15 अगस्त 1947 से पहले का भारत पार्ट 1

13 Oct 2017 12:20:40


अवनीश राजपूत  नीरज मिश्रा

भारतीय गणतंत्र के उन्नतीस राज्यों की सूची में जम्मू-काश्मीर का नाम 15वें स्थान पर आता है। अपनी भौगोलिक स्थिति के कारण भारत का यह उत्तरी राज्य आज पाकिस्तान, चीन, ताजिकिस्तान और अफगानिस्तान से घिरा होने के कारण सामरिक रूप से महत्वपूर्ण भी है और संवेदनशील भी। प्राचीन काल से जिस क्षेत्र को धरा का स्वर्ग कह कर पुकारा जाता है, वह राज्य देश की स्वतंत्रता संग्राम के दिनों में ही हमारे तत्कालीन राजनैतिक नेतृत्व की अदूरदर्शिता एवम व्यक्तिगत आकांक्षाओं के हत्थे ऐसा चढ़ा कि आज तक बिलख और धधक रहा है। विखंडित और संतापग्रस्त जम्मू-काश्मीर के विषयों पर स्वतंत्र भारत में चर्चा और विमर्श तो खूब हुआ है, लेकिन दुर्भाग्यवश इस प्रक्रिया में कानूनी और संवैधानिक प्रक्रियाओ और तथ्यों को अनदेखा किया जाता रहा है। कुछ लिखित अथवा मौखिक राजनैतिक बयानबाजियों को वैधानिक दस्तावेजों की तुलना में अधिक महत्व देकर कुछ कथित बुद्धिजीवियों और समकालीन इतिहास के ठेकेदारों ने सीधी सपाट बातों को बहुत अधिक उलझा दिया है। अभिप्राय यह है कि जिन्हें प्रश्नों के उत्तर तलाश कर देश और दुनिया के समक्ष प्रस्तुत करने का दायित्व था उन्होंने ही आत्मघाती बनकर नए और कपोल काल्पनिक प्रश्नों पर आधारित चक्रव्यूह रच डाला। ऐसा चक्रव्यूह जो जम्मू-काश्मीर के सत्य को सहजता से उभरने नहीं देता।

अंग्रेजों को भारत छोड़कर अपने देश लौटना था। जिस भारत को वे 15 अगस्त 1947 में आजाद करने जा रहे थे उस पर उनका शासन दो व्यवस्थाओं से चलता था। या यह कहा जा सकता है कि अंग्रेजी राज की काली छाया में भारत में दो प्रकार के शासित भाग थे। पहला ब्रिटिश भारत कहलाता था, जिसका शासन सीधे लंदन में बैठे राज्य के सचिव की कलम से चलता था, जबकि दूसरे भाग में भारतीय रियासतें आती थीं। भारतीय रियासतों के अपने अपने महाराजा, राजा या नवाब आदि नामधारी शासक थे। परन्तु ये सब भी ब्रिटेन की महारानी के प्रमुख में थे। कहा यूं भी जा सकता है कि ब्रिटिश भारत पर अंग्रेजो की सीधी हुकूमत थी, जबकि 565 रियासतों में रहने वाली प्रजा पर अंग्रेज राजा/नवाब के माध्यम से राज करते थे। क्षेत्रफल के लिहाज से भारत का 60 फीसदी ब्रिटिश भारत था, जोकि प्रान्तों में बंटा हुआ था। इनका राजकाज ब्रिटेन की सांसद द्वारा नामित भारत के वायसराय के माध्यम से चलाती थी। देसी राजे-महाराजे और नवाब शेष 40 फीसदी भारत के शासक थे। इन सभी भारतीय रियासतों के राजाओं ने ब्रिटिश सत्ता के प्रति अपनी निष्ठा विधिवत घोषित की हुई थी। अप्रत्यक्ष रूप से अंग्रेजो द्वारा शासित यह राज्य कानून-व्यवस्था, नागरिक अधिकारों, स्वास्थय एवं शिक्षा एवं आंतरिक विकास सरीखे मामलो में निर्णय लेने के लिए स्वतंत्र थे। जम्मू-काश्मीर की रियासत भी इन्ही में से एक थी। समझने की बात यह है कि रियासतों के मामले में सर्वोच्चता ब्रिटिश क्राउन की ही थी। सर्वोच्चता के इसी सिद्धांत की भावना का प्रयोग कालांतर में भारत बंटवारे और राज्य के एकीकरण की प्रक्रिया में बारम्बार हुआ है। अंग्रेजो ने भारतीय रियासतों के साथ अपने शासकीय रिश्तों को परिभाषित करने के लिए जो व्यवस्था बनाई उसे ही वो सर्वोच्त्ता ;च्ंतंउवनदजबलद्ध कहते थे। आंशिक या सांकेतिक राज देसी राजाओं का रहे और धमक-धौंस ब्रिटिश क्राउन की, इसके लिए सब रियासतों के राजाओ ने अंग्रेजो के साथ कोई न कोई संधि या करार किया था। इनमें से 40 रियासतों ने सर्वोच्च सत्ता अर्थात ब्रिटिश क्राउन के साथ संधियां की थी। अधिकांश रियासतों ने सनद कहलाने वाले दस्तावेजों पर  हस्ताक्षर किए थे, जिसके अनुसार उन्हें ब्रिटिश क्राउन से कुछ सशर्त अधिकार व शक्तियां प्राप्त थी। कुछ अन्य रियासतों को क्राउन ने किसी न किसी तरह से मान्यता दे रखी थी। इस प्रक्रिया में क्राउन ब्रिटिश भारत और भारतीय रियासतों की प्रतिरक्षा के लिए उत्तरदायी था। रियासतों की आंतरिक सार्वभौमिकता और कार्यविभाजन को ब्रिटिश क्राउन की स्वीकृति प्राप्त थी। इन रियासतों का कोई अंतर्राष्ट्रीय दर्जा नहीं था। अन्य देशों से युद्ध अथवा शान्ति और संवाद या करार करने का अधिकार केवल और केवल ब्रिटिश क्राउन को था। इतना ही नहीं अगर सर्वोच्च सत्ता अर्थात ब्रिटिश क्राउन कोई अंतर्राष्ट्रीय करार कर लेती तो राजा/नवाब उसका निर्वहन करने के लिए बाध्य थे।

