एक गुमनाम सैनिक जिसने अकेले दुश्मनों को लोहे के चने चबवा दिया

16 Oct 2017 23:31:51

  

Shubham upadhyay

भारत हमेशा से वीरों की भूमि रही है, भारतीय सेना हमारे शौर्य का प्रतीक है। भारतीय सेना के अनगिनत सैनिकों के बलिदान के कारण ही आज भारत की संप्रभुता जीवित है। ऐसे ही एक सैनिक है मेजर पुट्टीचंदा सोमैया गणपति। इनकी वीरता के किस्से कहीं दब से गए हैं, लेकिन आज हम 16 अक्टूबर को बीते कई सालों पहले इसी 16 अक्टूबर से जुड़ी एक घटना के बारे में जानने की कोशिश करते हैं।

 

मेजर पुट्टीचंदा सोमैया गणपति का जन्म 7 नवंबर 1944 को छमिअल मैथडी गांव में हुआ था। यह गांव कर्नाटक के कोडागु क्षेत्र में है। उनके पिता का नाम श्री पुट्टीचंदा एम. सुमैया था। 22 जून 1968 को उन्हें महार रेजीमेंट में कमीशन मिला। नागालैंड में बगावत विरोधी अभियान में उन्होंने भाग लिया था।

 

91 इन्फैंट्री ब्रिगेड को भारत श्रीलंका के बीच हुए 1987 में समझौते के बाद श्रीलंका में भारतीय शांति सेना के रूप में भेजा गया था। जाफना में उतरने वाले शांति सेना के पहले हफ्ते में 8 महार भी थे। बटालियन की एक कंपनी का नेतृत्व मेजर गणपति के हाथों में ही था। अपने ठहराव की पूरी अवधि तक श्रीलंका में वह एक अपरिचित इलाके में कुशलतापूर्वक बगावत विरोधी अभियान में जुटे रहें और पूरी निष्ठा के साथ अपने कर्तव्य को निभाया।

 

16 अक्टूबर 1987 को अनल खोडल में तैनात मेजर गणपति की कंपनी को उग्रवादियों ने घेर लिया और उस पर कई बार हमले किये। कंपनी में इस पोजिशन पर इसलिए अधिकार किया था कि वह एक इंफेंट्री ब्रिगेड को शत्रु के ठिकानों पर धावा बोलने के लिए मजबूत आधार दे सके। दुश्मन की धुआंधार गोलीबारी से कंपनी के सैनिक भारी संख्या में हताहत हुए। उनका गोला बारूद भी लगभग खत्म हो चुका था उग्रवादियों की भारी गोलाबारी कारण गोला बारूद का विमान पतन भी संभव नहीं था। इस अत्यंत कठोर और संकट भरी स्थिति के बाद भी मेजर गणपति ने अपनी लड़ाई को नहीं रोका। वह लगातार बहुत ही बहादुरी से पूरे दिन दुश्मन से लड़ते रहे। अपनी सूझबूझ और समझदारी के साथ वीरता दिखाते हुए उन्होंने किसी भी उग्रवादी को अपने आसपास नहीं आने दिया। मेजर गणपति ना सिर्फ उग्रवादियों से लड़ते रहे बल्कि अपने गोला बारूद के खत्म होने के कगार पर भी दुश्मन का जमकर सामना किया। घाटी क्षेत्र में उन्होंने कई खाईयों के आस पास बार-बार अपनी स्थिति बदल दुश्मन को उलझाए रखा। 17 अक्टूबर की सुबह 6:00 बजे तक वह निडरता के साथ आस-पास के क्षेत्रों में स्थान बदल कर लड़ते रहे। आखिर में सुबह होने के बाद एक गश्तीदल गोला बारूद लेकर उनकी सहायता के लिए पहुंचा।

 

मुश्किल समय के दौरान भी मेजर पुट्टी्चंदा सोमैया गणपति ने अदम्य साहस का परिचय दिया। उन्होंने अपने कुशल नेतृत्व और अभूतपूर्व शौर्य का प्रदर्शन किया। उनकी कुशलता और साहस को देखते हुए उन्हें महावीर चक्र से सम्मानित किया गया। 16 अक्टूबर 1987 को घटित या घटना भारत, भारतीय सेना और मेजर पुट्टीचंदा सोमैया के लिए अतुलनीय है।

 

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