अद्भुत स्थापत्यकला का प्रतीक है कश्मीर का मार्तण्ड मन्दिर

20 Dec 2017 13:04:20

मार्तण्ड मन्दिर

 

डा. मयंक शेखर

अनन्तनाग जिला में स्थित मार्तण्ड मन्दिर (सूर्य मन्दिर) का निर्माण ललितादित्य (725-761 ई.) ने किया था । मार्तण्ड मन्दिर भारतीय वास्तुकला की उत्कृष्ट कृतियों में से एक है । यह मन्दिर अखण्डित अर्थात् विना टूटे हुए या विना कटे हुए शिलाओं से निर्मित है ।

सोखण्डिताश्मप्राकारं प्रासादान्तर्व्यधत्त च ।

मार्ताण्डस्याद्भुतं दाता द्राक्षास्फीतं च पत्तनम् ॥

                      राजतरंगिणी 4.192

इस मन्दिर में भगवान् सूर्य के मार्तण्ड रूप की पूजा-अर्चना होती थी । मार्तण्ड मन्दिर, भारतवर्ष के प्राचीन सूर्य मन्दिरों में से एक है ।

मार्ताण्ड का उल्लेख सर्वप्रथम ऋग्वेद में (10.72.8) प्राप्त होता है । इस सूक्त में यह बताया गया है कि अदिति के 8 पुत्र थे जिनके नाम क्रमशः मित्र, वरुण, धाता, अर्यमा, अंश, भग, विवस्वान्, एवं आदित्य था । अपने सात पुत्रों को लेकर अदिति देवताओं के पास चली गई एवं अपने आठवें पुत्र आदित्य (मार्ताण्ड) को इसी लोक में लोगों के जनन-मरण के निमित्त छोड दिया ।

अष्टौ पुत्रासो अदितेर्य जातास्तन्वस्परि ।

   देवाँ उप प्रैत्सप्तभिः परा मार्ताण्डमास्यत् ॥

   सप्तभिः पुत्रैरदितिरुप प्रैत्पूर्व्यं युगम् ।

प्रजायै मृत्यवे त्वत्पुनर्मार्ताण्डमाभरत् ॥

   ऋग्वेद 10.72.8-9

मार्ताण्ड (आदित्य) के उदय होने से लोक का जन्म होता है एवं उसके अस्त होने से मृत्यु । ऋग्वेद के व्याख्याकार सायण ने “जनन-मरण” का यहीं अर्थ किया है: प्राणिमरणजननादीनां सूर्योदयास्तमयायत्तता स्फुटा ।

“मार्ताण्ड” दो शब्दों से बना है- मार्त (जो मृत्यु से निस्पन्न है) और अण्ड (उत्पत्ति का स्थान) । मैत्रायणी संहिता (1.6.12) में मार्तण्ड के जन्म की कहानी बतायी गई है । पुत्र की इच्छा से अदिति ने ओदन (चावल) बनाई और भगवान् को हव्य रूप में अर्पित करने के बाद शेष ओदन को खाया । परिणामस्वरूप अदिति ने दो पुत्रों धाता एवं अर्यमा को जन्म दिया । उसने पुनः ओदन बनाई और हव्य रूप में अर्पित करने के बाद शेष ओदन को ग्रहण किया । अदिति ने पुनः दो पुत्रों मित्र व वरुण को जन्म दिया । उसने पुनः ओदन बनाई और हव्य रूप में अर्पित करने के बाद शेष ओदन को ग्रहण किया । अदिति ने पुनः दो पुत्रों अंश और भग को जन्म दिया ।

इस प्रकार छह पुत्रों को जन्म देने के बाद अदिति ने विचार किया कि हर बार पहले हव्य रूप में भोजन अर्पित करने के बाद शेष को ग्रहण करने से मैनें दो-दो पुत्रों को जन्म दिया । अतः इस बार मैं पहले  भोजन ग्रहण करके बाद में भगवान् को हव्य अर्पित करूँगी । अदिति ने ऐसा ही किया । परिणामस्वरूप, उसने अपने गर्भ में दो अण्डों को धारण किया । उसमें से एक का तो जन्म हुआ किन्तु दूसरा मृत रूप में जन्म लिया । जिसका जन्म हुआ उसका नाम विवस्वान् था एवं दूसरे का नाम मार्ताण्ड था ।  