 

स्वाधीनता के बाद रियासतों की स्थिति

भारत को स्वतंत्र करने के लिए ब्रिटिश संसद ने भारतीय स्वतंत्रता अधिनियम 18 जुलाई, 1947 को पारित किया। इसमें भारत को स्वतंत्र करने की तिथि निश्चित कर दी गई। इसमें स्वतंत्र भारत को ब्रिटिश भारत का उत्तराधिकारी घोषित किया। ब्रिटिश भारत के कुछ हिस्सों को अलग कर पाकिस्तान डोमिनियन बनाने का प्रावधान भी इसी अधिनियम में किया गया। इसी अधिनियम के अंतर्गत ‘‘निर्धारित तिथि’’ 15 अगस्त 1947 को दो नए अधिराज्य (डोमिनियन) बनने के साथ ही ब्रिटिश सरकार की भारतीय रियासतों पर सर्वोच्चता और शासन भी स्वतः समाप्त होना निर्धारित हुआ। इसका अर्थ था कि राजे रजवाड़ों के जो भी सम्बन्ध ब्रिटिश क्राउन के साथ संधियां या, करार के द्वारा थे, वे तत्काल प्रभाव से समाप्त होंगे और इनके तहत राज्यों पर ब्रिटिश क्राउन की सब तरह की संप्रभुता, शक्ति और अधिकार पूरी तरह से समाप्त होंगे। इस प्रकार स्वतंत्र होने वाली रियासतों के भविष्य की दिशा अंग्रेज पहले ही घोषित कर चुके थे। 3 जून 1947 को ब्रिटेन के तत्कालीन प्रधानमंत्री ऐटली ने साफ कहा था कि ब्रिटिश सरकार की देसी रियासतों के सम्बन्ध में नीति वही रहेगी, जो 12 मई, 1946 के कैबिनेट मिशन ज्ञापन में वर्णित की जा चुकी है।

 

कैबिनेट मिशन का मेमोरेंडम कहता है:-

‘‘कि क्राउन के साथ संबंधो के चलते रियासतों को जो सुरक्षा का वायदा, वह समाप्त हो जायेगा और परमोच्चयता के अंतर्गत जो अधिकारप्राप्त अधिकार सर्वोच्च सत्ता अर्थात क्राउन को इन रियासतों ने आत्मार्पित कर रखे थे, वे रियासतों को वापिस प्राप्त हो जायेंगे।’’

