जम्मू-काश्मीर के पुर्नगठन की मांग के मायने।

15 Sep 2016 17:26:28

डॉ. शिवपूजन प्रसाद पाठक

पिछले दो महीने से उपजी हुई हिंसा का जायजा लेने सर्वदलीय प्रतिनिधि दल ने 4-5 सितम्बर को जम्मू-काश्मीर की यात्रा की। यह प्रतिनिधि मण्ड़ल जम्मू-काश्मीर में विभिन्न सामाजिक व राजनीतिक जीवन में प्रतिष्ठित लोगों से मिला। यह प्रतिनिधि दल लद्दाख नहीं गया। यह उसके यात्रा का हिस्सा भी नहीं था।


लेकिन यह पहली बार नहीं हुआ है। अधिकतर, जितने वार्ताएं या प्रतिनिधि दल जम्मू-काश्मीर गए, जम्मू और लद्दाख क्षेत्र की मुद्दों पर कम ही ध्यान दिया है। इसी के संदर्भ ’अखिल धार्मिक संयुक्त कार्यसमिति लद्दाख’ ने एक प्रेस वार्ता के माध्यम से भारत सरकार से यह मॉग की लद्दाख क्षेत्र को जम्मू-काश्मीर से पृथक कर केन्द्र शासित प्रदेश का दर्जा दे दिया जाय। यह मॉग भारत से अलग होने के मॉग नहीं है। उनका मानना है कि लद्दाख का अस्तित्व भारत के अस्तित्व के साथ ही है। इस मॉग ने एक पुरानी बहस को छेड दिया है कि क्या जम्मू-काश्मीर प्रान्त को तीन भागों में विभाजित किया जा सकता है? प्रस्तुत आलेख में ’वर्तमान संदर्भ में जम्मू-काश्मीर प्रान्त को तीन क्षेत्रों में विभाजन की मॉग करने वालों के क्या तर्क है और उसकी संभावना क्या है’ का विश्लेषण करने का प्रयास है।

’भारत एक उभरती हुई शक्ति है’ यह अब केवल अकादमिक जगत के विमर्श का विशय नहीं है। भारत ने अपने सैन्य, आर्थिक व सांस्कृतिक क्षमता से साबित कर दिया है कि वैश्विक राजनीति में उसकी प्रमुख भूमिका है। भारत की वैश्विक समुदाय में सक्रिय भूमिका निभाने की सोच उसके आन्तरिक आधार व और वैश्विक स्थिति से निकलकर आती है। स्थिर राजनीतिक व्यवस्था, सक्शम अर्थव्यवस्था व सशक्त सैन्य क्शमता के माध्यम से विश्व के मंच पर अपनी बात कहने की साहस दिखाया है। विश्व के कई देश इसको वास्तविक रूप में स्वीकार करने लगे है। उभरते हुए देश के सामने कई चुनौतियॉ होती हैं। भारत भी इसका अपवाद नही है। घरेलू और वैश्विक राजनीति मिलाकर भारत के सामने कई बाधाएं है। जम्मू और काश्मीर राज्य में आतंकवाद आन्तरिक सुरक्शा की प्रमुख बाधा है। बिना इसके समाधान के भारत की वैश्विक स्थिति कमजोर ही रहेगी।

जम्मू कश्मीर के पॉच क्शेत्र हैं-जम्मू, कश्मीर, लद्दाख, गिलगिट -बाल्टिस्तान, और मीरपुर-मुजफराबाद। गिलगिट-बाल्टिस्तान, मीरपुर और मुजफ्फराबाद वर्तमान में पाक.अधिकृंत पाकिस्तान में है। भारत के आधीन जम्मु, कश्मीर और लद्दाख क्शेत्र है। अब प्रश्न उठता है कि जम्मू-काश्मीर विशय के समाधान के लिए इन्हे तीन प्रान्तों या भागों में विभाजन की मॉग उचित है? ऐसी मॉग पहली बार नहीं हुई हैं। विभिन्न कारणों से देश की राजनीतिक ताकतों ने अलग-अलग संदर्भो में इस मॉग का समर्थन किया है। डॉ. अम्बेदकर ने जब नेहरू मंत्रिमण्डल से पद त्यागते समय इस मत का समर्थन किया था। राश्ट्रपति व्यंकटरमणन ने इन्दिरा गॉधी से अनुरोध किया था कि जम्मू-काश्मीर राज्य का पुर्नगठन किया जाय। राश्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने 2002 में अपने कुरूक्शेत्र की राश्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक में एक प्र्रस्ताव के माध्यम से राज्य को तीन क्शेत्रों में विभाजित करने का प्रस्ताव पारित किया था।

राज्य के पुर्नगठन की मॉग के पीछे कई आधार है।
पहला, यह तीनों क्शेत्र में भौगोलिक विविधता है। जम्मू, काश्मीर व लद्दाख अलग-अलग भौगोलिक इकाई है। दूसरा, इनमें सांस्कृतिक भिन्नता है। तीनों क्शेत्र के लोग अलग-अलग धर्म को मानते हैं। तीसरा, भाशायी विविधता है। इसके अतिरिक्त सबसे बड़ा कारण यह है कि सत्ता को केन्द्र श्रीनगर है। काश्मीर केन्द्रित नीतियॉ, संस्थाएं व योजनाएं अन्य दो भागों को पर अपना अधिपत्य या प्रभुत्व स्थापित कर देती है। जम्मु, कश्मीर और लद्दाख क्शेत्र है, उसमें जम्मू जनसंख्या के दृश्टि और लद्दाख क्शेत्रफल के दृश्टिकोण से बड़ा है, लेकिन विधानसभा में कश्मीर क्शेत्र के प्रतिनिधित्व सबसे अधिक है। काश्मीर घाटी में 46 सीटें विधान सभा है कि जबकि जम्मू और लद्दाख के हिस्से में 41 सीटें हैं। घाटी का राजनीतिक वर्चस्व है।

