हुर्रियत कान्फ्रेंस का ईद पर संयुक्त राष्ट्र मिलेटरी आबजर्बर कार्यालय जाने के मायने ?

15 Sep 2016 15:06:38


डा० कुलदीप चन्द अग्निहोत्री

13 सितम्बर 2016 ईद का दिन था। इसे मुसलमान तो मनाते ही हैं ,  जम्मू कश्मीर में शिया समाज और गुज्जर समाज भी मनाते हैं । लेकिन हुर्रियत कान्फ्रेंस ने इस दिन कश्मीर घाटी के मुसलमानों का आह्वान किया है कि वे संयुक्त राष्ट्र संघ के मिलेटरी आबजर्बर के कार्यालय पहुँच कर प्रदर्शन करें और मिलेटरी आबजर्बर को ज्ञापन सौंपे । सुरक्षा बलों ने लोगों को वहाँ जाने नहीं दिया क्योंकि ईद की नमाज़ मस्जिद में अदा की जाती है मिलेटरी आबजर्बर के दफ़्तरों में नहीं । लेकिन इसने एक प्रश्न अवश्य खड़ा कर दिया है । संयुक्त राष्ट्र संघ के मिलटेरी आबजर्बर का यह कार्यालय श्रीनगर में क्या कर रहा है ? भारत सरकार ने इस कार्यालय और इसके काम को अरसा पहले मान्यता देना बन्द कर दिया था । 

1971 में भारत और पाकिस्तान के बीच द्विपक्षीय मसलों को लेकर शिमला संधि हो जाने के बाद इस कार्यालय की प्रासांगिकता समाप्त हो गई है । भारत सरकार ने इस कार्यालय से पत्र व्यवहार करना भी बन्द कर दिया है । संयुक्त राष्ट्र मिलेटरी आबजर्बर ग्रुप इन इंडिया एंड पाकिस्तान की स्थापना ,युद्ध विराम रेखा का उल्लंघन न हो , इसके लिए संयुक्त राष्ट्र संघ ने प्रस्ताव क्रमांक 91 द्वारा 1951  में की थी । इसी प्रस्ताव के क्रियान्वयन के लिए इसका कार्यालय श्रीनगर में भी खोला गया था । यदि हिन्दुस्तान या पाकिस्तान दोनों में से कोई भी युद्ध विराम रेखा का उल्लंघन करता था तो दूसरा पक्ष उसकी रपट तुरन्त संयुक्त राष्ट्र संघ के मिलेटरी आब्जर्बर के कार्यालय में करता था । शिमला समझौते में भारत- पाक सरकार ने निर्णय किया था कि दोनों सरकारों के बीच किसी भी विवाद को दोनों पक्षों के लोग आपस में द्विपक्षीय बातचीत से ही सुलझाएँगे । इसके साथ ही दोनों देशों के बीच युद्ध विराम रेखा समाप्त कर दी गई और उसके स्थान पर वास्तविक नियंत्रण रेखा का जन्म हुआ । अब जब युद्ध विराम रेखा ही नहीं है तो उसके उल्लंघन या उसकी रक्षा पर नज़र रखने के लिए बने संयुक्त राष्ट्र संघ के मिलेटरी आबजर्बर का काम भी समाप्त हो गया ।

लेकिन 1971 में संयुक्त राष्ट्र के प्रस्ताव क्रमांक 307/1971 द्वारा यह कहा गया कि संयुक्त राष्ट्र मिलेटरी आबजर्बर ग्रुप वास्तविक नियंत्रण रेखा के उल्लंघन के बारे में और उन घटनाओं के बारे में जिनसे वास्तविक नियंत्रण रेखा के उल्लंघन की संभावना हो सकती है , पर अपनी रपट देगा । जनवरी 1972 के बाद भी पाकिस्तान ने वास्तविक नियंत्रण  रेखा का अनेक बार उल्लंघन किया । लेकिन भारत ने कभी संयुक्त राष्ट्र संघ के श्रीनगर स्थित इस कार्यालय में शिकायत नहीं की क्योंकि इस कार्यालय का उपयोग अब कोई मायने नहीं रखता । संयुक्त राष्ट्र संघ के महासचिव स्वयं ही अरसा पहले घोषणा कर चुके हैं कि भारत पाकिस्तान के आपसी विवादों में संघ की कोई भूमिका नहीं है । व्यवहारिक दृष्टि से मिलेटरी आबजर्बर ग्रुप बेमानी हो चुका है । लेकिन फिर भी हर दो साल बाद संयुक्त राष्ट्र संघ इस ग्रुप के मुखिया की नियुक्ति करता है । अभी हाल ही में संयुक्त राष्ट्र संघ के महासचिव ने जून 2016 में स्वीडन के मेजर जनरल पेर लोदिन की इस पद पर दो साल के लिए नियुक्ति की ।
                 

