जम्मू और कश्मीर को जैसा मैंने देखा और समझा (भाग 2)

22 Aug 2016 16:04:54

P. Kumar

यात्रा वृतांत के इस भाग में मैं आपसे श्रीनगर के कुछ स्थानों के संस्मरण साझा करूँगा. जैसा कि मैंने पिछले लिखे वृतांत में बताया कई श्रीनगर में हमने जिन स्थानों के दर्शन किये वे हैं:-

इन सारे स्थलों का विवरण निन्मलिखित है :

1) सनातन धर्मशाला , लालचौक

2) चन्द्र चिनार उदासीन आश्रम , रीगल चौक

3) ज्येष्ठा देवी मंदिर , गुपकार रोड

4) गोपेश्वर महादेव मंदिर ,

5) विचारनाग मंदिर , विचारनाग , शौरा

6) मंगलेश्वर महादेव मंदिर , फत्तेकदल , डाउन टाउन

7) पोखरी बल मंदिर, हारी पर्वत

अब एक-एक करके मैं इन सब स्थलों के बारे में पाठकों को अवगत करना चाहूँगा.

सनातन धर्मशाला , लालचौक :

सभी बनी बनाई और सुनी सुनाई धारणाओं के विपरीत लालचौक को मैंने देखा । ये धारणाएं समाज में विधमान भी है और कुछ असमाजिक तत्वों और खास किस्म के समाचार पत्रों और चैनलों द्वारा उस नकारात्मक छवि को लगातार पोषित भी किया जाता रहा है ।

चौक के ठीक सामने विशाल भवन है , जिसके ऊपर बड़ा सा फलक लगा हुआ है " सनातन धर्मशाला " । एक बड़ा सा दरवाजा उस दरवाजे के अंदर जाने पर सामने ही माता का सुन्दर मंदिर । इस धर्मशाला में कई कमरे है और एक हॉलभी है । एक तरफ कुछ और भी निर्माण कार्य चल रहा है।

इस सनातन धर्मशाला के कर्त्ता धर्ता एक नेगी जी है, बड़े ही मिलनसार , उन्होंने हमें जानकारी दी की साल भर कोई भी व्यक्ति आकर इस धर्मशाला में ठहर सकता है। इस धर्मशाला में उन्होंने एक पचास लोगों के बैठने लायक हॉल भी बना रख है, और शायद कमरों और हॉल का किराया भी बहुत अल्प है।

चन्द्र चिनार उदासीन आश्रम :

लाल चौक से थोड़ा पहले ही है रीगल चौक, वैसे ये जगह ' शक्ति स्वीट्स ' के नाम से भी जानी जाती है। शक्ति स्वीट्स दुकान आश्रम के किराएदार है ।

मैं यहाँ उदासीन संप्रदाय, उसके उदभव, साधना, परंपरा और पंजाब तथा उत्तर भारत में उनकी अखण्ड उपस्थिति के ऊपर कोई चर्चा नहीं करना चाहूंगा। यहाँ प्रासंगिक ये है कि समाज से प्राप्त सम्मान और पैसो को संत समाज अनन्तोगत्वा समाज के काम में किस खूबी से लगाता है चन्द्र चिनार आश्रम इसका एक प्रत्यक्ष उदहारण है।

मंदिरों और आश्रमों में चंदा नहीं देना चाहिए ऐसा कुप्रचार तथाकथित बुद्धिजीवी लोग अपने ज्ञान और तर्कों का वमन समाचार पत्रों में करते है और नट - नाटियां फ़िल्मी पर्दे पर ज्ञान देते - देतीं है। किन्तु जम्मू एवं काश्मीर राज्य के बीते काले  अध्यायों के वर्षो में आस्था और विश्वास को किस तरह प्रज्वलित रखा गया है, चन्द्र चिनार आश्रम इसका एक ज्वलंत उदाहरण है और देशभर के उन लोगों को आइना भी दिखाता है जो कश्मीरियत में भरतीयत नहीं देखते। इस आहाते में कई मंदिर भी है।

