राजनीतिक दलों को मुख्यधारा और पृथकतावाद के जाल से बाहर निकलने का रास्ता तलाशना होगा

19 Apr 2016 13:21:13

दयासागर


जम्मू-कश्मीर राज्य में आजकल हर सुबह एक नया विवाद लेकर आती दिख रही है। दुविधाओं भरे जिस वातावरण से इस राज्य के लोग झूझ रहे हैं ऐसा लगता है राजनीतिक दलों के लिए अगर कोई चिंता करने की बात है तो वो सिर्फ इतनी ही है कि किस तरह से नेता लोग सत्ता की कुर्सी के नजदीक रह सकते हैं। जम्मू-कश्मीर में आमजन को मुख्यधारा और अलगाववाद के नाम पर खड़े किए जाते विवादों में पिछले दशक से उलझाए रखा गया है। हाँ पहले भी कुछ इस प्रकार की बातें होती थी पर साल 1990 के पहले ज्यादातर (plebiscite)  रायशुमारी से जुड़े विवाद जैसे विषय पर प्रश्न उठते थे पर सत्ता की डोर पकड़ने वाले दल या नेता कभी कोई सीधी बात नहीं करते थे और नही ऐसी बात करने वालों को कोई महत्त्व देते थे जो किसी भीदृष्टि से जम्मू-कश्मीर के  पूर्णतया एक भारतीय राज्य होने या 1947 में भारत से हुए अधिमिलन पर लगने वाले किसी प्रश्न चिन्ह पर विचार करने का तनिक मात्र भी सुझाव या संकेत देते हों। पर अब तो ऐसे हालात बनते साफ़ दीखते हैं कि मुख्यधारा और पृथकतावादी विचारधारा के बीच अन्तर की परिभाषा जम्मू-कश्मीर के संदर्भ में कुछ अलग ही प्रकार की है क्योंकि कुछ ऐसे संकेत मिलते हैं जिनसे लगता है कि वे लोग जो जम्मू-कश्मीर राज्य की अन्तर्रष्ट्रीय स्तर की स्थिति पर उठते विवादों पर भी बिना शर्त के बात करने की वकालत करते हैं जो सुझाव देते हैं वे भी भारत सरकार के लिए मुख्यधारा की श्रेणी में आते हैं।

पीडीपी ने साल 26 अक्टूबर 2008 के दिन अपना “सेल्फ रूल का मसोदा” अपनी बेबसाईट पर डालकर दुनिया के सामने रख दिया था। जहाँ तक पीडीपी का सवाल है पीडीपी ने बड़ी सादगी से अपने सेल्फ रूल के मसोदे में कहा है कि पीडीपी किसी प्रकार से भी पूर्ण ‘जम्मू-कश्मीर समस्या’ का हल नहीं पेश कर रही है, जम्मू-कश्मीर समस्या सिर्फ अंर्तराज्यी स्तर पर ही नहीं सुलझाई जा सकती है। इसके लिए अंर्तराराष्ट्रीय स्तर के प्रयासों के मिश्रण की आवश्यकता है।  कम से कम साल 2008 के बाद तो भारत की सरकारों और भारत की मुख्धारा के सभी राजनीतिक दलों ने तो पीडीपी के सेल्फरूल को जान लिया होगा और अगर कोई दल अब भी यह कहे कि उसके नेताओं ने पीडीपी की निति को अभी जानना है तो इस इससे दुर्भाग्य पूर्ण भारत के लिए और क्या हो सकता है मुफ़्ती सईद जी ने अपने विचार अपने दल की नींव रखते हुए साल 1998-99 में रियासत के लोगों के सामने रख दिए थे। आतंकवाद और प्रिथिक्तावादी विचार कों से झूझती जम्मू-कश्मीर रियासत में साल 2002 से लेकर साल 2008 तक कांग्रेस ने पीडीपी के साथ मिल कर शासन किया और उसके बाद साल 2015 से बीजेपी और पीडीपी साथ साथ सत्ता की डोर पकड़े चल रहे हैं।

मुफ़्ती मोहम्मद सईद और महबूबा मुफ़्ती जी ने अभी तक बड़े साफ़ शब्दों में जम्मू-कश्मीर के बारे अपनी सोच लिखकर और कहकर जम्मू-कश्मीर के आमजन और दुनिया के सामने रख दी है। मैंने पीडीपी के सेल्फ रूल के दस्तावेज को बड़े ध्यान से पढ़ने की कोशिश की थी और की है , मैंने अपनी समझ के अनुसार इस दस्तावेज की समीक्षा अपने कुछ लेखों में बडी ईमानदारी से सार्वजानिक कर दी है।

अभी तक जहाँ तक मेरा ज्ञान है अपने सेल्फरूल के मसोदे में पीडीपी ने कोई बदलाव नहीं किया है इसलिए आज के संधर्भ में अगर यह कहें कि ना ही कांग्रेस की नज़र में और ना ही बीजेपी के दृष्टिकोण से पीडीपी का सेल्फरूल किसी भी प्रकार से जम्मू-कश्मीर के सवैंधानिक स्तर पर  पूर्णतया एक भारतीय राज्य होने पर कोई अनुचित प्रश्न खड़े करता है और अगर करता है तो वो सत्य से परे नहीं है।