लेकिन इस सब के बावजूद यह कार्यालय बिना किसी काम के घाटी में विद्यमान है । केवल घाटी में ही नहीं , दिल्ली में भी भारत सरकार ने मिलेटरी आबजर्बर के कार्यालय को बिना किसी किराए के भवन दे रखा है । पहली बार जुलाई 2014 में भारत सरकार ने ग्रुप को सरदार द्वारा हिना किराए के दिया गया भवन ख़ाली करने हेतु नोटिस जारी किया था । संयुक्त राष्ट्र संघ का आधिकारिक पक्ष यह है कि संघ ने अभी तक 1951 के अपने उस प्रस्ताव को जिसके अन्तर्गत मिलेटरी आबजर्बर ग्रुप की स्थापना की गई थी , निरस्त नहीं किया है । इसलिए यह कार्यालय भी विद्यमान है । लेकिन ताज्जुब तब हुआ जब प्रथम अगस्त 2016 को संयुक्त राष्ट्र के मुखिया के उप प्रवक्ता फ़रहान हक़ ने कहा कि संयुक्त राष्ट्र अपने मिलेटरी आबजर्बर ग्रुप के माध्यम से कश्मीर के हालात पर अपनी नज़र बनाए रखेगा । लेकिन इसके अगले ही दिन संयुक्त राष्ट्र के महासचिव बान की मून के प्रवक्ता स्टीफ़न दुजारिक ने स्पष्ट किया कि ग्रुप का काम वास्तविक नियंत्रण रेखा पर युद्ध विराम की स्थिति पर रपट देना मात्र है , इससे ज़्यादा उसका कोई कार्य नहीं है । ज़ाहिर है कश्मीर घाटी के कुछ जिलों में बनी हुई संवेदनशील स्थिति के बीच फ़रहान हक़ का यह राजनैतिक बयान है ।
               

 लेकिन असली प्रश्न तो यह है कि भारत सरकार के सहयोग के बिना यह ग्रुप कश्मीर घाटी में अपना कार्य कैसे कर सकता है ? नियंत्रण रेखा का उल्लंघन पाकिस्तान ने किया है , इसकी ख़बर तो इस ग्रुप को तभी लगेगी जब भारत सरकार इसको ऐसी सूचना देगी । लेकिन भारत सरकार ने ऐसी सूचना या शिकायत देना 1972 से ही बन्द किया हुआ है । ऐसी स्थिति में इस ग्रुप का कार्य करने का तंत्र क्या है ! क्या इसने अपने स्तर पर जासूस एवं भीतर की ख़बर देने वालों का नैटवर्क तैयार किया हुआ है ?
                   

आजकल इस कार्यालय का एक मात्र उपयोग हुर्रियत कान्फ्रेंस को यह सुविधा प्रदान करना है कि उसके प्रतिनिधि इस कार्यालय में जाकर भारत के ख़िलाफ़ अपना प्रतिवेदन जमा करवा आएँ । इस बार हुर्रियत कान्फ्रेंस ने इसके लिए सोची समझी रणनीति के तहत ईद का दिन चुना । स्वभाविक है इसकी ख़बर मीडिया प्रचारित प्रसारित करेगा ही । इससे आम कश्मीरी मुसलमान का यह भ्रम बना रहेगा कि अभी भी संयुक्त राष्ट्र संघ की किसी प्रकार की भूमिका कश्मीर मामले में बची हुई है । सभी जानते हैं कि विश्व राजनीति के बदलते रंगों के साथ साथ संयुक्त राष्ट्र संघ की भीतर की राजनीति भी बदलती रहती है । संयुक्त राष्ट्र संघ के भीतर भारत विरोधी राजनीति करने वाले देशों को मिलट्री आबजर्बर के इस कार्यालय की कश्मीर घाटी में उपस्थिति मात्र से समस्या के अन्तर्राष्ट्रीयकरण करने का रास्ता मिल जाता है । क्या संयुक्त राष्ट्र संघ के मिलेटरी आबजर्बर ग्रुप का यह कार्यालय भी घाटी में हुर्रियत कान्फ्रेंस के साथ मिल कर राजनैतिक ईद मना रहा है ? हुर्रियत कान्फ्रेंस और आतंकवादी/अलगाववादी दोनों ही जानते हैं कि इस कार्यालय का राजनैतिक उपयोग कैसे कँपना है । यही कारण है कि हुर्रियत कान्फ्रेंस और मीरवायजों ने कुछ साल पहले इस कार्यालय को मज़हबी पूजा स्थल घोषित कर दिया था । उन्होंने इसके लिए बाक़ायदा एक प्रस्ताव पारित कर इसका नाम रखा था यूएन शोएबुनस्तान । पर  अब समय आ गया है कि इस कार्यालय को भारत में बन्द कर देना चाहिए ताकि कश्मीर घाटी की भारत विरोधी ताक़तों का एक और डैन समाप्त किया जा सके ।

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