इस आश्रम में यात्रियों के ठहरने बढ़िया व्यवस्था है और शुल्क तो शायद नाममात्र का। आश्रम के कुल कर्मचारियों में शायद चार मुस्लिम और छः हिन्दू है। आज इस आश्रम कर्ताधर्ता श्री चन्द्र बाबा है और साथ में है उनके गुरु द्वारा गाड़ी गयी जलती हुई लकड़ी जो अब एक विशाल चिनार वृक्ष बन गयी है।

ज्येष्ठा देवी मंदिर:

ललित होटल के सामने से गुपकार रोड से आगे जाने पर तीन तरफ पहाड़ से घिरा हुआ एक मनोरम मंदिर। माता पार्वती का मंदिर , ज्येष्ठ माता होने के कारण यहाँ उन्हें ज्येष्ठा देवी के नाम से जानते है। बढ़िया तरीके से संरक्षित बाग़, एक माताका प्राचीन  मंदिर और वही एक विशाल शिवलिंग का शिवमंदिर भी है । मंदिर क़ी अपनी सुन्दर धर्मशाला है, जिसका आरक्षण महीनो पहले इंटरनेट से कराना पड़ता है जहां ठहरने क़ी बढ़िया व्यवथा है। यात्रियों के कमरे व्यक्तिगत रसोई  क़ी सुविधा भी दी जाती है, वैसे एक सामूहिक रसोई भी है ।

मंदिर चारो तरफ जंगल से घिरा हुआ है। हमारे एक मित्र ने बताया कि मंदिर का बचा हुआ प्रसाद पाने के लिए जंगली भालू का आना सामान्य सी बात है।

गोपेश्वर महादेव मंदिर:

डल झील से आगे निसात बाग़ के करीब से होते हुए कुछ किलोमीटर कि दुरी पार करने पर यह शिव मंदिर स्थित है।

आतंकवाद के काले साये में ये पूरी तरह ध्वस्त हो गया था, परन्तु कुछ समाजसेवी संस्थाओं द्वारा इसका पुनःउद्धार करने का प्रयास जारी है। इस मंदिर के आहाते में एक जल स्त्रोत धरती के गर्भ से प्रकट होता है। इस कुंड को संरक्षित किया गया है और कुंड के सामने ही शिव जी का नया मंदिर बनाया गया है । शांत वातावरण ऐसा कि ध्यान युँ ही लग जाये । वैसे थोड़ी नजर घुमाने पर कश्मीरी हिन्दुओ के टूटे हुए घर या उन घरों के ध्वंसावशेष दिख पड़ते है। ऐसे आध्यात्मिक वातावरण में आतंक नफरत और मनहूस अतीत कि निसानी बनकर।

मंदिर जाने के लिए गाड़ी थोड़ी पहले ही छोड़कर पैदल जाना पड़ता है। वैसे शांति पान के लिए उत्तम स्थल है। यहाँ एक और अद्भुत चीज है और वो है, नवनिर्माण के समय थोड़ी सी खुदाई में ही प्राप्त कुछ मूर्तियां जो देखने से ही काफी प्राचीन नजर आती है। अब वो कितनी पुरानी है ये तो अध्ययन का विषयवस्तु है। और एक पत्थर जिसपर किसी प्राचीन लिपि में कुछ लिखा है। वहां मौजूद लोगों कि मान्यता है कि इस पत्थर कि लिखावट, सन्देश स्वयं भगवान श्रीकृष्ण द्वारा लिखा गया है। कोई भी दर्शनार्थी उस पत्थर को देख सकता है जो कि गणेशजी के मंदिर के पास लगा है।

विचार नाग मंदिर :

जैसा कि नाम से ही आभास होता है कि यह मंदिर एक पूजास्थल के साथ- साथ विचार मंथन स्थल भी हुआ करता था। एक विशिष्ठ प्रकार का आभास यहाँ जाने पर अनुभूत होता है। शहर और बस्ती के बीच होने के बावजूद यहाँ का अनुभव अनुभूति के योग्य है।

