जम्मू- कश्मीर: अखंड राष्ट्र का मुकुट

13 Oct 2017 12:28:50



अखंड भारत

अवनीश राजपूतनीरज मिश्रा

राष्ट्र केवल एक भूमि के टुकड़े का नाम नहीं हो सकता। कोई एक भूखंड और उस पर बसने वाला समाज मिलकर अपने आप में राष्ट्र नहीं बन जाते। निश्चित भूमि, उसके प्रति श्रद्धा का भाव रखने वाला समाज और उन्हें एकात्म बनाने वाली सांझी सांस्कृतिक धारा मिल कर एक राष्ट्र का निर्माण करती है। भारत राष्ट्र दिखने वाली अनेक प्रकार की विविधताओं के बाद भी एक राष्ट्र है। हजारों वर्षों में हमने सैंकड़ों बाहरी आक्रमण झेले हैं। हमारा इतिहास चुनौतीपूर्ण रहा है। शक, हूण, कुषाण, अरब, तुर्क, मुगलों और फिर अंग्रेजों आदि विदेशी आक्रांताओं से हमारे राष्ट्र की एकता एवं अखंडता को चुनौती मिलती रही है। लेकिन आज भी हमारा राष्ट्र एक है। हमारी राष्ट्रीय एकता अखंडित है। यदि हम इस प्रश्न का उत्तर ढूढ़ने का प्रयास करेंगे कि क्रूर आक्रांताओ के क्रूर प्रहारों के बाद भी भारतीय एकात्मता अडिग क्यूं है तो उसका उत्तर सिर्फ हमारी संस्कृति में निहित है, जो हमें एक बनाये रखती है। हजारों वर्षों से भारत में कोई व्यक्ति कहीं भी जन्मा हो, रहा हो या फिर कहीं भी काम कर रहा हो, उसमें एकात्मता का भाव जगाने का कार्य इस पावन धरा पर जन्में महापुरुषों ने किया है। एक राष्ट्र के रूप में यूनाइटेड किंगडम, अमरीका या किसी भी अन्य पश्चिमी देश की आयु कुछ सौ साल हो सकती है। मगर यह पुण्यभूमि भारत सैंकड़ों नहीं हजारों वर्षों से एक राष्ट्र है। भारतवासियों को अपनी इस विरासत पर गर्व होना चाहिए, और यह हुंकार भरने में भी संकोच नहीं होना चाहिए कि हम दुनिया की प्राचीनतम सभ्यता, संस्कृति और राष्ट्रीयता के वारिस हैं।

अनेक लोगों के मन में प्रश्न आ सकता है कि जिस सनातन राष्ट्रीय धारा का वर्णन यहां किया जा रहा है उसके प्रमाण क्या हैं? प्रमाण चाहिये तो सीधे रामायण के युग में लौट चलिए। अगर अयोध्या से लेकर रामेश्वरम् तक एक ही सांस्कृतिक धारा नहीं बह रही थी तो उत्तर में कौशल प्रदेश के राजकुमारों की अगुआई में सुदूर दक्षिण तक आतंक का पर्याय बनी ताकतों के खिलाफ संयुक्त संघर्ष नजर नहीं आता। अगर भारत एक राष्ट्र नहीं होता और देश के सुधिजनों को इसकी समग्र चिंता नहीं होती तो वर्तमान बिहार में जन्मे विष्णुगुप्त चाणक्य देश के उत्तर पश्चिम में सिकंदर के हमले के खिलाफ चन्द्रगुप्त की अगुआई में प्रतिरोध की दीवार नहीं खड़ी करते।

बात बाहरी हमलों के प्रतिकार तक कहां सीमित थी। हमारे संत-महात्मा वैदिक काल से ही इस राष्ट्रीय इकाई के सर्वांगीण पोषण की चिंता करते रहे हैं। दक्षिण में केरल की धरती पर जन्मे शंकराचार्य ने चार मठों की स्थापना के लिए इस सनातन राष्ट्र के चार कोनों को चुना उत्तर में बद्रीनाथ मठ की स्थापना की तो पूर्व में जगन्नाथ पुरी दक्षिण में कर्नाटक में श्रृंगेरी तो पश्चिम में द्वारका में मठ की स्थापना की। आदि गुरु शंकराचार्य का जन्म भले ही केरल में हुआ, लेकिन उनके मन में कल्पना सम्पूर्ण भारत वर्ष की थी।  कश्मीर के ब्राह्मण दक्षिण में गए तो दक्षिण के ब्राह्मण पूजा अर्चना के लिए बद्रीनाथ गए। जब ये महापुरुष देश के किसी एक हिस्से से दूसरे हिस्से में गए तो उनके मन में केवल एक भारत की कल्पना ही थी, यह सांस्कृतिक और राष्ट्रीय चेतना छत्रपति शिवाजी से लेकर गुरु गोबिन्द सिंह जी के समय में भी दिखाई देती है। सिख गुरुओ की वाणी संकलन हेतु जब आदि गुरु ग्रन्थ साहिब का प्रकाश किया गया तो उसमें देश के हर क्षेत्र के हर जाति के संतो की वाणी को सम्मिलित किया गया। यह स्मरण करते हुए गर्व महसूस होता है कि जब आनंदपुर साहिब में दशमेश पिता ने एक के बाद एक पांच शिष्यों से सिर मांग लिए तो उनमें द्वारका से लेकर लाहौर, हस्तिनापुर, बीदर और ओडिशा के जगननाथपुरी तक के और विभिन्न जतियों से संबंध रखने वाले पांच प्यारे उठ खड़े हुए। अयोध्या, मथुरा, हरिद्वार, काशी, कांची, उज्जैन आदि मोक्षदायक पुरियां जिनमें देश के प्रत्येक क्षेत्र से लोग आकर अपने को धन्य मानते हैं। 

 गंगा, यमुना, गोदावरी, नर्मदा सिंधु एवं कावेरी आदि नदियों का मां के रूप में पूजन और उनमें स्नान से पुण्य की कल्पना। समान शाश्वत जीवन मूल्य समान शत्रु-मित्र भाव जिसे किसी भी भाषाए बोली आस्था और जीवनशैली वाला भारतीय अपनाता है। वसुधैव कुटुम्बकम के सूत्र ने केवल भारत ही नहीं बल्कि पूरे विश्व को ही अपना मानने का मार्ग प्रशस्त किया। जम्मू-काश्मीर भी भारत की इस महान संस्कृति का एक हिस्सा रहा है। जम्मू-काश्मीर का सम्बन्ध भगवान् राम से लेकर ऋषि कश्यप, महान सम्राट अशोक और कनिष्क तक रहा है।

 इन सभी लोगो का भारत के जनमानस पर एक प्रभाव रहा है। जम्मू क्षेत्र का इतिहास यदि वीरता से लबरेज है तो  काश्मीर का ज्ञान से।  काश्मीर ही वह क्षेत्र है जहां मानवजाति का सबसे पुराना लिखित इतिहास ‘‘राजतरंगिनी’’ के रूप में विद्यमान है। उड़ी के दाता मंदिर, मार्तंड के सूर्य मंदिर, अवन्तिपुरा और पट्टन स्थित मंदिरों के विशाल अवशेष भारतीय संस्कृति की उपस्थिति दर्शाती है।

 

 

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