गणतंत्र दिवस पर कभी न भरने वाला घाव, जब पाकिस्तानी आतंकियों ने एक साल के विनय को मारी थी 18 गोलिया।

14 Dec 2017 11:26:07


JKN Team 

वनधामा नरसंहार की यादे इतिहास के उन ख़ौफनाक मंजरो में कैद है जिसे जब भी स्मरण किया जाए  तभी हमे असहनीय वेदनाओं से गुजरना पड़ता है। 25 जनवरी 1998 की वो ठंडी रात,  जम्मू कश्मीर का वनधामा गाँव जिसके नाम के अर्थ मे ही सर्दी मे गर्मी है वो 23 निर्दोष कश्मीरी हिन्दुओं की लाशों से ठंडा पड़ जायेगा किसी ने सोचा ना था। पाकिस्तान प्रायोजित आतंक का डंक इतनी निर्दयता के साथ इन्हें डसेगा यह उम्मीद किसी को ना थी। उस रात जो कुछ भी हुआ उसने सभी के दिलो को झकझोर दिया। रात्रि 10 बजे के करीब 25 आतंकवादी भारतीय सेना की वर्दी में श्रीनगर से 30 km  की दूरी पर स्थित इस गाँव मे प्रवेश करते है। सर्वप्रथम वे मोतीलाल भट्ट जो कि वहाँ एकमात्र औषधालय मे एक चिकित्सा सहायक थे, उनके घर पर धावा बोल देते है। यही से 4-4 के गुटो में आतँकवादी, कश्मीरी हिन्दुओं के घरो में और शेष गाँव को घेरने के लिए भेज दिए जाते है। एकाएक बद्रीनाथ के घर पर आतंकियों का गुट आ धमकता है और उनसे चाय की पेशकश करता है। वेशभूषा भारतीय सेना की होने की वजह से बद्रीनाथ का परिवार धोखा खा जाता है और उनकी खातिरदारी मे लग जाता है। 11 बजे के करीब उन्हें यह पता चलता है के पड़ोस के अन्य तीन परिवार भी इसी तरह से अजनबी आगन्तुकों की सेवा मे लगे हुए है। वे सतर्क हो जाते है और उन्हें वहाँ से जाने को कहते है। आतँकवादी अब अपने दिखावटी रूप से बाहर आ जाते है। वो पूरे परिवार को बन्दूक की नोंक पर रख देते है। सभी आतँकवादी रेडियो यन्त्र के माध्यम से एक-दूसरे से सम्पर्क साधे हुए थे। एक घण्टे के बाद जैसे ही 26 जनवरी की तारिख कलैंडर मे चढ़ती है। रेडियो यन्त्र से आवाज बाहर आती है , पूरा गाँव छानबीन कर घेर लिया गया है। आतंकवादियों के चारो गुट जो कि अलग-अलग कश्मीरी हिन्दुओं के घरो पर तैनात थे। वे उनके परिवरों पर अंधाधुंध गोलियों की बरसा कर देते है। 15 मिनट के अंदर ही सारा गाँव तबाह हो जाता है। चारो तरफ़ लाशें ही लाशें बिछ जाती है। कश्मीरी हिन्दुओं की चीखों को, उनकी याचनाओ को मौत की नींद सुलाकर बंद कर दिया जाता है। इस नरसंहार में 9 महिलाओ, 4 बच्चो व 10 पुरुषों समेत 23 कश्मीरी हिन्दुओं को बड़ी ही क्रूरता से मौत के घाट उतारा जाता है। 14 वर्षीय, एक मात्र मनोज कुमार धर (विनोद)  ही इस हत्याकांड मे खुद को छत पर बने भूसे उर गोबर के उपलों के ढेर मे छिपा लेने पर बचा पाता है। आतंकियों की निर्ममता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है के उन्होंने एक वर्ष के विनय कुमार तक को नहीं बख्शा, उसके शरीर से गोलियों के 18 घाव मीले थे। एक नन्हे मासूम के शरीर को इतनी बर्बता से छलनी करते समय उन दरिंदो के हाथ तक नही काँपे। उन सभी ने आतंक की परकाष्ठा को पार कर दिया था। जाते जाते उन्होंने कश्मीरी हिन्दुओं के घरों व मन्दिर को आग के हवाले कर दिया। मोतीलाल का घर मन्दिर समेत धूँ-धूँ कर जल उठा। 6 लोगों के आग से झुलसे हुए शव निकाले गए जिनमे 2 महिलाएं और 2 बच्चे थे। एक महिला ने अपने बच्चे को अपनी गोद मे छिपाया हुआ था। पुलिस ने बड़ी ही मशक्कत से उसे अलग करने की कोशिश भी की पर कर ना सकी। शरुआती जाँच पड़ताल मे सामने आया कि आतंकवादियों ने एक मृत शरीर के साथ एक पत्र छोड़ दिया था जिसमे इस हमले की जिम्मेवारी इंतिकाम-उल-मुस्लिमून ने ली थी। बाद मे कई परते खुली। हरकत उल आंसर के साथ साथ हिजबुल मुजाहिदीन का अबदुल हमीद गाड़ा इस हमले का योजनाकार निकला जिसे मार्च 2000 में भारतीय फौज ने मार गिराया