लद्दाख और जम्मू क्शेत्र की मॉग भारत विरोधी नहीं हैं। वे अलगाव की मॉग नहीं कर रहें हैं। राज्य के पुर्नगठन से उनकी सांस्कृतिक पहचान बनी रहेगी। ऐसा मानना है कि काश्मीर में वहाबी संप्रदाय का वर्चस्व स्थापित हो गया। इसका प्रसार वह जम्मू व लद्दाख क्शेत्र में करना चाहते हैं। जम्मू और लद्दाख अपनी सांस्कृतिक विरासत को बनाये रखना चाहते हैं। साथ ही, श्रीनगर के प्रभुत्ववाली नीतियों से मुक्ति मिल जायेगी। उदाहरण के लिए पिछले साठ दिनों से घाटी में हिंसा फैली हुई है, लेकिन इसमें हानि जम्मू और लद्दाख क्शेत्र का उठानी पड़ रही है। ये दोनों क्शेत्र भारत में पूर्णतः विलय की बात करते हैं, लेकिन घाटी क्शति की भरपाई इन दोनों से करनी पडती है। भारत में राज्यों पुर्नगठन भाशा, विकास व प्रशासनिक सुविधा के दृश्टि से हुआ है। समय-समय पर राज्यों की संख्या में परिवर्तन हुआ है। वर्तमान समय में 29 राज्य है और सात केन्द्रशासित प्रदेश हैं।

भारतीय संविधान के अनुसूची 1 में 15वें स्थान पर जम्मू-काश्मीर का नाम आता है। जम्मू-काश्मीर का भू-क्शेत्र दर्शाते हुए यह कहता है कि यह ’वह राज्यक्शेत्र जो इस संविधान के प्रारंभ से ठीक पहले जम्मू-काश्मीर राज्य में समाविश्ट था।’ अर्थात जम्मू-काश्मीर प्रान्त में वह भूमि शामिल है जो महराजा के विलय के समय उनके राज्य में था। इसमें जम्मू, काश्मीर, लददाख व गिलगिट सीमान्त इलाका का क्शेत्र शामिल है। वर्तमान समय में जम्मू-काश्मीर प्रान्त का सम्पूर्ण क्शेत्रफल 222, 236 वर्ग किमी. है जिसमें 101,437 वर्ग किमी भारत के पास है। शेश भूमि पाकिस्तान और चीन के नियंत्रण में है। पाकिस्तान के हिस्से को भारत के दृश्टिकोण से ’पाक अधिक्रांत जम्मू काश्मीर’ के नाम से जाना जाता है जो दो भागों में विभाजित है। इसका क्शेत्रफल 78114 वर्ग किमी है। इस भूभाग को पाकिस्तान के उपनिवेश के रूप में विकसित किया जा रहा है।

वर्तमान संदर्भ में केन्द्र की सरकार ने अधिकारिक रूप से घोशणा की ’पाक अधिक्रांत काश्मीर’ को ’पाक अधिक्रांत जम्मू काश्मीर’ कहा जाय। यह पहला अवसर जब भारत सरकार ने इस भूभाग को कोई नाम दिया है। दूसरी बात भारत सरकार राश्ट्रीय सलाहकार अजीत डोवाल ने कहा कि भारत की 106 किमी. सीमा अफगानिस्तान से मिलती है। इसका अर्थ ’पाक अधिक्रांत जम्मू काश्मीर’ के भू सीमा से है। इसी संदर्भ में, भारतीय संसद ने 22 फरवरी 1994 को सर्वसम्मति से यह संकल्प प्रस्ताव पारित किया है कि भारत की एकता, प्रभुसत्ता और अखण्ड़ता के विरूद्व हर तरह के शडयंत्रों का प्रतिरोध करने की ईच्छा और क्शमता भारत में है और पाकिस्तान को भारत के राज्य जम्मू और कश्मीर के सभी क्शेत्र को खाली कर देना चाहिए जिन्हे आक्रमण कर हथिया लिया है।
आज भारत की विदेशनीति और कूटनीति ’पाक अधिक्रांत जम्मू काश्मीर’ पर केन्द्रित है। प्रधानमंत्री और उनके कार्यालय में कार्यकरने वाले मंत्री जितेन्द्र सिंह के बयान लगातार यही संकेत दे रहें है कि जो भी बात होगी वह ’पाक अधिक्रांत जम्मू काश्मीर’ की होगी। ऐसी स्थिति में जम्मू-कश्मीर को तीन प्रान्तों या केन्द्रशासित प्रदेश विभाजन की सलाह अस्वीकार ही होगी। लेकिन यह एक राजनीतिक अनुमान है। भविश्य इसको सही या गलत साबित कर सकता है।
(11 सितम्बर 2016 को राश्ट्रीय सहारा में प्रकाशित)

 

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