बुजदिल का न तो कोई ईमान होता है न ही मुल्क: गौहर अहमद भट को सलाम !

03 Nov 2017 14:10:05

 


 

विनोद मिश्रा

बीजेपी के एक तेज तर्रार युवा नेता गौहर अहमद भट की गला रेत कर हत्या कर दी गयी। शोपियां, कश्मीर के 30 साल का यह नौजवान वतनपरस्ती को अपना ईमान माना था, मुल्क की मुख्यधारा से जुड़कर गौहर, कश्मीर में लोकतान्त्रिक संस्थाओं को मजबूती देना चाहता था। लेकिन जिस देश में सत्ता से बेदखल होते ही पूर्व गृह मंत्री चिदंबरम को  कश्मीर में पॉलिटकल प्रोसेस फार्स लगता हो और उन्हें ग्रेटर  आजादी में ही कश्मीर समस्या का समाधान दिखता हो ऐसे नेताओं के लिए गौहर भट की शहादत का क्या मायने हैं। जिस रियासत में आतंकवाद के बढ़ते खौफ से घबराकर (कश्मीर पर अपना पुश्तैनी हुकूमत मानने वाले) फारूक अब्दुल्लाह पूरे परिवार के साथ लन्दन भाग खड़े हुए हों, उसी रियासत के  शोपियां में हिज्बुल मुजाहिद्दीन के खौफ के बीच गौहर भारत की आन वान शान  के लिए जूझता रहा।

 

कश्मीर की आजादी, स्वायत्ता और मुस्लिम बहुल कश्मीर के लिए विशेष दर्जा माँगने वाले और छदम  धर्मनिरपेक्षता के बीच अलगावाद को निरंतर शह देने वाले लोगों को गौहर अहमद भट की मौत से कोई सदमा नहीं लगेगा। ऐसे सैकड़ो पोलिटिकल एक्टिविस्ट कश्मीर में मारे गए हैं। लेकिन गौहर की मौत ने कश्मीर को देश की मुख्यधारा से अलग देखने वाले को करारा सन्देश दिया है कि बुजदिल का न तो कोई ईमान  होता है न ही मुल्क। देश की राष्ट्रीय पार्टी कांग्रेस से अफसोस के एक अलफाज न आना शर्मसार  करता है। 

 

देश के और रियासत के इंसानी हुकूमत के पैरोकारों के लिए गौहर की मौत शायद मानवाधिकार हनन का मामला  नहीं बनता  है। सहिष्णुता  पर शोखी बघारने वाले लोगों के लिए यह असहिष्णुता का मुद्दा हो ही नहीं सकता क्योंकि गौहर भट ने अपने कौम और मुल्क के लिए कुर्बानी दी है। कश्मीर माँगे आजादी वालो के लिए यह मौत  जश्न जैसा है क्योंकि यहाँ बुरहान वानी तैयार किये जाते हैं, गौहर भट नहीं। लेकिन आज गौहर भट की मौत ने एक सन्देश जरूर दिया है कि अगर यह मुल्क गौहर भट की मौत पर खामोश रहेगा, मरहूम डी एस पी मोहम्मद अयूब पंडित की मौत पर चुप रहेगा फिर उसे कश्मीर को अपना अभिन्न हिस्सा कहने का कोई हक नहीं हैं।

 

श्रीनगर जामिया मस्जिद में इसी साल ईद के रोजे डी एस पी अयूब पंडित को भीड़ ने पीट पीट कर मारा डाला था और मस्जिद के अंदर मीरवाइज उमर फारूक खुद यह नजारा देख रहे थे। उन्मादी भीड़ डी एस पी अयूब के बदन से एक-एक कपड़ा नोच रही थी। लात घुसे बरसा रही थी, लेकिन उसे बचाने कोई आगे नहीं आया। क्या इन उन्मादी को भारत से और आजादी चाहिए, क्या अयूब पंडित की मौत के जिम्मेदार मीरवाइज उमर फारूक पर कत्ल का इल्जाम नहीं लगनी चाहिए ?

 

1948 में कश्मीर पर पाकिस्तान का गुर्रिल्ला आक्रमण हो या पाकिस्तान प्रायोजित आतंकवाद हर दौर में भारतीय फौज ने भारी कुर्बानी देकर कश्मीर में लोकतंत्र को मजबूती से सहारा दिया है। लेकिन दिल्ली में बैठे राजनेताओं ने कभी आजादी, ऑटोनोमी से अलग कश्मीर में उठ रही आवाज को सुनी नहीं। 

 

पिछले 10 वर्षों में 300 से ज्यादा पंच-सरपंच कश्मीर में मारे गए लेकिन कभी किसी ने इन मौतों पर अफसोस तक जाहिर नहीं किया। लाखों करोड़ रूपये की पैकेज से कुछ चंद लीडरानो के घर भरेंगे, कश्मीर में लोकतंत्र की मजबूती  इन्ही पंच-सरपंचों से आएगी, यह फारूक और महबूबा से नहीं होगा। इन्हें अपना सियासी दूकान चलानी है। भारत के साथ जुड़ने वाले गौहर भट को शहीद मानकर उसके बलिदान से सबक लेने की जरुरत है।  साबिक मंत्री चिदंबरम और यशवंत सिन्हा कांग्रेस की यथास्थिति पर विश्वास करते हैं उनकी सोच में गौहर भट जैसे लोगों के लिए कोई जगह नहीं है। गौहर अहमद भट को मेरा सलाम ! 

 

 

 

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