महाराजा हरि सिंह और जम्मू कश्मीर के प्रति ब्रिटिश सरकार की षड्यंत्रकारी नीतियां

25 Oct 2017 14:00:11

 


Neeraj Mishra

भारत पर अपने दो सौ साल के शासन के दौरान अंग्रेजों ने  "फूट डालो और राज करो" की नीति अपनायी थी।  राज्य हड़पने के लिए  अपनायी गई  इस नीति का सबसे भयंकर दुष्परिणाम भारत का साम्प्रदायिकता के आधार पर हुआ विभाजन था।  देश में साम्प्रदायिकता के आधार पर चुनाव और प्रतिनिधि चुने जाने की प्रक्रिया अंग्रेजों ने ही शुरू की थी। भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के विरुद्ध मुस्लिम लीग को खड़ा करना और मजबूत बनाना ब्रिटिश हुकूमत की ही चाल थी। द्विराष्ट्र के सिद्धांत को स्थापित करने में अंग्रेजो ने पिछले दरवाजे से मुस्लिम लीग का सहयोग किया था जिसके प्रत्यक्ष्य साक्ष्य आज भी मौजूद है। इसके पीछे अंग्रेजों की मंशा पहले हर  तरीके से शासन पर अपना आधिपत्य  बनाये रखना था और जब यह असंभव दिखने लगा तो किसी ना किसी से अपना प्रभाव जमाये रखने के लिए भारत का  विभाजन कर दिया क्योंकि कमजोर राष्ट्र पर अपना प्रभाव बनाये रखना आसान था।

भारत और पाकिस्तान के बीच जम्मू कश्मीर एक बफर स्टेट था। जम्मू कश्मीर की अहमियत इसकी भू-राजनैतिक और सामरिक दृस्टि  ना सिर्फ भारत पाकिस्तान बल्कि अंग्रेजों समेत पूरे विश्व के लिए बहुत अहम थी। भारत से चले जाने के बाद भी ब्रिटिश सरकार इस पूरे क्षेत्र में अपने आर्थिक व भू-राजनैतिक हितों को लेकर चिन्तित थी। इसके लिये उसे अपने प्रभाव क्षेत्र वाला एक देश चाहिये था। द्वितीय विश्व युद्ध के बाद प्रारम्भ हुये शीत युद्ध में ब्रिटिश-अमेरिकी कूटनीति को मध्य एशिया में अपने साम्राज्यवादी हितों की पूर्ति करनी थी। इस लिए जरूरी था कि चीन और रूस के साम्यवादी प्रसार को किसी भी तरीके से रोका जाए। पाकिस्तान इस मामले में ब्रिटिश-अमेरिकी कूटनीति का एक पुख्ता आधार बन सकता था। लेकिन यह तभी संभव था जब जम्मू-कश्मीर को किसी भी प्रकार से पाकिस्तान में मिलाया जाए, क्योंकि इस रियासत की सीमा चीन, तिब्बत, रूस और अफगानिस्तान से एक साथ लगती थी।  ब्रिटिश सरकार समेत पश्चिमी देशों को  उसके प्रभाव को रोकने के लिए इस क्षेत्र पर अपना येनकेन अपना अधिकार और प्रभुत्व बनाये रखना था। जिसके लिए उन्हें  भारत और पाकिस्तान को कमजोर रखना जरुरी था। इसलिए ब्रिटिश सरकार जम्मू कश्मीर की रियासत का विलय पाकिस्तान से करना चाहती थी जिसके लिए जम्मू कश्मीर के महाराजा तैयार नहीं थे।