इसी ज्ञापन के पैरा 5 में कहा गया कि:-

‘‘रियासतों और ब्रिटिश भारत के बीच स्थापित राजनितिक व्यवस्थायंे समाप्त हो जायेंगी, इसके चलते जो शून्यता या खालीपन आएगा, उसे रियासतें ब्रिटिश इंडिया की उत्तराधिकारी सरकार या सरकारों के साथ संघीय सम्बन्ध स्थापित करके भरेंगी और ऐसा न हो पाने कि स्थिति में रियासत/रियासतें विशेष राजनैतिक व्यवस्था ब्रिटिश इंडिया की उत्ताधिकारी सरकार या सरकारों के साथ स्थापित करेंगी।’’

कैबिनेट मिशन की जिस भावना और व्यवस्था का वर्णन ऐटली ने भारतीय स्वतंत्रता अधिनियम पारित होने से पहले अपने अधिकारिक वक्तव्य में किया था उसको व्यवहार में लाने के लिए माउंटबेटन ने देश भर के राजाओ की एक बैठक इस अधिनियम के तत्काल पारित होने के बाद बुलाई। देसी राज्यों के राजाओ और उनके प्रतिनिधियों की बैठक 25 जुलाई, 1947 को हुई। माउंटबेटन ने राजाओं से कहा कि उनके साथ ब्रिटिश क्राउन के प्रतिनिधि के रूप में यह उनकी पहली एवं आखिरी बैठक है। (क्योंकि 15 अगस्त को क्राउन का राजाओ से सम्बन्ध समाप्त होना तय हो चुका था।) अपने इस संबोधन में माउंटबेटन ने राजाओं को याद कराया कि कैबिनेट मिशन योजना के अंतर्गत राज्यों को रक्षा, संचार एवं विदेश सम्बन्धी मामले अधिराज्य सरकार को सौंपने चाहिए और इस बारे में कमोबेश सभी राजा और रियासते इस प्रस्ताव को न्यायपूर्ण और तर्कसंगत पहले ही मान चुके है।

माउंटबेटन ने राजाओ को साफ किया कि ब्रिटेन से आजादी मिलने के बाद अर्थात 15 अगस्त के बाद रियासतों के भारत और पाकिस्तान के साथ क्या सम्बन्ध हों, इसकी देखरेख करने के लिए दोनों देशों के लिए स्टेट्स डिपार्टमेंट बनायें गए हैं। भारत में सरदार वल्लभ भाई पटेल इसके मुखिया हैं और पाकिस्तान के लिए यह भूमिका सरदार रब निश्तार अदा करेंगे। माउंटबेटन ने कहा कि हालांकि देसी रियासतें भारत या पाकिस्तान के साथ जुड़ने का निर्णय लेने के लिए स्वतन्त्र हैं, मगर भौगोलिक कारणों से अधिकांश के पास भारत से जुड़ना ही एकमात्र विकल्प है। यहां यह भी बता दिया गया कि भावी पाकिस्तान के साथ जिनका जुड़ाव संभव हैं, उनके साथ जिन्ना अलग अलग समझौता-वार्ता करेंगे। मगर भारत के साथ आने वाले राज्यों के लिए पृथक वार्ता या व्यवस्था करना संभव नहीं होगा। इसी उलझन से बचने के लिए माउंटबेटन ने कहा कि सब रियासतों और उनकी प्रजा के हित में यही होगा कि वे तीन अहम विषयों को केंद्र को सौंपने का निर्णय लेते हुए इस बैठक में वितरित किए जा रहे अधिमिलन पत्र पर हस्ताक्षर करें। उल्लेखनीय यह भी है कि रियासतों के लिए इस प्रकार भारत का अंग बनने का रास्ता 1935 के भारत शासन अधिनियम (गवर्नमेंट ऑफ इंडिया एक्ट) में पहले से ही बना दिया गया था। अपने इस महत्वपूर्ण भाषण में माउंटबेटन ने रियासतों के भारत अथवा पाकिस्तान के साथ जुड़ाव की प्रक्रिया के लिए सीमित स्वतंत्रता का उल्लेख तो किया मगर कहीं भी किसी रियासत के पूर्ण रूप से स्वतंत्र अर्थात दोनों नवगठित देशों में से किसी से भी जुड़े बिना रहने के अधिकार का कोई वर्णन नहीं किया। वस्तुतः इस तरह का कोई अधिकार किसी भी वैधानिक व्यवस्था में किसी भी राज्य को नहीं दिया गया था।

