35A तो असंवैधानिक लेकिन दिल्ली एग्रीमेंट-1952 की वैधता पर स्थिति साफ़ करे केंद्र

01 Jun 2016 21:22:29


भारत का संविधान लिखने के बाद और भारत की रियासत जम्मू कश्मीर के लिए जम्मू कश्मीर के विधान के लिखने के पहले, भारत के उस समय के कांग्रेस के शीर्ष नेता जवाहर लाल नेहरु ने उस समय के महाराजा हरी सिंह द्वारा नियुक्त किए गए प्रधानमंत्री शेख मोहमद  अब्दुल्लाह के साथ 1952 में एक समझोता किया था। इस समझोते को जवाहर लाल जी ने प्रधान मंत्री के नाते अपनी सरकार के सामने भी रखा था।

रिकार्ड्स में कहीं भी कोई ऐसा वर्णन मुझे नहीं मिला है जिस में उस समय के किसी शीर्ष नेता या मंत्री ने या संसद ने इस कथित समोझोते पर कोई प्रश्न खड़े किए हों। हाँ इतना जरूर है कि इस समझोते पर न ही महाराजा हरी सिंह और न ही उन के रेजेंट ( युवराज) की सहमति की कोई मोहर लगी थी। लोग इस समझोते की वैधता पर प्रश्न करते रहे है और करते भी हैं। कश्मीर घाटी के नेता और नेशनल कांफ्रेंस इस समझोते को भारत की जम्मू कश्मीर रियासत के भारत गणराज्य के साथ संवैधानिक संबंधों का मूल आधार मानते हैं। जम्मू कश्मीर की सरकारें इस समझोते का अक्सर अपने डाक्यूमेंट्स में जिक्र करती रही हैं। भारत सरकार ने भी कभी भी अधिकारिक स्तर पर इस के होने का या इस की कोई मूल वैधता का खंडन नहीं किया है। और न ही मई 2014 में दिल्ली में आई भाजपा सरकार ने इस पर अभी तक कोई वक्तव्य दिया है और न ही इस की अधिकारिक स्थिति पर कोई प्रश्नात्मक तथ्य जनता के सामने रखे हैं। जब की भारतीय जनता पार्टी (जन संघ) ही एक मात्र भारत का एक मात्र राष्ट्रीय दल रहा है जो इस अनुबंध (एग्रीमेंट) की किसी अधिकारिक या संवैधानिक मान्यता पर एक तरह से प्रश्न खड़े करता रहा है। इस लिए 1952 दिली एग्रीमेंट  को भारत सरकार के नजरिये  से अधिकारिक मान कर ही आगे चर्चा करेंगे।

इस अनुबंध जिस को 1952 दिल्ली एग्रीमेंट के नाम से जाना जाता है में लिखी गई कुछ बातों के आधार पर ही लगता है कुछ बातें भारत के संविधान का प्रत्यक्ष या अप्रत्क्ष ढंग से हिस्सा बनी, कुछ बातों को नज़र में रख कर भारत के राष्ट्रपति ने 1954 में  जम्मू कश्मीर से संबंधित एक संवैधानिक निर्देश दिया जिस के अंर्तगत भारत  के संविधान में संशोधन कर के एक नया अनुच्छेद 35A के नाम से डाला गया ( जिस पर मैंने काफी  सोच  विचार करने के बाद यह कहा है राष्ट्रपति द्वारा ऐसा करना संविधान में संशोधन करना है और राष्ट्रपति जी को ऐसा  करने का अधिकार भारत  का संविधान नहीं देता है) और जम्मू कश्मीर के 1956/57  में अपनाये गए विधान की कुछ धाराएं लिखी गई जो आज तक कई प्रकार के विवादों का कारण बनी हुई हैं पर उन को राष्ट्रपति के उस आदेश द्वारा भारत  के

संविधान में संशोधन कर के एक नए अनुच्छेद 35A की छत्रछाया में अभी तक संवैधानिक मान्यता मिली हुई  है।

