महाराजा हरि सिंह जिनकी बदौलत जम्मू कश्मीर का भारत मे विलय संभव हो पाया

24 Oct 2017 15:42:38


 

Neeraj Mishra

आज़ादी से पहले देश में दो प्रकार की शासन व्यवस्था थी। ब्रिटिश इंडिया जो सीधे ब्रिटिश सरकार के नियंत्रण में थी और दूसरी देशी रियासतें जिनके   शासक महाराजा, राजा  नवाब इत्यादि होते थे। परन्तु सही अर्थों में रियासतें स्वतंत्र नहीं कही जा सकती थी। इनके विदेश, संचार और रक्षा विभाग विभिन्न संधियों के अन्तर्गत ब्रिटिश भारत के पास ही थे। अंग्रेजी सरकार का राजनैतिक अधिकारी जिसे रेजिडेंट कहते थे वह रियासतों में रहता था। जम्मू कश्मीर भी ऐसी ही एक बड़ी रियासत थी जिसपे डोगरा राजवंशी महाराजा हरि सिंह शासन करते थे।

 

महाराजा हरि सिंह भारतीय इतिहास के कुछ उन चुनिंदा महानायकों मे से एक है जो कि एक रियासत के शासक होते हुए भी सम्पूर्ण भारत के एक होने का सपना देखते थे। वह एक सच्चे देशभक्त थे। और वो भारत गणराज्य के साथ जम्मू कश्मीर का विलय चाहते थे। हालांकि उनकी देशभक्ति ब्रिटिश सरकार को पसंद नहीं आयी और उन्होंने महाराजा के सामने बहुत सारी मुश्किलें पैदा की जिसमे जाने अंजाने नेहरू और शेख अब्दुल्ला की  जुगलबंदी भी शामिल थी। इससे जनमानस में महाराजा की छवि भारत और मुस्लिम विरोधी बना दी। परंतु सच्चाई इसके उलट थी। विलय पत्र के मसौदे को स्वीकार करने और उसपर हस्ताक्षर करने में हुई देरी की वजह उस समय की देश और राज्य की तात्कालिक परिस्थितियां जिम्मेदार थी जोकि ब्रिटिश सरकार, नेहरू और अब्दुल्लाह की कुटिल चालों की वजह से उत्पन्न हुई थी। महाराजा बहुत पहले ही राज्य का विलय भारत में करना चाहते थे लेकिन उन्हें नेहरु का समर्थन नही मिल रहा था जो विलय से पहले सत्ता का हस्तांतरण शेख को चाहते थे जबकि ऐसी शर्त 565 रियासतों में से किसी के साथ भी नही रखी गयी थी। 

अधिमिलन का विलय पत्रक

 

भारत  में जब अंग्रेजी शासन का अंत हुआ तो उन्होंने ब्रिटिश भारत का दो भागो में विभाजन कर दिया। पहला मुस्लिम बहुल पाकिस्तान और दूसरा भारत ।  उस समय पूरे देश  में 565 के आसपास छोटी और बड़ी देशी रियासतें थी। उनको यह अधिकार दिया गया कि वो किसी भी एक देश के साथ अपने विलय को स्वतंत्र है। इसके लिए एक आधिकारिक विलय पत्र बनाया गया। जिसे अधिमिलन या  विलय पत्रक (instrument of accession) कहा गया। अगर कोई रियासत अपनी मर्ज़ी से एकबार इस पत्रक पर हस्ताक्षर कर देती और उसे गवर्नर जनरल द्वारा स्वीकार कर लिया जाता तो उसका उस डोमिनियन के साथ विलय प्रक्रिया पूरी हो जाती।

महाराजा हरि सिंह ने भी समस्त प्रक्रियाओं  का पालन करते हुए विलय के पत्रक पर हस्ताक्षर किए थे और जम्मू कश्मीर का  कानूनी, आधिकारिक और विधिसंगत तरीके से भारत मे विलय किया था।

 

तत्कालीन परिस्थितियां

 

