जम्मू कश्मीर के बारे में गलत जानकारी होने से गलत धारणा बनती है भाग-1

02 Dec 2017 00:22:54


 

मुकेश कुमार सिंह

जम्मू कश्मीर देश के सबसे ज्यादा चर्चित विषयों में से एक है। लेकिन विडंबना यह है कि इतनी चर्चा होने के बावजूद राज्य को लेकर किसी प्रकार के विभ्रम में रहने की सम्भावना कम होने के बजाय विभ्रमों में निरंतर वृद्धि हुई है। गलत जानकारी होने से गलत धारणा बनती है और गलत धारणा बनने से निर्णयों में त्रुटी की संभावना बहुत ज्यादा बढ़ जाती है। इन्हीं गलत धारणाओं को  तथ्यों के आधार पर सही करने का एक प्रयास “जम्मू कश्मीर नाउ” अपनी एक नई  श्रृंखला “संवाद” के माध्यम से शुरू कर रहा है। इस श्रृंखला में जम्मू कश्मीर के विषय में आम जन हमसे संवाद कर सकते है। यदि किसी व्यक्ति के मन में जम्मू कश्मीर के बारें में कोई प्रश्न हो तो वह हमसे प्रश्न कर सकता है। जिसका जवाब हम अपनी वेबसाइट के माध्यम से निरंतर देंगे। इसी कड़ी में संवाद का पहला संस्करण प्रकाशित किया जा रहा है।

संवाद भाग - एक

प्रश्न- जम्मू कश्मीर के बारे में मिथ्या प्रचार क्या है?

उत्तर- जम्मू कश्मीर को लेकर निरंतर भ्रम पैदा किये गए है और अलगाववादी भावनाओं को भड़काने का कार्य किया गया है। मुख्यतः जम्मू कश्मीर को लेकर तीन मिथ्यों को प्रचारित और प्रसारित किया है। जम्मू कश्मीर के बारे में पहला सबसे बड़ा झूठ गढ़ा गया कि जम्मू कश्मीर को भारतीय संविधान ने विशेष राज्य का दर्जा दिया है। जबकि ऐसा बिलकुल नहीं है। संविधान में अनुच्छेद 370 को यदि केवल ध्यान से पढ़े तो आप पायेगे कि अनुच्छेद 370 केवल अस्थायी अनुच्छेद है। इस बात का सत्यापन भारतीय लोकसभा में देश के गृह राज्य मंत्री ने राज्य के विशेष दर्जे से सम्बंधित प्रश्न पर सीधे-सीधे शब्दों में इस बात को खारिज कर दिया कि 370 के अंतर्गत जम्मू कश्मीर को कोई विशेष दर्जा नहीं दिया गया है।  


 

यदि केवल तथ्यों का अवलोकन करे तो भारतीय संविधान में “विशेष” शब्द ही 1963 में जोड़ा गया था। और जब “विशेष” शब्द जोड़ा भी गया था तो केवल अनुच्छेद 371 के विषय में जोड़ा गया था न कि 370 के विषय में। और यह सर्वविदित है कि अनुच्छेद 370 भारतीय संविधान में 1950 में जोड़ा गया था। यदि संविधान में “विशेष” शब्द ही    1963 में जोड़ा गया था तो 1950 से लेकर 1963 तक अनुच्छेद 370  का स्टेटस क्या था। इस बात की थोड़ी सी गहराई में जायेगे तो आपको स्पष्ट होगा कि अनुच्छेद 370, 1950 में भी अस्थायी था, 1963 में अस्थायी था और आज 2017 में भी अस्थायी है। 

दूसरा मिथ्या प्रचार यह है कि जम्मू कश्मीर का भारत में विलय विवादित और अवैध है। जबकि जम्मू कशमीर का विलय कानूनी रूप से पूरी तरह वैध है. यूएन ने भी विलय को पूरी तरह से स्वीकार किया है और पाकिस्तान को एक बाहरी आक्रमणकारी माना और उसे जम्मू कश्मीर से अपनी पूरी सेनायें निकालने को कहा था। लेकिन दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति यह है कि देश में हमारा बुद्धिजीवी वर्ग पाकिस्तान के अवैध कब्जे पर बिलकुल भी चर्चा नहीं करता किन्तु विलय पर निरंतर प्रश्न खड़ा करने में लगा रहता है।

