काश्मीरी हिन्दुओं की वापसी ही PDP-BJP गठबंधन की परख

09 May 2016 16:40:17


दया सागर

दो साल होने जा रहे हैं जब यह समाचार मिला था कि कश्मीरी हिन्दू की घाटी को वापसी जल्द होने वाली है और केंद्र सरकार ने राज्य सरकार को कश्मीर घाटी में उन के लिए कॉलोनी बनाने के लिए जमीन चिन्हित करने को कहा है. एक बार  फिर से जब 2 मई 2016 को एक लिखित प्रश्न के उत्तर में केन्द्र सरकार में गृह राज्य मंत्री हरिभाई पराथिभाई चौधरी जी ने लोक सभा में यह कहा कि केन्द्र ने राज्य को कश्मीरी विस्थापितों के लिए जमीन चिन्हित करने को कहा है. पर इस के बाद जिस प्रकार के वक्तव्य कुछ कश्मीरी प्रथिक्तावादी नेताओं की ओर से और विस्थापितों की ओर से आए हैं उस से सरकारों को जमीनी सतह पर 25 साल के बाद भी कश्मीर घाटी में आज क्या स्थिति है इस को दयानतदारी से समझने का प्रयास करना चाहिए. सिर्फ इतना कहना कि कश्मीर घाटी कश्मीरी विस्थापित पंडितों का अपना घर है इस लिए वे कभी भी अपनी इच्छा से वापिस आ सकते हैं काफी नहीं है!

इतना ही नहीं कश्मीरी हिन्दू के बिना ‘कश्मीरियत’ अधूरी है ऐसा कहना कश्मीरी हिन्दु परिवारों के जख्मों पर मरहम लगाने के बजाए नमक छिडकता ही दिखता है क्योंकि बाहर रह रहे विस्थापित अभी तक वापिस आने लायक सुरक्षित एवं सम्मानजनक वातावरण होने के कोई लक्षण नहीं देख पा रहे हैं. केन्द्र सरकार पर्यटकों को तो घाटी आने के लिए उत्साहित करती दिखती है पर क्या कश्मीरी विस्थापितों में विश्वास पैदा करने के कोई प्रयास हो रहे हैं?

हर रोज़ कश्मीर घाटी के मुख्यधारा के नेता भी दिल्ली पर एक नया दोष लगाते हुए इस बात का दावा करते हैं कि ‘दिल्ली’ ने कभी कश्मीरियोँ पर विश्वास नहीं किया है! स्थिति यहाँ तक पहुँच चुकी है कि बात तो जम्मू कश्मीर की की जाती है पर इशारा कश्मीर घाटी और ‘कश्मीरियत’ की और ही होता है! इस लिए अब जम्मू कश्मीर की राजनिति में स्थिरता लाने में गतिरोध दूर करने के लिए केन्द्र और स्थानीय नेताओं को दयानतदारी से इस बात को मानना होगा कि विचारदारों की ‘दवा - दारू’ करने की जरूरत ज्यादा कश्मीर घाटी में है! डेवलपमेंट और बेरोजगारी जैसे विषयों की बात करना भी जरूरी है पर जब तक इस कटु सत्य को नहीं माना जाएगा कि कश्मीर घाटी का बहुसंख्यक समाज यहाँ 1947 में  जरूर 2 धर्मो आधारित राजनिति का विरोधी था पर वदले हुए वातावरण में अगर कश्मीर घाटी का बहुसंख्यक पाकिस्तान समर्थक नहीं भी है पर भी कम से कम आज़ादी या स्वायता का विरोधी तो नहीं है! और इन हालात में कश्मीर हिन्दू माइग्रेंट जकिनन वापसी को तैयार नहीं होंगे!

जम्मू कश्मीर में आमजन को मुख्यधारा और अलगाववाद के नाम पर खड़े किए जाते विवादों में पिछले 2 दशक से उलझाए रखा गया है! साल 1990 के पहले ज्यादातर प्लेबिसाईट या रायशुमारी से जुड़े विवाद जैसे विषय पर जो प्रश्न उठते थे उन को सत्ता की डोर पकडने वाले दल या नेता कभी कोई ख़ास महत्त्व नहीं देते थे. अब तो ऐसे हालात बन गए हैं कि मुख्यधारा और पृथकतावादी विचार धारा के बीच अन्तर की परिभाषा जम्मू कश्मीर के सन्दर्भ में कुछ अलग ही प्रकार की बन गई लगती है! अब तो वे लोग भी जो जम्मू कश्मीर राज्य की अन्तर्रष्ट्रीय स्तर की स्थिति पर उठते विवादों पर भी बिना शर्त के बात करने की वकालत करते हैं या सुझाव देते हैं भारत सरकार के लिए मुख्यधारा की श्रेणी में आते हैं.

दिल्ली में बीजेपी की सरकार आने के 2 साल बाद भी आज दूसरे राज्यों से पढने के लिए जम्मू कश्मीर आए विद्यार्थी श्रीनगर एनआईटी में अपनी शिक्षा जारी रखने के लिए केंद्रीय सुरक्षाबलों की तैनाती की मांग कर रहे हैं! यही नहीं कुछ छात्र तो कॉलेज को ही श्रीनगर के बाहर ले जाने की मांग कर रहे हैं, तो फिर ऐसे हालात में अगर कश्मीरी हिन्दू विस्थापित वापिस अपने घरों को नहीं लोट रहे तो क्या उन को दोष दिया जा सकता है, कतई नहीं! इसी प्रकार से कुछ और भी देखने में छोटी-छोटी बातें हैं जिन की और ध्यान देने की जरूरत को प्राथमिकता देनी होगी.