मृतको की सूची 

मोतीलाल के परिवार से स्वयँ मोतीलाल, उनकी पत्नी छोटली, उनका बेटा संजय कुमार, दोनों बेटियां- सारिका और सीमा कुमारी, बहू विजय कुमारी, उनके दोनों पोते- विनय कुमार और नीनू। मोतीलाल के घर रिश्ते के लिए शोपियां से आये हुए बद्रीनाथ के परिवार से स्वयं बद्रीनाथ, उनकी पत्नी आशा जी, बेटा-राकेश, दामाद-विनोद कुमार व दोनों बेटिया-ज्योति और मीनाक्षी। शादीलाल के परिवार से स्वयं शादीलाल, उनकी पत्नी, उनके दोनों बेटे - अक्षय और विकास। सुदर्शन भट्ट के परिवार से स्वयँ सुदर्शन भट्ट, उनकी पत्नी दुलारी भट्ट व उनका भाई त्रिलोकी नाथ। काशीनाथ के परिवार से स्वयं काशीनाथ व उनका बेटा विनोद कुमार।

हिन्दुओ की जिंदगी के साथ-साथ उनकी आस्था से भी खिलवाड़

आतंकवादी, कश्मीरी हिन्दुओं का कत्लेआम कर उनके घरों को जलाने के साथ साथ हिन्दुओ की आस्था से खिलवाड़ कर उसका गला घोंटने से भी नही कतराए। उन्होंने कश्मीरी हिन्दुओं के जहन मे खौफ पैदा करने के लिए उनके घरो के पास बने हुए मन्दिर को भी आग की लपटों में झोंक दिया। अब गौर करने वाली बात यह है, के उस रात रमज़ान का महीना चल रहा था। शौक-ए-कदर का आयोजन थोड़ी ही दूरी पर स्थित मस्जिद में हो रहा था। एक तरफ मस्जिद में मुस्लिम धर्म की आस्था सिरे चढ़ रही थी। नमाज अदा की जा रही थी। दूसरी तरफ उसी धर्म के अनुयायी,  जम्मू कश्मीर को इस्लाम बहुल राज्य बनाने के उदेश्य से कश्मीरी हिन्दुओं को बरबरता से मारकर उनके भगवान को आग के हवाले कर रहे थे।

गणतन्त्र दिवस का कभी ना भरने वाला घाव।

पाकिस्तान प्रायोजित आतंकवादियो ने गणतन्त्र दिवस की सुबह इस नरंसहार को अंजाम दिया। जिसने हर भारतीय के दिल मे ऐसा घाव दे दिया जिसे भरना इतना आसान नही था। एक तरफ सम्पूर्ण भारत, गणराज्य दिवस की खुशियां मनाने को बेताब था। दूसरी तरफ इसकी आन बान और शान कहे जाने वाले जम्मू-कश्मीर राज्य के वनधामा गाँव मे 26 जनवरी की सुबह होने से पहले ही यह ख़ौफ़नाक नरंसहार घटित हो गया। पूरा देश स्तब्ध था। किसी ने इसकी कल्पना भी नही की थी। समस्त भारतवासियो की संवेदनाये व् सहानुभूति उनके कश्मीरी पंडित भाइयो के लिए उजागर हो रही थी। राष्ट्र पर्व पर हुई इस दर्दनाक घटना ने सभी के दिलो में शक्तिशाली आघात किया था। सभी नागरिकों के मन में दुख व्याप्त था, खून उबाल लें रहा था। पाकिस्तान प्रायोजित आतँकवादी ताकतों के प्रति नफरत उफ़ान पर थी। उस समय इस क़त्लेआम के शोक और गणतंत्र दिवस के हर्ष की भावनाओं के मध्य एक अजीब सी जोर आजमाइश चल रही थी।

 

 

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