इसी 12 अप्रैल को जम्मू में बीजेपी के एक समारोह में केन्द्रीय मंत्री और बीजेपी के शीर्ष नेता श्री अरुण जेटली जी ने अपने विचार कुछ इस प्रकार प्रकट किए हैं कि जम्मू-कश्मीर में पीडीपी के साथ बीजेपी ने गठबंधन अलगाववादियों / प्रिथिक्तावादियोँ को समाप्त करने के लिए किया है। इससे एक ही निष्कर्ष निकलता है कि बीजेपी की दृष्टि में पीडीपी के सेल्फरूल के मसोदे में कोई भी ऐसी आपत्तिजनक बात नहीं है जो जम्मू-कश्मीर राज्य को भारत से दूर ले जाती दिखती हो।

 अरुण जेटली जी ने यह जरूर कहा है कि बीजेपी और पीडीपी की विचारधारा में दूरियां हैं पर जब वे यह कहते हैं कि पीडीपी और बीजेपी एक बात में एक जैसे हैं और वह यह है कि प्रिथिक्तावादियों को खत्म करना है तो इससे साफ़ हो जाता है कि बीजेपी की नज़र में पीडीपी के सेल्फरूल में रखे गए जम्मू-कश्मीर समस्या के समाधान के सुझाव किसी भी ढ़ंग से जम्मू-कश्मीर के भारत के साथ अधिमिलन और भारत के संविधान के अनुच्छेद-1 का आंशिक स्तर पर भी खंडन नहीं करते हैं। दूसरे शब्दों में यह कहा जा सकता है कि बीजेपी की दृष्टि में बिना 1947 के अधिमिलन और भारत के संविधान के अनुच्छेद-1 पर नजर सानी किए जम्मू-कश्मीर राज्य में भारत और पाकिस्तान की मुद्रा को मान्य करना , जम्मू-कश्मीर राज्य संबंधित कुछ विषयों पर भारत और पाकिस्तान दोनों का संयुक्त प्रभुत्व स्वीकार करना; भारत, पाकिस्तान और दूसरे देशों के लिए आयात एवम निर्यात कर पर निर्णय का अधिकार जम्मू-कश्मीर राज्य को देना जैसे सेल्फरूल मसोदे में दिए गए सुझाव लागू किए जा सकते हैं और यह प्रिथिक्तावाद के घेरे में नहीं आते है।

 इस प्रकार की सोच को देखते हुए हो सकता है जम्मू-कश्मीर के आमजन को अपने लिए कांग्रेस,  बीजेपी, एनसी और पीडीपी में से किसको वोट दें के लिए राष्ट्रियता के नाम पर आज तक अपनाए गए मापदन्डों को फिर से विचारना होगा।

हाँ अगर कुछ कश्मीर घाटी के नेताओं के विचारों की दृष्टि से देखें तो शायद कुछ लोग अरुण जेटली के कहने का यह अर्थ भी निकाल सकते हैं कि बीजेपी ने पीडीपी का हाथ पीडीपी को ख़त्म करने के लिए पकड़ा है. इस दिशा में भी अगर कोई विचार करे तो यह उसका अपना अधिकार है।

भारत की दृष्टि से और जम्मू-कश्मीर के आमजन की सुखशांति के लिए है आज जम्मू-कश्मीर के आमजन को राजनीतिक दलों के मुख्यधारा और प्रिथिक्तावाद के तानेबने से बुने शब्दों के जाल से बाहर निकलने का रास्ता स्वयं ही तलाशना होगा।

धर्म , क्षेत्रवाद और भावनात्मक नीति का खेल जम्मू-कश्मीर में खेलने वालों को इस राज्य के निवासियों को खुद ही रोकना होगा नहीं तोचुनीहुई सरकारें इस राज्य में ६साल तक सत्ता भोग तो कर लेंगी पर आमजन के हित और राज्य की आर्थिक प्रगति के स पने जो सरकारें अपने संबोधन में दिखाएगी वे कभी पूरे नहीं होने वाले।

जम्मू-कश्मीर में , खासकर के कश्मीर घाटी में , कई लोग पृथकतावादी नारों से बहुत जख्म ले चुके हैं और इनको भारतीयता की मलहम से ठीक करना अब कठिन जरूर है पर असंभव नहीं पर इसके लिए इस राज्य में राजनीतिक शांति बहाली के लिए पृथकतावादी संगठनों से छुटकारा पाना होगा अगर अरुण जेटली की बात पर विश्वास करें तो यह भी मनना होगा कि पीडीपी ने अपने सेल्फरूल के मसोदे में कुछ बदलाव कर लिया है क्योंकि उनके शब्दों में बीजेपी और पीडीपी ने अलगाववादियों को समाप्त करने के लिए हाथ मिलाया है। यह पीडीपी के हित में भी होगा की सार्वजानिक किया जाए कि क्या २००८ के सेल्फरूल के मसोदे में कुछ बदलाव किए गए हैं क्यों की ऐसा करने से पीडीपी का राज्य में राजनीतिक आधार बढ़ेगा और बीजेपीपीडीपी सरकार की स्थिरता भी बढ़ेगीऔर अगर ऐसा नहीं है तो फिर बीजेपी के शीर्ष नेतृव को भी पीडीपी के सेल्फरूल को संवेदनशीलता से देखना एवं समझना होगा और अरुण जेटली जी द्वारा कहे कुछ शब्दों से जा रहे सन्देश पर चिंतन करना होगा कि क्यों इस राज्य से अब और राजनीतक खिलवाड़ नहीं होना चाहिए

दयासागर एक वरिष्ठ पत्रकार और जम्मू-कश्मीर विषयों के अध्येता हैं

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