आज के दिन अगर जम्मू कश्मीर में हालात शांति पूर्ण नहीं हैं और विदेशी शक्तियां भी इस राज्य में अस्थिरता बनाने में कुछ कामयाब हुई हैं तो इस के लिए यह कहना भी गलत नहीं होगा की जम्मू कश्मीर के कुछ मुख्यधारा के दलों या नेताओं ने जिस प्रकार से 1952 के दिल्ली एग्रीमेंट से जुड़े विवादों में जम्मू कश्मीर के लोगों को उलझाये रखा है एवं जिस प्रकार से दिल्ली की सरकारों ने आम आदमी तक तथ्य ले जाने में संवेदनहीनता दर्शायी है भी कुछ सीमा तक इस का कारण है।

जिन विषयों को जम्मू कश्मीर राज्य को पिछले 60 साल से विवादों और दूरियों के घेरे में रखा गया है उन में स्टेट सब्जेक्ट या जम्मू कश्मीर का स्थाई निवासी का दर्जा, भारत के वे नागरिक जो जम्मू कश्मीर के स्थाई निवासी हों उन के लिए सरकारी सेवा और सम्पति के ख़ास अधिकार, जम्मू कश्मीर का राज्य चिन्ह ( राज्य ध्वज) और जम्मू कश्मीर राज्य संबंधित लिखे जाने वाले संवैधानिक प्रावधानों के ढंग जैसे विषय कहे जा सकते हैं।

इस बात को भी नज़रंदाज़ नहीं किया जा सकता कि भारत  की  अन्य  रियासतों के लोगों ने या दलों ने भी (जैसे /शिवसेना /बीजेपी को छोड़ कर) इस बात के लिए अपने नेताओं को कभी नहीं पूछा, जब कि जम्मू कश्मीर के कुछ नेताओं को प्रश्न करने से उन को पूछने की ज्यादा  जरूरत थी। बीजेपी ने भी पूर्ण सत्ता में आने के बाद इस दिशा में कोई ख़ास दृष्टि डाली हो इस प्रकार के कोई सन्देश २ साल बीतने के बाद भी अभी तक नहीं मिले हैं।

भारत के संविधान के अनुच्छेद 370 को अक्सर विवादों के घेरे में धकेला जाता है। इस में कोई शक नहीं है कि अनुच्छेद -370  को सविंधान में डालने पर प्रश्न खड़े किए जा सकते हैं और इस के अस्थायी होने पर भी 67 साल बाद मौजूद होने पर चर्चा होनी चाहिए पर इस के अस्तित्व पर प्रश्न करना विधान की दृष्टि से शायद उचित न हो। जम्मू कश्मीर से संबंधित जिन कुछ विषयों की चर्चा ऊपर की गई है उन के लिए अनुच्छेद 370 को ही अधिकतर लोग दोषी ठहराते हैं जब कि ऐसा कहना पूर्णतया उचित नहीं है। अनुच्छेद 370 के अलावा भारत के संविधान में एक और अनुच्छेद है जो इस प्रकार के विवादों के लिए दोषी ठहराया जाना चाहिए और वह यही अनुच्छेद 35A है। अनुच्छेद 370 की संवैधानिक वैधता पर प्रश्न खड़े नहीं किए जा सकते पर अनुच्छेद 35A की संवैधानिक वैधता पर प्रश्न खड़े किए जा सकते हैं। इस अनुच्छेद के जन्म को ही असंवैधानिक कहा जा सकता है। जब मैंने इस अनुच्छेद पर नजदीक से नज़र डाली तो पाया बहुत से नीति के पंडित भी इस अनुच्छेद के बारे में अधिक नहीं जानते थे और इस पर उच्च्तम पीठ द्वारा विचार करने की मांग की जा सकती है।

