आखिर कब तक अफवाहों की आग में जलेगा जम्मू कश्मीर ?

14 Oct 2017 15:57:01

 
 


Shubham upadhyay

 
 
जम्मू कश्मीर अफ़वाहों का शिकार हमेशा से रहा है। अफ़वाहों को लेकर जम्मू कश्मीर का माहौल हमेशा से गर्म रहता है। जम्मू कश्मीर में कुछ लोगो द्वारा छोटी-छोटी अफ़वाहों से बड़े बड़े एजेंडे चलाये जाते हैं। किसी भी क्षेत्र में अफ़वाहों से जान-माल की तो हानि होती है साथ ही उस क्षेत्र का नागरिक मानसिक तौर पर अस्वस्थ होने लगता है। अफ़वाहों का बाजार इतना गर्म है कि कुछ अलगाववादी ताकतें जम्मू कश्मीर में चोटी कटने की घटना को राजनैतिक हवा देने पर तुले हुए हैं। मामला यह है कि पिछले कुछ दिनों से जम्मू कश्मीर में महिलाओं और लड़कियों की चोटी काटने के कुछ वारदात सामने आये हैं। कुछ महिलाओं ने मीडिया और पुलिस के सामने शिकायत दर्ज कराया है कि किसी अज्ञात शख़्स ने उनके चोटी को काटा है। पुलिस लगातार उन लोगो की तलाश में जुटी है और जांच के लिए विशेष दल बुलाया है।
 
कथित तौर पर चोटी काटने की 100 से अधिक घटना हो चुकी :
 
जम्मू कश्मीर में महिलाओं और लड़कियों की चोटी काटने की 100 से घटनाएं अभी तक सामने आई है। लगभग एक महीने से लगातार इन वारदात रूपी अफवाहों का बाजार काफी गर्म है। अभी तक इस जुर्म में किसी भी शख़्स की गिरफ़्तारी नहीं हुई है। पुलिस और सरकार लगातार चोटी काटने की घटना को लेकर तेज गति से काम कर रही रही। पुलिस प्रशासन ने चोटी काटने वाले के बारे में खबर देने वाले या मदद करने वालो को 6 लाख रुपये के इनाम देने की घोषणा की है।
 
ऐसे अलगाववादी जिन्हें सेना से नहीं चोटी काटने की अफ़वाह से डर लगता है :
 
जम्मू कश्मीर के हुर्रियत कांफ्रेंस ने सोमवार को बंद का ऐलान किया था जिसके बाद पुरे कश्मीर में बंद के हालात रहें। एक ओर जहाँ अलगाववादी ताकते जो आम तौर पर मंचों से कश्मीर की आज़ादी के लिए भारतीय सेना भी नहीं डरने की बात करते हैं वो आज चोटी काटने की मामूली अफ़वाहों से ही डर गए हैं। दरअसल आतंक का रास्ता हो या किसी भी अन्य तरह से, कुछ ऐसी ताकते जम्मू कश्मीर में काम करती है जो अस्थिरता का माहौल लगातार रखना चाहती है। कुछ अलगाववादी तत्वों को संदेह के तौर पर देखा जा रहा है।
 
व्यापार बंद, शिक्षण संस्थान बंद, इंटरनेट बंद :
 
जम्मू कश्मीर में फैली एक अफ़वाह के कारण वहाँ के व्यापारियों को करोड़ों का नुकसान हुआ है। अलगाववादी नेताओं के करतूतों के कारण कश्मीर में बंद का असर आम नागरिकों को उठाना पड़ा है। कश्मीर विश्वविद्यालय के साथ साथ अन्य शैक्षणिक संस्थान को भी बंद रखा गया है। अफ़वाहों को मद्देनजर रखते हुए इंटरनेट सेवाओं में रोक लगा दी गई है।
 
अफ़वाहों से आतंकियों के फायदा उठाने का डर :
 
चोटी काटने की अफवाहों के बाद जिस तरह अलगाववादी ताकतों ने बंद के लिए तत्परता दिखाई वह चिंतनीय है। इन घटनाओं को लेकर सुरक्षा एजेंसियों के सूत्रों का कहना है क़ि इन घटनाओं के पीछे सिर्फ अफवाहें मात्र हैं। इससे आतंक को बढ़ावा दिया जा रहा है। अस्थिरता के माहौल को बरकरार रखने के लिए ऐसे कृत्य किये जा रहें हैं।
 
एनआईए और सेना के फ्रंटफुट में होने की छटपटाहट है ये अफ़वाह :
 