द्वितीय विश्व युद्ध के बाद, साम्यवादी रूस के प्रभाव को रोकना, ब्रिटिश-अमेरिकी कूटनीति की प्राथमिकता थी। उनके हिसाब से इस्लामी एकता ही यह काम कर सकती थी और पाकिस्तान इस एकता की धुरी बन सकता था। उन्नीसवीं शताब्दी में मध्य एशिया में ब्रिटेन ने अपने साम्राज्यवादी हितों के लिए जिस ग्रेट गेम की अवधारणा को जन्म दिया था, बीसवीं शताब्दी के मध्य में वह नये रूप में उभर आई थी। जब यह स्पष्ट हो गया कि अब भारत का विभाजन अपरिहार्य है तो ब्रिटेन अमेरिका कूटनीति के सामने सबसे बड़ा प्रश्न था कि इन दो देशों में से उसके रणनीतिक हितों के लिए कौन सा देश लाभदायक होगा? ब्रिटेन के लिए पाकिस्तान के सिवा कोई विकल्प था ही नहीं। अब उसे, ‘‘पाकिस्तान के साथ अच्छे संबंध बनाने होंगे ताकि पूर्वी पाकिस्तान में चट्टगांव बंदरगाह समेत कराची बंदरगाह और पेशावर हवाई पत्तन के प्रयोग की सुविधा प्राप्त हो सके। ब्रिटेन की इस  नीति का अमेरिका की उस नीति से सामंजस्य बैठता था जिसके अनुसार यह सोवियत रूस की घेराबंदी करना चाह रहा था।...  लेकिन इन दोनों उद्देश्यों की पूर्ति तभी संभव हो सकती थी यदि पाकिस्तान को बढ़ावा दिया जाता और जम्मू-कश्मीर को उसमें शामिल करवाया जाता। “वास्तव में चीन-रूस के विस्तार को रोकने के लिए ब्रिटिश-अमेरिकी कूटनीति, तुर्की से कश्मीर तक अर्धचंद्राकार मुस्लिम देशों की दीवार बनाना चाहती थी, जिसमें पूर्वी कोने पर स्थित पाकिस्तान किसी भी संकट काल में उनके लिए एक सैन्य आधार शिविर का काम करे।

जम्मू-कश्मीर को लेकर ब्रिटेन का एक और डर था। ‘‘यदि पाकिस्तान राजनैतिक दृष्टि से समर्थ बनता है तभी वह मध्य पूर्व व दक्षिण पूर्व एशिया में ब्रिटेन के रणनीतिक हितों की पूर्ति कर सकता है। यह तभी संभव था यदि जम्मू-कश्मीर, भारत और पश्चिमोत्तर सीमा प्रांत के बीच बफर बनता है। यदि कश्मीर भारत का हिस्सा हो जाता है तो पश्चिमोत्तर सीमा प्रांत के खुदाई खिदमतगारों के लिए वह सुरक्षित स्थान बन सकता  है और भविष्य में स्वतंत्र पखतूनिस्तान की मांग उठ सकती है। पखतूनिस्तान का भय पाकिस्तान और ब्रिटेन को नजदीक ला रहा था। पखतूनिस्तान को रोकने के लिए भारत को पाकिस्तान के पश्चिमोत्तर सीमांतप्रांत से दूर रखना जरूरी था। यह तभी संभव था यदि जम्मू-कश्मीर भारत में शामिल न होता। पाकिस्तान के सभी बड़े मसलन पेशावर, लाहौर, और रावलपिंड़ी इत्यादि जम्मू-कश्मीर की सीमा से तीस से लेकर पचास किलोमीटर की दूरी तक ही पड़ते थे। ब्रिटिश कूटनीति पाकिस्तान के स्थायित्व के लिए इन्हें भारत की मार से दूर रखना चाहती थी। इसी प्रकार पाकिस्तान में जल की आपूर्ति जम्मू-कश्मीर में से निकलने वाली नदियों से होती थी। इसी दृष्टि से मीरपुर में मंगला बांध की महत्ता बहुत ज्यादा थी। इन सभी कारकों को ध्यान में रख कर ब्रिटेन किसी भी तरह जम्मू-कश्मीर रियासत को पाकिस्तान में शामिल करवाने का इच्छुक था।

