बार-बार इंसानियत, जम्हूरियत और कश्मीरियत के मन्त्र का उद्घोष क्यों करना पड़ता है?

23 Apr 2016 13:57:38

जम्मू-कश्मीर राज्य संबंधी विषयों के समाधान के लिए कुछ कड़े कदम उठाने की आवश्यकता है और जमीनी स्तर पर लोगों के हित में कुछ करके दिखाने का भी समय आ गया है

दयासागर

यह सबको समझ लेना चाहिए कि जम्मू-कश्मीर राज्य संबंधी विषयों के समाधान के लिए कुछ कड़े कदम भी उठाने की आवश्यकता है और जमीनी स्तर पर आमजन के हित में कुछ करके दिखाने का भी समय आ गया है। अब सिर्फ इंसानियत जम्हूरियत और कश्मीरियत की दुहाई देकर जम्मू-कश्मीर राज्य को अलगाववादी विचारधारों और ‘भारत विरोधी’ अभियानों के प्रभाव से बचाया नहीं जा सकता है। इंसानियत, जम्हूरियत और कश्मीरियत का मंत्र दिए आज 13 साल हुए जा रहे हैं पर अब भी महबूबा मुफ्ती तो क्या प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को भी इस मंत्र को बार-बार दोहराना पड़ रहा है। मोदी इस मंत्र को ‘कश्मीर’ घाटी के प्रति अपने लगाव को दिखने के लिए कहते हैं और महबूबा इस मंत्र को भारत को यह एहसास करवाने के लिए कहती हैं कि कश्मीरियों के साथ केंद्र सरकार और भारत के नेतृत्व ने अपनेपन का व्यवहार नहीं किया और विश्वास की कमी भी रही है।

मां वैष्णो देवी श्रइन बोर्ड के स्पोर्ट्स केंद्र के उद्घाटन और विश्वविद्यालय के दीक्षांत समारोह के अवसर पर आए हुए मोदी को भी एक बार फिर से इस 19 अप्रैल को अपनी ‘कश्मीर’ के प्रति आस्था दिखाने के लिए इंसानियत, कश्मीरियत और जम्हूरियत के मंत्र का उदघोष करना पड़ा। हां, कटड़ा में महबूबा जरूर कुछ हटकर बोली हैं। इससे अभी कोई निष्कर्ष निकालना जल्दबाजी हो सकता है पर यह राह कुछ ‘ठंडक’ दे सकती है।1आज तक भारत के जम्मू-कश्मीर राज्य में जो भी होता रहा है उसका अच्छा या बुरा प्रभाव जम्मू-कश्मीर की स्थानीय स्थिति पर ही अधिक पड़ता रहा है पर अब जो कुछ जम्मू-कश्मीर में हो रहा है एवं आगे होगा उसका असर सामाजिक एवं राजनीतिक स्तर पर रावी दरिया के पार भी होता दिख रहा है।

यहां तक जम्मू-कश्मीर संबंधित अंतरराष्ट्रीय वाद-विवाद का संबंध है उसकी बात तो एक अलग समस्या है, जिसका बड़ी ही साफगोई से महबूबा ने 16 जून 2014 को अपने लोकसभा में दिए गए भाषण में यह कह कर कर दिया था - ‘. जम्मू-कश्मीर का इश्यू, हमने अमेंडमेंट दिया, मुङो नहीं मालूम, गलती से, हमने लिखा था इश्यू ऑफ जम्मू-कश्मीर उसको बताया गया इश्यूज ऑफ जम्मू-कश्मीर’। लेकिन लगता है कि उनकी बात का भारत सरकार और राष्ट्रीय नेताओं ने जम्मू-कश्मीर के बारे में आगे की नीति बनाने के लिए करीब दो साल बीत जाने के बाद भी संज्ञान नहीं लिया है। ऐसे ही 9 फरवरी 2016 के दिन अफजल गुरु को न्यायालय के आदेश पर साल 2013 में फांसी दिए जाने के संदर्भ में दिल्ली की जवाहर लाल नेहरु यूनिवर्सिटी में जो कुछ हुआ और उसके बाद जिस तरह से राष्ट्रीय राजनीतिक दलों ने भी एक नई सोच का बोध करवाने के प्रयास किए हैं उससे आने वाले समय में भारत के अन्य राज्यों में भी पृथकतावाद के बीज बोए जा सकते हैं। जिस प्रकार से एक खास ढंग और नजरिए से कन्हैया कुमार पर लिखने के लिए कुछ लेखक उत्सुक दिख रहे हैं वे भारत की अखंडता की बात करने वालों के लिए एक चिंता का कारण होना चाहिए। पर सिवाय डेवलपमेंट के नारे लगाने के कुछ खास होता नजर नहीं आता है। यही नहीं, जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय की एक प्राध्यापक नवेदिता मेनन ने जिस तरह से जम्मू-कश्मीर पर भारत द्वारा 1947 में नाजायज ढंग से कब्जा करने और मानवाधिकारों का हनन करने की बात की है और उसके बाद भी वह सेवा में बनी हैं, कई प्रश्न खड़े करने वाली बात है।