तीसरा यह कि कश्मीर पूरे जम्मू कश्मीर राज्य का प्रतिनिधित्व करता है और वह भारत से अलग होना चाहता है। जबकि वास्ताविकता यह है अलगाववाद और आतंकवाद का प्रभाव मात्र कश्मीर घाटी के 4-5 जिलों के कुछ पॉकेट्स में ही है। लद्दाख जो कि राज्य का सबसे बड़ा क्षेत्र वहां पर अलगाववादी तत्वों का लेशमात्र भी प्रभाव नहीं है। बिलकुल ऐसी ही स्थिति राज्य के दूसरे सबसे बड़े क्षेत्र जम्मू की है, वहा पर भी अलगाववादी तत्वों का कोई आस्तित्व नहीं है। केवल 4-5 जिलों के कुछ पॉकेट्स के अलगाववाद को सम्पूर्ण जम्मू कश्मीर पर थोप देना पूर्णतया असंगत एवं अव्यवहारिक है।

 

प्रश्न- क्या पाकिस्तान ने  अन्तर्राष्ट्रीय मंच पर कानूनी तौर जम्मू कश्मीर पर अपना दावा जताया है?

उत्तर- जम्मू कश्मीर को लेकर दुनिया के किसी भी मंच पर पाकिस्तान ने आज तक कोई भी दावा भी किया है। पाकिस्तान जम्मू कश्मीर की कानूनी और संवैधानिक स्थिति से पूरी तरह से वाकिफ है। पाकिस्तान के अपने संविधान में जम्मू कश्मीर का कही भी कोई जिक्र नहीं किया है, बल्कि हम ऐसा भी कह सकते है कि पाकिस्तान जम्मू कश्मीर पर कोई दावा नहीं कर सकता। लेकिन एक सोची समझी साजिश के तहत जम्मू कश्मीर के भारत में विलय पर संशय खड़े करने का प्रयास किये गये है। पाकिस्तान की इसी साजिश का परिणाम है कि भारत में भी पाकिस्तान के प्रचारित एजेंडे को ही बढ़ावा मिल जाता है। स्थिति इतनी विकट है कि जम्मू कश्मीर के संविधान का सेक्शन तीन जिसमें राज्य का संविधान यह घोषणा करता है कि “जम्मू कश्मीर राज्य भारत का अभिन्न अंग है जिसे वहां की विधानसभा या राज्य सरकार चाहकर भी कोई परिवर्तित नहीं कर सकती है।” इसके अतिरिक्त भारतीय संविधान में भी स्पष्ट रूप से जम्मू कश्मीर राज्य को भारतीय संविधान में 15वें नम्बर का राज्य घोषित किया गया है। पाकिस्तान और उसके समर्थित अलगाववाद के मिथ्या प्रचार को यदि हराना है तो हमें इन्हीं तथ्यों को ज्यादा से ज्यादा लोगों तक पहुचाने की आवशयकता है।

 

प्रश्न- जम्मू कश्मीर के अंतिम शासक महाराजा हरि सिंह के राज्य का विस्तार कहा तक था?

उत्तर- यदि आप महाराजा हरि सिंह के राज्य का विस्तार जानना चाहते है तो इस विषय में जम्मू कश्मीर के महाराजा की “उपाधि” का महत्वपूर्ण स्थान है। यदि आप महाराजा की उपाधि का अवलोकन करे तो आप को तात्कालिक जम्मू कश्मीर की सीमाओं का भान होगा।  महाराजा हरि सिंह जम्मू कश्मीर के राजा थे जिनका पूरा नाम- महामहिम श्रीमान इंदर महिंदर राजराजेश्वर महाराजाधिराज श्री हरि सिंह जी बहादुर, जम्मू कश्मीर नरेश तथा तिब्बत आदि देशाधिपति था। 

उनके पदनाम से ही यह पता चल जाता है कि उनके राज्य का विस्तार जम्मू, कश्मीर, लद्धाख और तिब्बत तक था। अक्साई चीन के मानसर गांव से महाराजा हरि सिंह राजस्व संग्रह करते थे जिस पर चीन ने कभी कोई आपत्ति नहीं की। अंग्रेजों ने भी महाराजा के इस अधिकार की वैधता स्वीकार की। 26 अक्टूबर 1947 को जब जम्मू कश्मीर का भारत में विलय हुआ तो सम्पूर्ण जम्मू कश्मीर का विलय हुआ था। यह अत्यंत दुर्भाग्यपूर्ण है कि पिछले 70 वर्षो में पाकिस्तान और चीन द्वारा अधिक्रांत इस क्षेत्र के बारे में कोई बात नहीं करता है। 

 

                                

  

 

 

 

 

 

 

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