लार्ड माउंटबेटन को अब इस ब्रिटिश कूटनीति को सफल बनाना था और कश्मीर को पाकिस्तान में शामिल करवाने की रणनीति ही नहीं बनानी थी बल्कि उसका सफल निष्पादन भी करना था। यदि यह क्षेत्र ब्रिटिश भारत में होता तब तो उसे पाकिस्तान को देने में दिक्कत ही नहीं थी। लेकिन इंग्लैंड के दुर्भाग्य से यह रियासत थी, जिसके बारे में निर्णय लेने का अधिकार वहां के शासक को ही था। वास्तव में 1947 में इंग्लैंड सरकार द्वारा यह घोषित कर दिये जाने के बाद कि वे भारत छोड़कर चले जायेंगे और भारत दो डोमिनियनों में विभक्त कर दिया जायेगा, भौगोलिक कारणों से जम्मू कश्मीर रियासत की महत्ता बढ़ गई थी। रियासत की सीमा भारत और पाकिस्तान दोनों ही डोमिनियनों से लगती थी। भारत जानता था कि रियासत के भारत में अधिमिलन  के लिये वहाँ के अवाम की भूमिका भी महत्वपूर्ण रहेगी। कांग्रेस वैसे भी सैद्धान्तिक तौर पर रियासतों में लोकतांत्रिक व्यवस्था की स्थापना हेतु वहाँ के अवाम को प्राथमिकता देती थी। लेकिन उस समय कश्मीरी अवाम के सब से बड़े प्रतिनिधि शेख अब्दुल्ला मई 1946 से ही जेल में थे। भारत जानता था कि इस संक्रमण काल में शेख का जेल से बाहर आना कितना महत्वपूर्ण है। इसलिए पंडित जवाहर लाल नेहरू और महात्मा गांधी तुरन्त श्रीनगर जाना चाहते थे ताकि महाराजा हरि सिंह को शेख अब्दुल्ला को छोड़ने के लिये मनाया जा सके। लेकिन पाकिस्तान चाहता था कि शेख जेल से बाहर न आयें। उसने तो शेख को अपना दुश्मन नम्बर एक घोषित कर रखा था, क्योंकि शेख बराबर जिन्ना के द्विराष्ट्रवाद के सिद्धान्त का विरोध कर रहे थे। उधर माउंटबेटन भी नहीं चाहते थे कि शेख छोड़ दिये जायें । इसलिये वे नेहरू के श्रीनगर जाने को किसी भी प्रकार रोकने का प्रयास कर रहे थे। उन्हें पता था कि नेहरू रियासत को भारत में शामिल करवाने के प्रबल इच्छुक हैं। इसलिए उन्हें डर था कि वे कश्मीर जाकर महाराजा पर शेख को छोड़ने के लिये दबाव बनायेंगे। उस समय यह भी निश्चित ही था कि यदि शेख बाहर आते हैं तो वे रियासत के भारत में अधिमिलन  का समर्थन करेंगे। शेख के समर्थन का अर्थ था कि कश्मीर के मुसलमान भारत का समर्थन करेंगे। इसी को ध्यान में रखते हुये दिल्ली में सर कोनार्ड कोटफील्ड की अध्यक्षता में ब्रिटिश सरकार का पॉलिटिकल विभाग यह प्रयास कर रहा था कि महाराजा शेख को जेल से न छोड़ें। माउंटबेटन, नेहरू व महात्मा गांधी के श्रीनगर जाने से पहले एक बार खुद कश्मीर जाकर महाराजा को पाकिस्तान में शामिल होने के लिये तैयार करना चाहते थे। इसी रणनीति के तहत वे 19 जून 1947 को श्रीनगर पहुँचे। वे वहाँ चार दिन रहे। "उन्होंने महाराजा हरि सिंह को सलाह दी कि वे किसी भी हालत में 