मुख्यतः तिन अलग अलग मंदिर यहाँ है और इन तीनो के बीच एक विशाल कुंड है। जिसमे भूगर्भीय जल आता रहता है। आज मंदिर अत्यन्त जीर्ण अवस्था में है, यहाँ पूजा नहीं होती  क्यू कि कुंड का जल रख रखाव के आभाव में मंदिर में प्रवेश कर चूका है इसलिए मंदिर स्थित देवता के दर्शन दूर से ही सम्भव हो पाता है। इनकी देखभाल करने वाले और अपने  ईस्ट को प्रतिदिन पूजित करने वाले कब के धर्मान्धता कि भेंट चढ़ चुके या पलायान कर चुके है।

इस मंदिर में सबसे विशिष्ठ बात जिसने मेरा ध्यान आकर्षित किया, वो यहाँ के आराध्य शिवलिंग है। आम पद्धति से अलग यहाँ शिवलिंग एक पत्थर के बने हुए यन्त्र पर स्थित है , जो अपने आप में एक अनूठी विशिष्ठता प्रदान करता है। और जब आराध्य इतने विशिष्ठ है तो उनके आराधक जरूर विशिष्ठ रहे होंगे। यही वो जगह है जहां पर सारे काश्मीर के लिए कश्मीरी पंचांग का निर्माण होता था। वो सारी खगोलीय गणना एवं तिथियों का लेख जोखा यही पर होता था। प्राचीन भारत का शोध संस्थान जो जाने कब से अनवरत, ज्ञान, विज्ञानं, तंत्र की मशाल बनकर समाज कार्य में लिप्त रहा। ज्ञानार्जन का केंद्र रहा परन्तु 1990 में  नफरत की आंधी न झेल पाया और आज वहां चारो तरफ घास उगी हुई है। जाने कब ये नफरत और मूर्खता की घास कटेगी और बुद्धि का कमल खिलेगा ।

मंगलेश्वर महादेव मंदिर :

फत्तेकदल बस्ती में डल झील के अंदर एक छोटे से टापू पर स्थित है ये मंदिर। मंदिर में जाने के लिए छोटी नाव का प्रयोग करना पड़ता है। यहाँ से कुछ ही दुरी पर हजरत बल दरगाह भी दिखाई पड़ती है।

ये टापू अंदाजन एक सवा बीघे का है। जिसपर कई पेड़ और पौधे है। भगवान भोलेनाथ का मंदिर और भवन में ही दो विशाल शहतूत के वृक्ष है, शिवलिंग के दोनों तरफ । मंदिर की छत से निकलकर मंदिर को छाया देते है। इस टापू के चारो तरफ डल झील का पानी बहता है, किसी समय शायद वो स्वछ और निर्मल रहा होगा और शायद उसी जल से महामृत्युंजय का जलाभिषेक भी होता होगा। किन्तु आज अनियंत्रित, अवैध शहरीकरण का दुष्प्रभाव यहाँ नजर आता है। जल झील का जल दूषित ही नहीं काला हो चूका है, यत्र तत्र कूड़े के ढेर किनारे पर देखा जा सकता है। शायद नगर प्रशासन ने अपनी जिम्मेदारियों से पूरी तरह हाथ धो रखा है।

पोखरी बल , हारी पर्वत :

हारी पर्वत के नीचे स्थित ये देवी का मंदिर महाराजा रणजीत सिंह जी ने बनवाया था। आज ये बढ़िया अवस्था में है और यहाँ C.R.P.F. की कंपनी इस मंदिर प्रांगण में ही रहती है। मंदिर के गर्भगृह में एक कुंड है और बाहर दो विशाल कुंड और बने हुए है इनमे से शायद एक स्नान के लिए प्रयुक्त होता है।

पहाड़ के ऊपर स्थित हारी ( माता ) के मंदिर के कारण ही सम्पूर्ण पहाड़ का नाम हारी पर्वत कहलाता है । और हारी माता की पूजा के दौरान हारी पर्वत की परिक्रमा का विधान है । माता हारी की यात्रा पोखरीबाल के दर्शन बिना सम्पूर्ण नहीं मणि जाती।

---क्रमश: (अगले वृतांत में अवन्तिपुरा और अनंतनाग का यात्रा वृतांत)

 

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