जम्मू कश्मीर की आज की समस्या उस समय की कुछ बेहद पेचीदा परिस्थितियों की देन है। हालांकि महाराजा जम्मू कश्मीर का भारत में विलय करना चाहते थे इसमें कोई दो राय नही है। लेकिन जम्मू कश्मीर के विलय में हुई देरी की वजह महराजा नहीं बल्कि उनके सामने नेहरू-अब्दुल्लाह की उत्पन्न की हुई परिस्थितियां थी। पहली समस्या अंग्रेजों की देन थी। महाराजा एक देश भक्त थे जिसकी वजह से उन्होंने अंग्रेजोंं की नाराज़गी मोल  थी । नरेंद्र मंडल,  जो  कि देशी रियासतों की प्रतिनिधि सभा थी, के अध्यक्ष महाराजा हरि सिंह थे। गोलमेज सम्मेलन में उन्होंने देश  सारे राजाओं और युवराज का देश की आज़ादी का आह्वाहन किया था। फलस्वरूप अंग्रेज़ उनसे काफी नाराज़ थे। जम्मू कश्मीर के भारत में विलय को लेकर अंग्रेजोंं रजामंद नहीं थे। वो प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष  रूप से महाराजा पर पाकिस्तान में शामिल होने का दबाव डाल रहे थे। दूसरी जो सबसे बड़ी समस्या थी वो नेहरू और अब्दुल्लाह की कुटिल चालें थी। हालांकि दोनों  कश्मीर का भारत में विलय चाहते थे परन्तु नेहरू की इच्छा थी कि महाराजा अब्दुल्लाह को सत्ता सौंप दे लेकिन महाराजा भी इसको मानने को तैयार नहीं थे क्यूंकि अब्दुल्लाह पहले से ही महाराजा के विरुद्ध जम्मू कश्मीर  लोगों को भड़का रहा था। उसने घाटी में महाराजा के खिलाफ कई विरोध प्रदर्शन किए थे जिसके कारण मजबूरन महाराजा को उसको गिरफ्तार करना पड़ा था। अब्दुल्लाह नेहरू  काफी करीब था इसलिए नेहरू महाराजा से चिढ़ते थे और दोनों महाराजा को सबक सिखाना चाहते थे। यहां पर ये उल्लेख करना उचित होगा कि पूरे देश की रियासतों को संभालने की जिम्मेदारी सरदार पटेल पर थी परन्तु महाराजा से खुन्नस के चलते सिर्फ जम्मू कश्मीर की जिम्मेदारी नेहरू ने ले रखी थी और उसकी नाकामयाबी की परिणित जम्मू कश्मीर की समस्या के रूप में हुई।

 

महाराजा का रोल

 

उपर्युक्त कारणों से यह तो यह तो स्पष्ट हो गया कि जम्मू कश्मीर के विलय में हुई देरी की वजह महाराजा के समक्ष पैदा की गई परिस्थितियां थी। महाराजा जम्मू कश्मीर का विलय भारत के साथ करना चाहते थे जिसका कई आधिकारिक प्रमाण मौजूद है। महाराजा ने विलय के लिए बाकायदा कई पत्र  तत्कालीन केंद्र सरकार और लॉर्ड माउंटबेटन को लिखे जो आज भी मौजूद है। परन्तु केंद्र सरकार से महाराजा को कोई भी जवाब नहीं दिया गया था। महाराजा के पत्र के जवाब में लॉर्ड माउंबेटन ने जो पत्र लिखे वो अप्रत्यक्ष  रूप से महाराजा पर पाकिस्तान में शामिल होने के लिए दबाव बनाने को लेकर थे। अक्टूबर 1947 को जब पाकिस्तान सेना ने कबायली लोगो के साथ मिलकर जम्मू कश्मीर पर आक्रमण कर दिया उस समय तक भी नेहरू ने कोई सकारात्मक प्रतिक्रिया नहीं दी थी। हालांकि विषम परिस्थितियों में भी महाराजा का विश्वास नहीं टूटा और 26 अक्टूबर 1947 को उसी अधिमिलन के विलय पत्र पर समस्त विधि प्रक्रियाओं को पूरा करते हुए हस्ताक्षर किए जिसमें अन्य रियासतों के शासकों ने किया था। लॉर्ड माउंबेटन को लिखे पत्र में महाराजा ने उस समय की परिस्थितियों के बारे में भी लिखा है। यहा ध्यान देने वाली बात है कि इस पत्र में महाराजा ने केवल राज्य की परिस्थितिया लिखी थी, कही पर भी प्लेब्साईट का जिक्र नही किया था। उन्होंने साफ़ साफ़ लिखा था कि राज्य की मुस्लिम जनता का भी बड़ा तबका राज्य में ख़राब हुए हालातो के लिए जिम्मेदार नही था। लेकिन इस पत्र की सही व्याख्या न होने के कारण कई आशंकाए उत्पन्न हुए है । आज 2017 में यदि हम इन संशयो को दूर करना चाहते है तो हमें जम्मू कश्मीर के विलय में महाराजा की भूमिका का सही आंकलन करने की जरुरत है।

 

महाराजा हमेशा से भारत के ही पक्ष में थे और एक लोकतांत्रिक गणराज्य प्रबल समर्थक थे। भारत के साथ उनका विश्वास था कि यही से जम्मू कश्मीर का विकास संभव है। 

 

 

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