15 अगस्त से पहले पहले भारत या पाकिस्तान, किसी में भी शामिल हो जायें, लेकिन इसके लिये अपने लोगों की राय अवश्य जान लें। अलबत्ता उन्होंने महाराजा को यह भी बता दिया कि यदि वे पाकिस्तान में शामिल होने का निर्णय करते हैं तो भारत सरकार को कोई आपत्ति नहीं होगी।” हरि सिंह के शब्दों में ही, “लार्ड मॉऊटबेटन ने जिस प्रकार मानचित्रों और आंकड़ों से मुझसे हालात पर चर्चा की, उससे स्पष्ट था कि वे मुझे पाकिस्तान में शामिल होने के लिए कह रहे थे।”लेकिन महाराजा हरि सिंह ने युक्तिपूर्वक माउंटबेटन को खाली हाथ वहाँ से लौटा दिया। माउंटबेटन का अपना तर्क था “रियासत में मुस्लिम आबादी तो ज्यादा थी ही, लेकिन दूसरा कारण था कि इससे पाकिस्तान ज्यादा स्थिर होता है।” रियासत को पाकिस्तान में मिलाने के लिए वहां के अंग्रेज अधिकारी और उनके समर्थक अपने ढंग से प्रयास कर रहे थे।  महाराजा का प्रधानमंत्री रामचन्द्र काक, जिसकी पत्नी ब्रिटिश थी, ब्रिटिश षडयंत्र का हिस्सा बन गया और ”कश्मीर को पाकिस्तान में मिलाने के लिये वहां के राजनीतिज्ञों से जोड़-तोड़ कर रहा था वह डोगरा सेना के अंग्रेज सेनापति स्काट से मिला हुआ था। जिन्ना का ब्रिटिश सैनिक सचिव महाराजा के नाम कायदे आज़म की चिट्ठियाँ लेकर तीन बार श्रीनगर आया। कायदे आजम खुद भी खराब सेहत के बहाने श्रीनगर आना चाहते थे। उद्देश्य स्पष्ट था। वहाँ रहकर महाराजा को पाकिस्तान में शामिल होने कि लिये पहले समझाया जाये, न मानने पर डराया-धमकाया जाये। जिन्ना के व्यक्तिगत सचिव श्रीनगर में विभाजन से पूर्व ही साम्प्रदायिक वैमनस्य भड़काते रहे, ताकि समय आने पर महाराजा को पाकिस्तान में शामिल होने के लिए विवश किया जा सके। पाकिस्तान ने सितंबर मास में ही कबाइलियों के माध्यम से रियासत पर आक्रमण करने की योजना बना ली थी और माउंटबेटन को इसका पता था। ब्रिटिश अधिकारियों को सिंतबर में ही इस बात का पता चल गया है कि महाराजा हरि सिंह ने भारत में अधिमिलन  का निर्णय ले लिया था। लेकिन तब भी माउंटबेटन पाकिस्तान के पक्ष में ही थे। मेहर चंद महाजन राम चंद्र काक के बाद जम्मू कश्मीर के प्रधानमंत्री बने। राज्य की विकटतम परिस्थितियों के बारे में वह बताते हुए वह कहते है “प्रधानमंत्री का पद संभालने से पहले मैं माउंटबेटन से मिला। उनका कहना था कि भौगोलिक स्थिति के कारण महाराजा के पास पाकिस्तान में शामिल होने के सिवाय कोई विकल्प नहीं है,  जब मैने पन्द्रह अक्टूबर को रियासत के प्रधानमंत्री का पद संभाला तो पाकिस्तान द्वारा महाराजा को डराने धमकाने का काम शुरू हो चुका था। सचमुच बल प्रयोग की पूरी योजना भी बना ली गई थी और अब वह केवल क्रियान्वयन की स्टेज पर थी।”