उपरोक्त चर्चा का निष्कर्ष यह है कि देसी रियासतों के पास भारत अथवा पाकिस्तान से जुड़ने का विकल्प था। इस सम्बन्ध में निर्णय लेने का अधिकार सम्बंधित देसी रियासतों के राजाओं को था। जुड़ाव में भौगोलिक परिस्थितियों के महत्व को भी सिद्धांततः स्वीकार किया गया। अंततः अधिकांश रियासतों ने अधिमिलन पत्र पर हस्ताक्षर कर दस्तावेज माउंटबेटन के सामने मंजूरी के लिए पेश किया। इस पर बतौर गवर्नर जनरल माउंटबेटन के हस्ताक्षर होने के साथ ही सम्बंधित रियासत के भारत में अधिमिलन की प्रक्रिया पूर्ण हो गयी। जम्मू- काश्मीर के महाराजा हरि सिंह ने भी अन्य राजा/रजवाड़ों के जैसे अधिमिलन पत्र पर हस्ताक्षर किए। और इसी दस्तावेज के आधार पर आज समूचा जम्मू-काश्मीर भारत का अभिन्न अंग है।

 

मानक अधिमिलन पत्र एवं सबके लिए एक ही अधिमिलन की प्रक्रिया

देसी राज्यों के भारत में अधिमिलन की एक वैधानिक प्रक्रिया थी, जिसे चरणबद्ध तरीके से पूर्ण किया जाना था। सबसे पहले सम्बंधित राजा को अधिमिलन पत्र के प्रपत्र में अपना व अपने राज्य का नाम डालकर, उस पर अपने हस्ताक्षर एवं मोहर अंकित करनी थी। इस प्रपत्र में प्रतिरक्षा, विदेशी मामलो एवं संचार विषयों के लिए भारतीय डोमिनियन में

अपनी रियासत के अधिमिलन की बात कही गई थी। इस प्रपत्र का मानक स्वरुप (प्रपत्र में किसी प्रकार का संशोधन करने की छूट किसी राजा या किसी अन्य व्यक्ति को नहीं थी।) 1935 के गवर्नमेंट ऑफ इंडिया एक्ट के सेक्शन सात में दिया गया था। इसका स्वरुप रियासती राजाओ से विमर्श एवं सहमति के आधार पर ही निर्धारित हुआ था। इसका उद्देश्य सभी भारतीय राज्यों को भारत के संवैधानिक ढांचे में समुचित ढंग से समायोजित करना था। यह तय था कि राजा द्वारा हस्ताक्षरित अधिमिलन पत्र अगले चरण में स्वीकृति के लिए भारत के गवर्नर जनरल के सम्मुख प्रस्तुत किया जाएगा। ऐसे किसी भी अधिमिलन पत्र पर गवर्नर जनरल की स्वीकृति की मोहर अधिमिलन प्रक्रिया का अंतिम चरण था। सभी भारतीय रियासतों के लिए अधिमिलन की उपरोक्त प्रक्रिया और उसके चरण एक जैसे थे। यह भी ध्यान रखने की बात है कि गवर्नर जनरल को अधिमिलन पत्र पर कोई शर्त लगाने का अधिकार नहीं था।

राज्यों के अधिमिलन की वैधानिक प्रक्रिया का जो वर्णन पूर्व के अध्यायों में किया गया, उसके प्रकाश में जम्मू-काश्मीर के अधिमिलन के घटनाचक्र का क्रमवार और तथ्यों पर आधारित विश्लेषण आवश्यक है। ऐसा इलसिए क्योंकि कुछ पाकिस्तान परस्त तत्व इस प्रक्रिया पर बेतुके और निरर्थक सवाल उठाने से नहीं चूकते। यह अलग बात है कि उनकी किसी भी दलील का कोई वैधानिक या एतिहासिक आधार नहीं होता। ऐसे भारत विरोधी तत्वों दवारा दस्तावेजों और एतिहासिक घटनाक्रम की अनदेखी कर कुछ वक्तव्यों/पत्रों के आधार पर अपनी बात को तर्कसंगत बनाने का प्रयास होता है।