अब भी अगर भारत का केंद्रीय नेतृत्व अपनी सोच नहीं बदलेगा तो फिर जम्मू-कश्मीर की जनता तो दुविधाओं में फंसती जाएगी ही, यह भारत के हित में भी नहीं होगा।1यह सच है आज के दिन महबूबा ही क्या सईद अली शाह, उमर फारूक, यासीन मालिक भी वाजपेयी की ‘कश्मीर समस्या’ के प्रति नीति का प्रशंसा से वर्णन करते हुए इस ‘इंसानियत, कश्मीरियत और जम्हूरियत’ के मंत्र का हवाला देते हैं।

साल 16 फरवरी 2014 में जब नरेंद्र मोदी श्रीनगर आए थे तब भी उन्होंने इस मंत्र का वाजपेयी का नाम लेकर जिक्रकिया था कि अटल ने कहा था कश्मीर को हम तीन मूल आधार से देखते हैं, एक इंसानियत दूसरा जम्हूरियत और तीसरा कश्मीरियत। नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद 16 जून 2014 के दिन लोकसभा में राष्ट्रपति के भाजपा सरकार के ‘विजन’ पर दिए भाषण पर चर्चा के दौरान महबूबा मुफ्ती ने अपने दल के संदर्भ में एक सुलझी हुई राजनीतिक और वैचारिक परिपक्वता का परिचय देते हुए अपना दृष्टिकोण देश के सामने रखा था और उस समय भी उन्होंने भारत की संसद और भारत सरकार को अपने ढंग से वाजपेयी जी के ‘इंसानियत, जम्हूरियत और कश्मीरियत’ के मंत्र की याद दिलाते हुए ‘52 इंच के सीने’ में कश्मीरियों के लिए कुछ जगह देने की बात कही थी।

साल 2003 में वाजपेयी ने कुछ कहा था और आज 13 साल बाद भी इस बात को भारत के प्रधानमंत्री कहते हैं, आखिर क्यों ? 1यह कहना भी गलत नहीं होगा कि भाजपा नेतृत्व ने महबूबा के 16 जून 2014 के लोकसभा में दिए गए वक्तव्य को संवेदनशीलता से नहीं लिया था नहीं तो पीडीपी के साथ गठबंधन और एजेंडा ऑफएलायंस की रूपरेखा बनाते हुए पीडीपी की सोच एवं नियति को ध्यान में जरूर रखा जाता। लोकसभा में 16 जून 2014 को महबूबा बड़े साफ शब्दों में भारत और पाकिस्तान की मुद्रा ‘कश्मीर’ में चलने, जम्मू-कश्मीर को सार्क का संपर्क सूत्र बनाए जाने वाले सुझावों और ‘कश्मीर समस्या’ वाली उनके दल की सोच की ओर स्पष्ट इशारा किया था। अगर एजेंडा फॉर एलायंस सोच समझ कर बना था, नरेंद्र मोदी को भी केंद्र में आए दो साल हो गए हैं और नरेंद्र मोदी के पास वाजपेयी का मंत्र भी है तो फिर भी आज कश्मीर के लोग ‘विश्वास’ न होने की बात क्यों कर रहे हैं? इसका उत्तर भाजपा नेतृत्व को ढूंढ़ना होगा।

आज मोदी और भाजपा नेता मुफ्ती सईद के विजन को पूरा करने की बात कर रहे हैं, यह अच्छी बात है पर इसके साथ-साथ इनको साफ शब्दों में जम्मू-कश्मीर के आम जन को यह भी बता देना चाहिए कि उनके अनुसार सेल्फ रूल फ्रेमवर्क की कुछ बातों जिनका जिक्रमहबूबा ने 16 जून 2014 को लोकसभा में भी किया था, से जम्मू-कश्मीर संबंधित भारत की प्रभुसत्ता का किसी प्रकार से कोई हनन नहीं होता है।

‘कश्मीर’ के भारत होने पर हुर्रियत, उमर फारूक, यासीन मालिक और अली शाह गिलानी अक्सर आपत्ति उठाते हैं पर वाजपेयी के कश्मीर के प्रति ‘इंसानियत, जम्हूरियत और कश्मीरियत’ के मंत्र का जाप करते हुए वे भी वाजपेयी की सराहना करते हैं। प्रश्न यह उठता है कि अलगाववादियों के लिए कहीं इस मंत्र का अर्थ यह तो नहीं है कि साल 2003 तक राज्य के लोगों के साथ हैवानियत का बर्ताव किया जाता रहा था, राज्य में चुनाव में सरकारें केंद्र द्वारा थोपी जाती रही हैं और ‘कश्मीर’ के लोगों की भावनाओं एवम परंपराओं के साथ खिलवाड़ होता रहा है? अगर ऐसा नहीं है तो फिर ‘वाजपेयी के मंत्र’ का ऐसा क्या अर्थ हो सकता है कि अलगाववादी भी इसका ‘जाप’ करते हैं। (लेखक जम्मू-कश्मीर मामलों के अध्येता हैं)

 

दयासागर एक वरिष्ठ पत्रकार और जम्मू-कश्मीर विषयों के अध्येता हैं

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