महाराजा हरि सिंह ने अधिमिलन पत्र भी निष्पादित कर दिया था। रियासत पाकिस्तानी हमले से जूझ रही थी। अब ब्रिटिश नीति यह बनी कि श्रीनगर में भारतीय सेना पहुंचने से पहले पाकिस्तान रियासत पर कब्जा कर लें। नवंबर-दिसंबर तक आते-आते वैसे ही बर्फबारी के कारण कश्मीर के रास्ते बंद हो जायेंगे और फिर भारतीय सेना वहां पहुंच ही नही पायेगी। क्योंकि माउंटबेटन के सामने अधिमिलन को स्वीकारने के अतिरिक्त तो कोई चारा नहीं था। परंतु माउंटबेटन के दुख की भी कोई सीमा नहीं थी। उन्होंने दु:ख का इज़हार भी किया।

बकौल माउंटबेटन “मैंने बड़ी मुश्किल से पटेल को मनाया कि रियासत के पाकिस्तान में शामिल होने पर वे बुरा न माने। लेकिन जब मेरी सारी योजना गुड गोबर हो गई तो मुझे बहुत ही दुःख हुआ। यह सारा उस ब्लडी फूल हरि सिंह के कारण ही हुआ।  उसके आगे की रणनीति माउंटबेटन के अपने ही शब्दों में ‘‘जब तक वी पी मेनन अधिमिलन  पत्र लेकर आये मैंने मन बना लिया था कि परिस्थिति को कैसे संभालना है। मैंने नेहरू को कहा कि यह अधिमिलन  पत्र तो आ गया है। मैं सांविधानिक गर्वनर जनरल की हैसियत में इस पर आपकी प्रार्थना के बाद ही हस्ताक्षर करूंगा। लेकिन ये हस्ताक्षर भी मैं तभी करूंगा यदि आप कश्मीरियों को अपनी इच्छा व्यक्त करने का विकल्प देने के लिये तैयार हो। नेहरू ने इसे स्वीकारते हुये केवल एक शर्त रखी कि लोगों की राय शान्ति स्थापित होने पर ली जाएगी। मैंने इसे स्वीकार कर लिया”। हालाँकि देखा जाय तो सारे विवाद की जड़ में है विलय पत्र पर हस्ताक्षर के साथ ही माउंटबेटन द्वारा महाराजा हरि सिंह को लिखा गया पत्र, जिसमें उन्होंने जनता की राय लेने की बात कही। इसकी कोई वैधानिक स्थिति नहीं है क्योंकि इस प्रकार के सशर्त विलय का कोई प्रावधान भारत स्वतंत्रता अधिनियम 1947 में नहीं था। यह तथ्य है कि महाराजा ने अपने हस्ताक्षर किये हुए विलय पत्र के साथ एक पत्र भेजा था जिसमें विलय का निर्णय करने में हुए विलम्ब के कारणों पर प्रकाश डाला था। किन्तु उन्होंने इसमें कहीं भी राज्य में विलय को लेकर हुए किसी विवाद की चर्चा तक नहीं की है। न तो उसमें भारत में विलय को लेकर जनता के विरोध का उल्लेख है और न ही पाकिस्तान के साथ विलय अथवा स्वतंत्रता की मांग संबंधी किसी आन्दोलन का जिक्र। अन्य उपलब्ध दस्तावेजों में भी कहीं ऐसे किसी विवाद का संदर्भ नहीं मिलता। फिर भी माउंटबेटन द्वारा विलय को विवादित बताया जाना किसी दूरगामी राजनीति की ओर संकेत करता है। कश्मीर के मुख्य राजनीतिक दल नेशनल कांफ्रेंस के अध्यक्ष शेख अब्दुल्ला भी रियासत के भारत में अधिमिलन  के पक्ष में थे। महाराजा हरि सिंह अधिमिलन  के कानूनी पक्ष के अंग थे तो शेख उसके लोकतांत्रिक पक्ष के अंग बने। उस समय उनके शत्रु भी यह कहने की स्थिति में नही थे कि शेख कश्मीर घाटी के मुसलमानों का प्रतिनिधित्व नहीं करते। जम्मू और लद्दाख के लोग तो अधिमिलन  के मामले में सबसे ज्यादा मुखर थे। अतः अक्टूबर 1947 को जब रियासत का भारत में अधिमिलन  हुआ तो रियासत के शासक और रियासत की अधिकांश जनता अधिमिलन  के पक्ष में थी। इस लिए माउंटबेटन का इस प्रश्न पर लोगों की राय जानने की जिद का कोई आधार नहीं था। लेकिन माउंटबेटन तो भविष्य की रणनीति के पासे फेंक रहे थे। उन्हें पूरा विश्वास था कि इस तरीके से कश्मीर पाकिस्तान को मिल जायेगा, पर जब उनकी यह योजना सफल नहीं हुई तो उन्हें दुख हुआ। लेकिन माउंटबेटन पाकिस्तान को कश्मीर में शामिल करवाने की अपनी योजना अधूरी कैसे छोड़ सकते थे?  उनको लगता था कि, यदि जम्मू कश्मीर में शांति स्थापित हो, तो यह योजना सिरे चढ़ सकती है। लेकिन यहां तो दोनों देशों की सेनायें आमने-सामने थीं। इस हालत में तो माउंटबेटन चाह कर भी कुछ नहीं कर पा रहे थे।