भारत विरोधी संस्थाएं एवम कुछ बुद्धिजीवी अपने इस आरोप को कि भारत ने “कश्मीर’ पर अपनी फ़ौज के द्वारा  कब्ज़ा कर रखा है, समूचे कश्मीरी हिन्दू माईग्रेन्ट्स की नावापसी को दिखा कर साबित करने की कोशिश करते दिख सकते हैं! इस लिए जम्मू कश्मीर के नेताओं और केन्द्र के नेताओं को अपनी आगे की निति बनाते हुए अपने लक्ष्य की सफलता को कश्मीर घाटी से बाहर रह रहे हिन्दू की वापसी में केन्द्रित करना होगा! जम्मू कश्मीर में शांति और स्थिरता का माहोल बनने के प्रयासों और नीतिओं का आकलन करने के लिए कश्मीरी हिन्दू की वापसी से बड़ा एवम साफ़ माप दंड और कोई नहीं हो सकता!

आज के सन्दर्भ में अगर यह कहें कि नही कांग्रेस की नज़र में और नही बीजेपी के दृष्टिकोण से पीडीपी का सेल्फरूल फ्रेमवर्क 2008 किसी भी प्रकार से जम्मू कश्मीर के संवैधानिक स्तर पर पूर्णतया एक भारतीय राज्य होने पर कोई अनुचित प्रश्न खड़े करता है तो ‘गलत’ नहीं होगा. इसी 12 अप्रैल को जम्मू में बीजेपी के एक समरोह में केन्द्रीय मंत्री और बीजेपी के शीर्ष नेता श्री अरुण जेटली जी ने अपने विचार कुछ इस प्रकार प्रकट किए हैं कि जम्मू कश्मीर में पीडीपी के साथ बीजेपी ने गठ्वंधन अळगाववादियों/ पृथकतावादियोँ को समाप्त करने के लिए किया है! इससे एक निष्कर्ष यह भी निकलता है कि बीजेपी की दृष्टि में पीडीपी के सेल्फरूल 2008 के मसोदे में कोई भी ऐसी आपतिजनक बात नहीं है जो जम्मू कश्मीर राज्य को भारत से दूर ले जाती दिखती हो जैसे कि जम्मू कश्मीर राज्य में भारत और पाकिस्तान की मुद्रा के मान्य होने, जम्मू कश्मीर राज्य संबंधित कुछ विषयों पर भारत और पाकिस्तान दोनों का संयुक्त प्रभुत्व स्वीकार करने; भारत, पाकिस्तान और दूसरे देशों के लिए आयात एवम निर्यात कर पर निर्णय का अधिकार जम्मू कश्मीर राज्य को देना और इन को भारत के संविधान के दायरे में लागू किया जा सकता है क्यों कि यह पृथकतावाद के घेरे में नहीं आते है? अगर पीडीपी बीजेपी के साथ भारत के विरुद्ध अलगाववाद को खत्म करने के लिए वचनबद्ध है तो यह बड़ी शुभ बात है! क्या ही अच्छा हो कि पीडीपी यह भी सार्वजानिक कर दे कि पीडीपी के सेल्फरूल 2008 में रखे गए जम्मू कश्मीर समस्या के समाधान के वे सुझाव जो किसी भी ढग से जम्मू कश्मीर के भारत के साथ अधिमिलन और भारत के संविधान के  अनुच्छेद -१ का आंशिक स्तर पर भी खंडन करते हैं उन पर नज़र्सनी कर दी गई है और मसोदे में बदलाव किए गए हैं. और यदि ऐसा नहीं है तो फिर किस प्रकार अलगाववाद को दोनों मिल कर खत्म करेंगे? जेटली जी का यह दावा प्रश्नों के घेरे में रहेगा और कश्मीर घाटी के हिन्दू विस्थपितों की वापसी पर भी प्रश्न लगे रहेगे!

दुविधाओं भरे वातावरण से जम्मू कश्मीर के लोग लगातार पिछले 6 दशक से जूझ रहे हैं पर फिर भी ऐसा लगता है कि राजनीतिक दलों के लिए उस पर चिंता करने की कोई ख़ास बात नहीं है सिवाए इस के कि किस तरह से सत्ता की कुर्सी के नजदीक रहा जा सकता है या सत्ता में बैठे विरोधी दल पर दबाव बनाया जा सकता है! अगर ऐसा न होता तो कश्मीर घाटी  केन्द्रित राजनिति  करने वाले दल यहाँ एक तरफ जम्मू कश्मीर से आर्म्ड फोर्सेज ( जम्मू कश्मीर ) स्पेशल पॉवर एक्ट को हटाने की बात करते हैं तो वे इस के साथ-साथ कश्मीर घाटी से 25 वर्ष से ज्यादा समय से बाहर रह रहे कश्मीरी हिन्दू की वापसी की भी बात करते और केन्द्र पर दवाव बनाते! पर ऐसा नहीं है.

( *दयासागर एक वरिष्ठ पत्रकार और जम्मू कश्मीर विषयों के अध्येता हैं)

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