मार्कण्डेय पुराण (अध्याय 103-105)में भी भगवान् मार्तण्ड के जन्म के बारे में बताया गया है । दिति के पुत्रों (दैत्यों) से पराजय को प्राप्त हुए देवताओं को देखकर उनकी माता अदिति दुःखित हुई । अदिति ने भगवान् सूर्य की उग्र तपस्या की । उसकी तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान् सूर्य ने कहा कि- हे अदिति, मै सहस्र अंश से युक्त होकर तुम्हारे गर्भ में प्रवेश करूँगा एवं पुत्र रूप में जन्म लेकर देवताओं के शत्रुओं का नाश करूँगा । कालान्तर में, अदिति ने व्रत व निराहारपूर्वक गर्भ को धारण किया । अदिति के पति कश्यप ने क्रोधवश आदिति से कहा कि निराहार करके तुम इस गर्भ को मारोगी क्या । अदिति ने कहा कि इस गर्भ को कोई नहीं मार  सकता । पति के वचन से कुपित होकर अदिति ने कश्यप को वह गर्भ दिखाया । उस तेजमय गर्भ को देखकर कश्यप ने प्रणाम किया एवं ऋचाओं से उसकी स्तुति की । इसप्रकार स्तुति को प्राप्त हुआ वह गर्भ कमलपत्र के समान रक्तवर्ण और अपने तेज से सभी दिशाओं को प्रकाशित करते हुए उस अण्ड से प्रकट हुआ । कश्यप को लक्ष्य करके आकाशवाणी हुई कि हे मुनिश्रेष्ठ, तुमने जो अदिति से कहा था कि इस गर्भ को मारोगी क्या? – इसकारण तुम्हारा यह पुत्र मार्तण्ड के नाम से विख्यात होगा । भगवान् मार्तण्ड ने अपने तेज से समस्त दानवों का विनाश किया एवं कदम्ब के पुष्प सदृश ऊपर नीचे उनका शरीर गोल अग्निपिण्ड की तरह हो गया । उन्होंने अत्यन्त प्रकट शरीर धारण नहीं किया । 

कनिंगघम का मानना है कि इस मार्ताण्ड मन्दिर का निर्माण राणादित्य (578-594 ई.) ने किया था और ललितादित्य इस मन्दिर के चारो तरफ घेराबन्दी की थी ।कनिंगघम के इस निष्कर्ष का आधार “राजतरंगिणी” के तृतीय तरंग का अधोलिखित श्लोक है:

ख्यातिं  रणपुरस्वामिसंज्ञया सर्वतोगतम् ।

  स सिंहरोत्सिकाग्रामे मार्ताण्डं प्रत्यपादयत् ॥ 3.462

किन्तु अन्य विद्वानों का मानना है कि मार्ताण्ड मन्दिर  का निर्माण ललितादित्य ने ही किया था । उपरोक्त श्लोक के आधार पर यही कहा जा सकता है कि राणादित्य ने एक सूर्य मन्दिर का निर्माण किया था जिसका नाम रणपुरस्वामी था जो सिंहरोत्सिका ग्राम में स्थित था । आज सिंहरोत्सिका ग्राम के बारें में कोई जानकरी नहीं है । और इस श्लोक से यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता है कि रणपुरस्वामी मन्दिर और मार्तण्ड मन्दिर एक ही हैं । दूसरी बात यह भी है कि ऐसा सम्भव नहीं है कि राणादित्य जो कि गोनर्द वंश का सबसे प्रतापी राजा था, ने सूर्य मन्दिर बनवाया हो और मुख्य प्रतिमा लगभग 150 वर्षों तक  बिना पार्श्व मन्दिरों के स्थित हो । इन दो आधारों पर यह कहा जा सकता है कि मार्ताण्ड मन्दिर का निर्माण ललितादित्य ने हीं किया था।

मार्ताण्ड मन्दिर, कश्मीर के मन्दिरों में  स्थापत्य-कला की दृष्टि से सबसे उत्कृष्ट मन्दिर है । भारतीय परम्परा में मूर्ति निर्माण के दो उद्देश्य रहे हैं- एक तो किसी स्मृति या अतीत को जीवित बनाये रखना और दूसरा अमूर्त को मूर्त रूप देना या अव्यक्त को व्यक्त करना या किसी मनोभाव को आकार प्रदान करना ।

इस मन्दिर में एक भव्य केन्द्रीय कक्ष है जो इस मन्दिर के मुख्य देवता सूर्य को सपर्पित है । केन्द्रीय मन्दिर की ऊँचाई 75 फीट, लम्बाई 33 फीट, एवं चौडाई 33 फीट है ।

मध्यकालीन मन्दिरों की भाँति ही मार्ताण्ड मन्दिर में भी केन्द्रीय कक्ष (या मुख्य देवता का भवन) के अतिरिक्त एक लम्बा आँगन है जिसकी लम्बाई 220 फीट एवं चौडाई 142 फीट है । इस आँगन में 84 लघु फ्ल्यूटेड स्तम्भ हैं जिनके मुख आँगन में खुलते हैं । 84संख्या निश्चित रूप से भगवान् सूर्य से सम्बन्धित हैं । भगवान् सूर्य के रथ के चक्के में 12 स्पोक्स होते हैं एवं इन 12 स्पोक्स से युक्त पहिए को सात अश्व मिलकर आगे बढाते हैं ।

