जम्मू कश्मीर के संपूर्ण एकीकरण के पुरोधा -पंडित प्रेम नाथ डोगरा ।

24 Oct 2017 14:45:57


Neeraj Mishra

जम्मू कश्मीर आज़ादी के बाद से ही भारत का सबसे ज्यादा सुर्खियों में रहने वाला राज्य है लेकिन दिलचस्प बात यह है कि सबसे अधिक चर्चा में रहने के बावजूद लोगों को जम्मू कश्मीर के बारे में सबसे कम जानकारी है। इसकी सबसे प्रमुख वजह कूटनीतिक एजेंडे के द्वारा सच कम और अफवाहें फैलाना ज्यादा रहा है। पिछले 70 सालों से यह दुष्चक्र चला आ रहा है फलस्वरूप जम्मू कश्मीर के लिए कुर्बानी देने वालों तक को भुला दिया गया या जानबूझकर लोगों के सामने आने तक नहीं दिया गया। जम्मू कश्मीर के लिए ऐसे ही लड़ने वाले लोगों में से एक पंडित प्रेम नाथ डोगरा थे। इन्होंने तत्कालीन कठिनतम परिस्थितियों के बावजूद  जम्मू कश्मीर के एकीकरण के में बहुत महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी जिसके कारण इन्हें "शेरे डूग्गर" भी कहा जाता है।

पंडित प्रेम नाथ डोगरा का जन्म 24 अक्टूबर सन् 1884 में जम्मू के सांबा जिले में हुआ था। लाहौर कॉलेज से इतिहास में परास्नातक करने के बाद ये राष्ट्रवादी संगठन से जुड़ गए। जम्मू कश्मीर की तत्कालीन परिस्थितियां बहुत जटिल थी। जिन्ना के अलग पाकिस्तान की मांग और कश्मीर में अब्दुल्लाह के महाराजा विरोधी अभियानों ने रियासत की स्थिति बहुत नाजुक कर दी थी। इन्हीं सबके चलते पंडित प्रेम नाथ डोगरा ने कुछ अन्य राष्ट्रवादी नेताओं के साथ मिलकर जम्मू प्रजा परिषद की नीव रखी । जम्मू प्रजा परिषद का मुख्य उद्देश्य जम्मू कश्मीर का सम्पूर्ण एकीकरण था। आज़ादी के पहले से ही अंग्रेजों और पाकिस्तानियों ने महाराजा पर पाकिस्तान में शामिल होने का दबाव बना रहे थे। चूंकि पंडित प्रेम नाथ डोगरा संघ जैसे राष्ट्रवादी संगठन से जुड़े थे अतः इनका पूरा प्रयास था कि किसी भी हालात में जम्मू कश्मीर पाकिस्तान के साथ नहीं जाना चाहिए क्यूंकि यह अखंड भारत के एकीकरण में सबसे  ज्यादा नुकसानदायक होता। महाराजा खुद पाकिस्तान के साथ नहीं जाना चाहते थे किन्तु नेहरू और अब्दुल्लाह  की कुनीतियो के कारण वह भारत के साथ विलय में विलम्ब हो रहा था । प्रेम नाथ डोगरा इस हिचकिचाहट को समझ चुके थे इसलिए उन्होंने कुछ और लोगों के माध्यम से गुरुजी गोलवलकर को महाराज से मिलवाकर भारत के साथ विलय के लिए लगभग मनवा लिया था

 

बलराज मधोक ने पाकिस्तान के कश्मीर पर अतिक्रमण के समय प्रजा परिषद का गठन था। शीघ्र ही इसकी कमान प्रेम नाथ डोगरा ने संभाल ली और राज्य के सम्पूर्ण एकीकरण के प्रयासों का अभियान शुरु किया। विलय के पश्चात अब्दुल्लाह को राज्य का मुख्य प्रशासक नियुक्त किया गया और युवराज कर्ण सिंह को सदर –ए– रियासत नियुक्त किया गया। शासन अब्दुल्लाह के हाथ में आने के बाद राज्य की स्थिति और बिगड़ती चली गई। अब्दुल्लाह ने सांप्रदायिक आधार पर राज्य को बांटना शुरू कर दिया। जिसका प्रेम नाथ डोगरा और प्रजा परिषद ने कड़ा विरोध किया।

प्रजा परिषद की मांग थी राज्य का शासन और संविधान देश के संविधान के अनुसार चलना चाहिए। राज्य के सम्पूर्ण एकीकरण की मांग करते हुए प्रजा परिषद ने "एक विधान, एक निशान और एक प्रधान" का नारा दिया। क्यूंकि जम्मू कश्मीर राज्य का अलग से झंडा, संविधान और प्रधानमन्त्री पद प्रजा परिषद को मंजूर नहीं था। इसके विरोध में प्रजा परिषद ने आंदोलन करना प्रारंभ किया जिसके कारण अब्दुल्लाह ने श्यामा प्रसाद मुखर्जी और प्रेम नाथ डोगरा समेत बहुत से  लोगो को गिरफ्तार कर लिया था। इसके विरोध में जम्मू की जनता सड़कों पर उतर आई और अब्दुल्लाह को केंद्र सरकार के हस्तक्षेप के बाद इन नेताओ को छोड़ना पड़ा।

 

बाद में प्रेम नाथ डोगरा प्रजा परिषद के टिकट पर 1957, 1962 और 1967 में विधानसभा के लिए भी चुने गए। प्रेम नाथ डोगरा सच्चे अर्थों में लोकतन्त्र के कट्टर समर्थक थे।वह एकता के साथ एकरूपता में भरोसा रखते थे। सारा जीवन एक निशान, एक विधान और एक प्रधान के सिद्धांत के लिए लगा दिया। एक राष्ट्रवादी और देशभक्त पंडित प्रेम नाथ डोगरा दार्शनिक और समाज सेवी के रूप में जम्मू कश्मीर के लोगों के लिए सदैव आदर्श का स्वरूप रहेंगे।

 

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