म्ड फोर्सेस स्पेशल पॉवर एक्ट’ को कुछ इलाकों से न हटाने के आरोप लगाए थे। हाँ पीडीपी को भी आम जन को यह बताना होगा कि क्या मुफ़्ती मोहमद सईद सरकार ने केंद्र को कोई साफ़ लिखित में (1) उडी और दुल हस्ती जलविद्युत परियोजनाओं का राज्य सरकार को देने के लिए लिखित मांग भेजी थी (2) क्या श्रीनगर और जम्मू शहर को स्मार्ट सिटी प्रोग्राम के अन्दर लाने के दावे को पक्का करने के लिए  इन शहरों की व्यवस्था को सुधारने के लिए कम से कम मीटर थ्री वीलर/टैक्सी चलाने, शहर से गन्दगी हटाने , ट्रैफिक पुलिस को काम करने के लिए मजबूर करने के लिए कुछ कदम उठाए थे। (3) क्या मुफ़्ती सरकार ने केंद्र सरकार को कोई सीधा सुझाव भेजा था कि फलां- फलां (इस – इस ) जिले या इलाके से  ‘आर्म्ड फोर्सेस स्पेशल पॉवर एक्ट’ को हटा दिया जाना चाहिए क्यों कि उन इलाकों में सिविल पुलिस आम जन की आतंकियों से रक्षा कर सकती है और अगर इन इलाकों में कोई आतंकी या राष्ट्र विरोधी तत्व होंगे तो स्थानीय पुलिस उन को सुरक्षा बलों के हवाले करने में सक्षम है, और केन्द्र ने उस को नहीं माना। इस से आम जन भी गलत सही का निष्कर्ष निकाल सकेगा।

* दया सागर एक बरिष्ठ पत्रकार और जम्मू कश्मीर विषयों के अध्येता हैंdayasagr४५ @याहू.काम )

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