भारत के संविधान में अनुछेद 35 A ( 1954) को भारत की रियासत जम्मू-कश्मीर के विधान के लिखने से पहले ही डाल दिया गया था। पर जिस बात पर विशेष ध्यान देने की अवश्यकता है वह यह है कि यह अनुच्छेद भारत की संविधान सभा ने लिखा था और न ही पारित किया था। अपितु यह अनुच्छेद राष्ट्रपति द्वारा अनुच्छेद 370 का सहारा ले कर डाला गया था जब कि अनुच्छेद 370 किसी भी दृष्टि से राष्ट्रपति को संविधान को बदलने का न कर्तव्य देता है न ही अधिकार देता है जबकि संविधान में कोई नया अनुच्छेद डालना संविधान में संशोधन करने जैसा  ही है। अनुच्छेद 35 A को संविधान में डालना एक तरह से संविधान में संशोधन करने जैसा ही है और इस लिए यह कहना किसी भी दृष्टि से गलत नहीं होना चाहिए कि अनुच्छेद-370 के अंर्तगत राष्ट्रपति को संविधान में संशोधन करने का इस प्रकार का अधिकार नहीं था। इतना ही  नहीं, कोई भी अगर अनुच्छेद 35 A  को ध्यान से पढ़ेगा तो उस के लिए यह समझना कठिन नहीं होना चाहिए की अगर संविधान सभा को भी ऐसा करने के लिए सुझाव दिया जाता तो वे कभी ऐसा नहीं करती और अगर करती तो सिर्फ उस की सोच पर ही प्रश्न लगते न कि अधिकार क्षेत्र पर।

इस लिए 1954 में संविधान ( जम्मू-कश्मीर को लागु होना) आदेश 1954 स।आ.48  मई 14, 1954 राष्ट्रपति द्वारा संविधान के अनुच्छेद 370 के खंड-1 में राष्ट्रपति को प्राप्त शक्तियों का नाम ले कर अनुच्छेद 35 के बाद संविधान में अनुच्छेद 35A के नाम से एक नया अनुच्छेद डाला जाना जरूर सवालों के घेरे में आता है क्योंकि इस प्रकार की कोई भी शक्ति संविधान में संशोधन करने की अनुच्छेद 370 के माध्यम से राष्ट्रपति जी को नहीं मिलती है। कोई भी संशोधन अनुच्छेद 368 के अंतर्गत ही किया जा सकता है और वह  भी सिर्फ संसद द्वारा ही।

यह ही नहीं इस नए अनुच्छेद को भारत के संविधान के मुख्य भाग में न रख कर के परिशिष्ट-1 के रूप में संविधान के साथ रखा गया। शायद यही कारण है कि किसी चिन्तक और विधि विश्लेषक का ध्यान इस के संवैधानिक पहलुओ की ओर इस द्रृष्टि से पिछले 6 दशक तक  नहीं गया था।

अनुच्छेद-35A की छाया में ही जम्मू कश्मीर विधान सभा एवं जम्मू कश्मीर सरकार द्वारा जम्मू कश्मीर में रहने वाले भारत के नागरिकों जो जम्मू कश्मीर के स्थायी निवासी की श्रेणी में आते हैं और भारत के अन्य नागरिकों के बीच भेदभाव किया जा सकता है। जम्मू कश्मीर के विधान की धारा-6, धारा-8, धारा-9, धारा-51, धारा-127 और धारा - 140, धारा-157

अनुच्छेद -35A के अंतर्गत ही संवैधानिक दृष्टी से अभी तक न्यायपालिका के सामने मान्य हैं और इन के भारत के विधान के अनुच्छेद 15,16,19 के उलंघन करने के बावजूद भी इन को असंवैधानिक नहीं कहा गया है। अनुच्छेद 35A में जो कुछ रखा गया है उस में बहुत सी बातों का स्त्रोत (मूल आधार) शेख अब्दुल्लाह और जवाहर लाल नेहरु के बीच हुए 1952 के दिल्ली एग्रीमेंट में है। मोदी सरकार को दिल्ली एग्रीमेंट 1952 की वैधता पर तो कम से कम अब अपना मत साफ़ करना चाहिए

( *दया सागर : एक बरिष्ठ पत्रकार, जम्मूकश्मीर विषय के अध्येता और सामाजिक कार्यकर्ता हैं ।[email protected])।

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