भगवान् सूर्य की किरण सात रश्मियों से युक्त होती है और 12 राशियाँ होती हैं जिनसे होकर सूर्य अपना मार्ग तय करते हैं । दोनों विधियों से 84की संख्या प्राप्त होती है ।

मार्ताण्ड मन्दिर के केन्द्रीय कक्ष का द्वार पश्चिम दिशा में है । इसका आन्तरिक भाग बडा भव्य है । इस मन्दिर की सीढीयों को चढते हुए हम इसके गर्भगृह में पहुँचते हैं, जहाँ इस मन्दिर के मुख्य देवता सूर्य की मूर्ति रहीं होगी। अपराजितपृच्छा, अंशुमत् भेदागम (काश्यप शिल्प), सुप्रभेदागम आदि शिल्प ग्रन्थों में एवं मत्स्यपुराण, व कालिकापुराण में सूर्य की मूर्ति के लक्षण के विषय में विस्तार से बताया गया है । इन सभी ग्रन्थों में यह बताया गया है कि भगवान् सूर्य के दोनों हाथों में कमलपुष्प रहते हैं । उनका शीर्ष कान्तिमण्डल से युक्त होना चाहिए एवं उनका शरीर विविध प्रकार के आभूषणों से अलंकृत होना चाहिए । भगवान् सूर्य रक्त वर्ण के वस्त्र धारण करते हैं । कानों में माणिक के कुण्डल, वक्षस्थल पर हार एवं यज्ञोपवीत धारण करते हैं । भगवान् सूर्य की प्रतिमा पद्म-पीठ पर स्थित होना चाहिए या रथ पर विराजमान होना चाहिए जिसे सात अश्व मिलकर चलाते हैं । इस रथ में केवल एक ही पहिया होना चाहिए ।

मुख्य देवता सूर्य के पार्श्व में ( बाँई व दाँई तरफ) उनकी पत्नियों की प्रतिमा रही होगी । संज्ञा एवं छाया – ये दो सूर्य की पत्नियाँ हैं । कहीं-कहीं सूर्य की चार पत्नियों का उल्लेख मिलता है । उनके नाम राज्ञी, सुवर्णा, सुवर्चसा, एवं छाया हैं ।  केद्रीय कक्ष के मुख या प्रवेश द्वार पर पर भारतीय परम्परा में स्वीकृत सृष्टि, स्थिति एवं संहार के अधिष्ठाता देवता ब्रह्मा, विष्णु एवं शिव की प्रतिमा को पाते हैं । सम्भवतः भगवान् सूर्य के ही त्रिविध रूप में कल्पना है ।  सूर्य उदयकाल में सृष्टि के अधिष्ठायक ब्रह्मा के रूप में, मध्यान्ह काल में रक्षण के अधिष्ठायक विष्णु के रूप में, एवं अस्तकाल में संहार के अधिष्ठायक शिव के रूप में स्थित हैं । इस मन्दिर में सूर्य के तीनों रूपों में उपासना होती थी ।

केन्द्रीय कक्ष के अन्तराल की बायी दीवार पर स्पष्ट रूप से गंगा (नदी) की प्रतिमा है जो अपने वाहन घडियाल पर आरुढ हैं जो उन्हें देख रहा है । गंगा की प्रतिमा के दायी ओर एक दूती छतरी लिए खडी है और बायी ओर एक दूती चौरी लिए खडी है ।

गंगा की प्रतिमा के ठीक विपरीत दीवार (दायी) पर यमुना की प्रतिमा है जो अपने वाहन कच्छप पर विराजमान है ।

मुख्य देवता सूर्य के अतिरिक्त इस मन्दिर में नवग्रह, नाग, आदि के रोचक आलेखन मिलते हैं । मन्दिर के अन्य भागों पर भी विविध अलंकरण देखने को मिलते हैं । प्रतीकों की जो दीर्घ परम्परा भारतीय धर्म में मिलती है, उसको इस मन्दिर के शिल्पियों ने मूर्त रूप दिया है ।           

निष्कर्षतः यह कहा जा सकता है कि मार्तण्ड मन्दिर भारतीय वास्तुकला की उत्कृष्ट कृतियों में से एक है। प्राकृतिक आपदाओं एवं मुस्लिम शासक हमदान द्वारा नष्ट करने की कोशिश के बावजूद, मार्तण्ड मन्दिर अपने अवशेषों के द्वारा अपनी विराट महत्ता को आज भी द्योतित कर रहा है ।

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