मीडिया रिपोर्ट की माने तो एनआईए ने हुर्रियत नेताओं के खिलाफ जांच की तो सामने आया है कि यह शरारती तत्वों और उग्रवादियों द्वारा माहौल में डर पैदा करने के लिए किया जा रहा है। हाल ही में सेना ने लगातार आतंकियों को मारकर आतंकी और अलगाववदी ताकतों की कमर तोड़ दी है, तो अब वह सेना के खौफ़ से बंदूक छोड़ अफ़वाहों से कश्मीर की हवाओं में जहर घोल रहें हैं।
 
हमेशा से अफ़वाहों का शिकार रहा है कश्मीर :
 
कश्मीर में अफ़वाहों का अपना रोल रहा है। कश्मीर की अधिकतर घटना अफ़वाहों पर आधारित होती है जिसमें कोई तथ्य नहीं होता। इसकी शुरआत 1931 में हुई थी। महाराजा के खिलाफ कुछ असामाजिक तत्वों ने मुहीम चलाने के किये अफ़वाहों का सहारा लिया था। तत्कालीन समय में सांप्रदायिक तनाव बढ़ाने के जुर्म में अब्दुल क़ादिर नाम के शख़्स को जेल में डाल दिया गया था। अब्दुल कादिर ना कश्मीरी था, ना नेता था, ना ही कोई बड़ा नाम था, उसने हिंदुओं के खिलाफ माहौल को भड़काने के लिए आपत्तिजनक शब्द कहे जिसके बाद उसे कारावास दिया गया। उसके गिरफ्तार होने के बाद लाल चौक से लेकर बाजारों तक हिंदुओं के दुकानों को निशाना बनाया गया, मारपीट की गई। हालात को देखते हुए प्रशासन ने अब्दुल क़ादिर की सुनवाई कोर्ट में ना कर जेल में ही करने का निर्णय लिया, ताकि कोई गड़बड़ ना हो। उसी दौरान अफ़वाह फैलाई गई कि अब्दुल क़ादिर को फाँसी दी जा रही है जिसके बाद बड़े स्तर पर जेल में भीड़ का हमला हुआ कई हिंसात्मक प्रदर्शन हुए जिसमें कई लोगो की मौत हुई। सोचने वाली बात यह है कि इस अफ़वाह के कारण भयानक हिंसा तो उठी लेकिन इसका फायदा किसे हुआ ? ऐसा है कि तत्कालीन समय में इस अफ़वाह का सबसे ज्यादा फायदा शेख अब्दुल्ला ने उठाया था। इसने इसे एक प्रोपगंडा की तरह इस्तेमाल किया और इस दिन को 'शहादत दिवस' के रूप में मनाना शुरू कर दिया। एक ऐसा व्यक्ति जिसकी ना कश्मीर में कोई पहचान है, जिसका ना कश्मीर के इतिहास में कोई योगदान है, जिसने ना कश्मीर के लिए कोई लड़ाई लड़ी, जिसने ना कश्मीर के विकास के लिए कोई काम किया और तो और ऐसा व्यक्ति जिसने जम्मू कश्मीर के सांप्रदायिक सौहार्द को पूरी तरह बिगाड़ कर रख दिया जिसकी वजह से आज तक जम्मू कश्मीर का माहौल ख़राब बना हुआ है। यही वो समय था जब कश्मीर में हिन्दू मुस्लिम के बीच दीवारें खींची गई। इन सबका कारण था अफ़वाह और अफ़वाह फैलाने वाले लोग। ये ऐसे दिग्भ्रमित करने वाले लोग हैं जिनके द्वारा फैलाई गई अफ़वाह की वजह से आज भी उस दिन में शहादत दिवस मनाया जाता है। 
 
जम्मू कश्मीर में 1931 की घटना हो या आज चोटी काटने की घटना, सबका दोषी अफ़वाह ही है, और उससे बड़ा दोषी है उस अफ़वाह को फैलाने वाला। जम्मू कश्मीर के नागरिकों को आज विकास की दरकार है, शिक्षा की दरकार है, रोजगार की दरकार है, ऐसे में ये शरारती और उग्रवादी तत्व कश्मीरी लोगो को परेशान करने में लगे हैं और डर का माहौल बनाने में उत्सुक दिख रखे हैं। ऐसे अफ़वाहों से और ऐसे अफ़वाह फैलाने वाले लोगों से कश्मीर को आज़ाद कराने की आवश्यकता है। 
 
 

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