15 अगस्त, 1947 को भारतीय स्वतंत्रता अधिनियम के अनुसार जम्मू काश्मीर की रियासत का ब्रिटिश राजसत्ता से सम्पूर्ण सम्बन्ध विच्छेद हो गया। रियासत भारत अथवा पाकिस्तान में से किसका वरण करे इसका निर्णय करने का अधिकार वैधानिक तौर पर महाराजा हरि सिंह को हस्तांतरित हो गया। महाराजा हरि सिंह भारत में अधिमिलन करना चाहते थे किन्तु तत्कालीन सबसे बड़े भारतीय नेता नेहरु जी ने शेख को सत्ता में भागीदार बनाने की पूर्व शर्त लगाई, जिसके लिए महाराज तैयार नहीं थे।जब-जब महाराजा ने भारत से अधिमिलन करने के लिए प्रयास किये, उन्हें उत्साहित करने की बजाये हतोत्साहित ही किया गया। दुविधा के इस कालखंड में 16 अगस्त को भारत और पाकिस्तान को यथास्थिति करार का प्रस्ताव टेलीग्राम के माध्यम से भेज दिया। यह एक सहज स्वाभाविक प्रक्रिया थी। पाकिस्तान ने जवाबी टेलीग्राम से यह प्रस्ताव स्वीकार कर लिया। जबकि भारत सरकार ने जम्मू कश्मीर के प्रधानमंत्री को इस सम्बन्ध में बातचीत के लिए दिल्ली आने का निमंत्रण दिया। जम्मू कश्मीर पर निगाहें गड़ाए बैठे पाकिस्तान ने जहां एक तरफ यथास्थिति करार करके जम्मू कश्मीर रियासत के साथ सहयोग का आश्वासन दिया, वहीं पीठ में छुरा घोंपते हुए कबाइलियों का रुप घरे पाकिस्तानी सेना ने एक साथ कई स्थानों पर जम्मू कश्मीर में घुसपैठ शुरू कर दी। यह साफ तौर पर विश्वासघात था। जम्मू कश्मीर की रियासत की तरफ से ब्रिटेन के प्रधानमंत्री को हस्तक्षेप के लिए एक पत्र भी लिखा गया। एक टेलीग्राम पाकिस्तान को भी भेजा गया। जिसके जवाब में षड्यंत्रकारी पाकिस्तानी राजनैतिक नेतृत्व ने इसे कबाइली हमला बताया ओर साथ ही कबाइलियों को हथियार देने और उनमें अपने सैनिकों की भागीदारी से साफ इनकार किया। बहरहाल सीमा की संकटपूर्ण स्थिति और उठापटक के कारण जम्मू कश्मीर के प्रधानमंत्री और उनका कोई प्रतिनिधि दिल्ली नहीं आ सका। परिणामस्वरुप भारत के साथ यथास्थिति करार नहीं हो पाया। भारत के साथ यथास्थिति करार न होने को पाकिस्तान समर्थक लोग कुछ यूं पेश करते हैं मानों इससे भारत और जम्मू कश्मीर के सम्बन्ध और अधिमिलन की प्रक्रिया प्रभावित होती हो। जबकि सच्चाई यह है कि यथास्थिति करार होने या न होने का अधिमिलन की प्रक्रिया से कोई प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष सम्बन्ध नहीं है। इस समझौते के न होने के बावजूद भारत और जम्मू कश्मीर के बीच संवाद और सम्बन्ध भारतीय स्वतंत्रता अधिनियम के तहत पूर्ववत बरकारार रहे। जबकि पाकिस्तान ने समझौते करने के बावजूद जम्मू कश्मीर पर आक्रमण कर अपने समझौते को खुद ही तहस-नहस कर डाला।