     इधर भारतीय सेनायें पाकिस्तान से रियासत के इलाके खाली करवा रही थी, उधर अंग्रेज षड़यंत्रकारी, रियासत का  जितना भी हिस्सा हो सके, पाकिस्तान के हवाले करने के काम में लग गए थे। गिलगित में गिलगित स्टाऊटस अर्धसेना बल के कमांडिंग ऑफिसर मेजर बिलियम ब्राऊन थे। ब्राऊन के नेतृत्व में इस स्काऊटस ने 31 अक्टूबर 1947 को गिलगित के बजीरे बजारत घनसारा सिंह का आवास रात्रि को घेर लिया और उन्हें गिरफ्तार कर लिया। रियासत की सेना ने मुकाबला किया लेकिन उसके मुसलमान सैनिक शत्रु के साथ जा मिले और बची-खुची सेना काट दी गई। मेजर ब्राऊन के नेतृत्व में ही गिलगित की अन्तरिम  सरकार का गठन कर लिया गया। 4 नवम्बर को मेजर बिलियम ब्राऊन ने स्काऊटस लाइन से रियासत का झंड़ा उतार कर वहां पाकिस्तानी झंड़ा फहरा दिया और इस  क्षेत्र के पाकिस्तान में शामिल होने की घोषणा कर दी। इस पूरे कांड में न तो वहां की जनता शामिल थी और न ही मीर व राजा। अंग्रेज इस क्षेत्र की सामरिक व कूटनीतिक, दोनों दृष्टियों से महत्व जानते थे। इसलिय उन्होंने इसे तुरंत पाकिस्तान के हवाले कर दिया। घनसारा सिंह के अनुसार," गिलगित में होने वाला विद्रोह अंग्रेज़ सैनिक अधिकारियों द्वारा भड़काया गया सैनिक विद्रोह था, जिसके फलस्वरुप गिलगित का पतन हुआ और वह पाकिस्तान के कब्जे में चला गया। गिलगित की जनता का इस विद्रोह में कोई हाथ नहीं था।

लार्ड माउंटबेटन पंडित जवाहर लाल नेहरू पर कश्मीर के मसले को न्याय के लिये संयुक्त राष्ट्र में ले जाने का दबाव बनाने लगे थे। संयुक्त राष्ट्र में जाने के लिये महात्मा गांधी भी सहमत नहीं थे। सरदार पटेल तो इसके विरोधी ही थे। लेकिन माउंटबेटन के प्रभाव, दबाव या फिर सुझाव पर, नेहरू अनेक विरोधों के बावजूद प्रथम जनवरी 1948 को यह मसला राष्ट्र संघ में ले ही गये। जिसकी वजह से कश्मीर में आज भी पाकिस्तान पोषित आतंकवाद घाटी की छाती को छलनी कर रहा है।

 

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