पाकिस्तान के साथ यथास्थिति समझौते के तहत महाराजा ने संचार खाद्य आपूर्ति और पोस्ट व टेलीग्राफिक व्यवस्थाओ को ज्यो का त्यों रखने की बात की थी। पाकिस्तान ने हाँ कर के भी जम्मू काश्मीर रियासत के साथ यह करार चंद दिनों के भीतर तोड़ दिया। जबकि दूसरी और भारत के साथ उस समय कायम सम्बन्ध पाकिस्तान के मुकाबले कही अधिक विषयों पर थे और भारत ने यथास्थिति करार न हो पाने के बावजूद राज्य के अधिमिलन होने तक बेरोक टोक जारी रखे। इस से स्पष्ट होता है कि जम्मू काश्मीर के साथ किये गए वायदे भारत ने नहीं पाकिस्तान ने तोड़े।जैसे ही भारत ने यथास्थिति करार करने के लिए प्रत्यक्ष आने का निमंत्रण दिया। पाकिस्तान की बेचैनी बढ़ गयी उसकी यही बेचैनी 31 अगस्त को उसके द्वारा यथास्थिति करार तोड़े जाने की वजह बनी। जम्मू कश्मीर पर दबाव बनाने के लिए पाकिस्तान ने 18 सितम्बर को जम्मू कश्मीर एवं सियालकोट के बीच रेल सेवा बेवजह निलंबित कर दी। उधर हथियार बंद गिरोह पूँछ के पलंदरी क्षेत्र में घुस आये।        18 सितम्बर तक पाकिस्तानी हमला गति पकड़ चुका था।     3 अक्टूबर को जम्मू-काश्मीर की सरकार ने टेलीग्राम से ‘मरे हिल्स’ के रास्ते सैंकड़ो सशस्त्र पाकिस्तानियों की घुसपैठ की घटना पर अपना विरोध जताया। हमले में पाकिस्तान की नियमित सेना की भागीदारी के अनेक प्रमाण रिकॉर्ड पर उपलब्ध हैं। जिनमें आधिकरिक पत्र, अधिकारियों और सैनिकों की डायरियां और समाचार पत्रों में छपी खबरे शामिल है। इस अघोषित युद्द में पाकिस्तान की तरफ से आवशयक सामग्री और पेट्रोल की आपूर्ति बंद कर दी गयी। इसी बीच पाकिस्तानी सेना का एक अधिकारी, जिसका नाम जम्मू काश्मीर के प्रधानमंत्री मेहर चंद महाजन, अपनी पुस्तक में मेजर शाह लिखते है, श्रीनगर आया। उसने महाराजा हरिसिंह और मेहर चंद महाजन पर रियासत को पाकिस्तान में मिलाने के लिए दबाव डाला। बातचीत में मेहर चंद महाजन ने पाकिस्तान द्वारा रसद रोके जाने का मामला उठाया और कहा कि कोहाला और सियालकोट में रोकी गयी आपूर्ति श्रृंखला बहाल होनी चाहिए। मेजर शाह को महाजन की यह बात तर्क संगत लगी और उसने जिन्ना को एक तार भेज कर बाधित आपूर्ति पुनः प्रारम्भ करने की बात की। किन्तु जिन्ना जम्मू काश्मीर के पाकिस्तान में अधिमिलन होने तक कुछ भी सुनने को तैयार नहीं थे। इस बीच दिनोदिन पाकिस्तानी हमलावरों का कारवाँ श्रीनगर की तरफ बढ़ता जा रहा था। कश्मीर की सीमा पर दुश्मन की दस्तक से परेशान महाराजा हरि सिंह ने 24 अक्टूबर को भारत से सैन्य मदद की गुहार लगायी। इसके दो दिन बाद महाराजा ने भारत के साथ अधिमिलन पत्र पर हस्ताक्षर कर यह दस्तावेज दिल्ली भिजवा दिया। गवर्नर जनरल माउन्टबेटन ने अगले दिन इस अधिमिलन पत्र पर स्वीकृति सूचक हस्ताक्षर किये और इस प्रकार जम्मू काश्मीर भारत का अंग बन गया। इधर दिल्ली में भारतीय संविधान निर्माण की प्रक्रिया शुरू हो चुकी थी। जम्मू काश्मीर के भी चार प्रतिनिधि संविधान सभा के सदस्य बनकर भारतीय संविधान के निर्माण की प्रक्रिया में शामिल हुए।

यहाँ यह उल्लेख करना भी उपयोगी होगा कि भारतीय संविधान सभा दवारा भारतीय संविधान को स्वीकृत किये जाने से पूर्व, सभी देसी रियासतों के शासको दवारा उनके राज्यों में जल्द बनकर तैयार होने वाले संविधान को लागू करने सम्बन्धी उद्घोषणा की गयी। इसी प्रकार की उद्घोषणा 26 नवंबर, 1949 को जम्मू काश्मीर के रीजेंट बन चुके युवराज कर्ण सिंह ने भी की। इसी उद्घोषणा के आधार पर जम्मू काश्मीर भारतीय संविधान के अनुच्छेद एक के तहत पहली अनुसूची में शामिल होकर भारत का 15वां राज्य बना।


On Thu, Oct 12, 2017 at 3:51 PM, Neeraj Mishra <[email protected]> wrote:
 

 

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