असंवैधानिक अनुच्छेद 35-A में रोड़ा बनते जम्मू-कश्मीर के सियासतदार

22 Dec 2017 15:20:29


ललित कौशिक

अगर किसी देश के किसी नागरिक को अपने अधिकारों को जानना होता है, तो वो अपने देश के संविधान में वर्णित अधिकारों को पढ़कर अपने और देश के मूल अधिकारों को जानेगा। उसको देश की सारी विधायिका और कार्यपालिका के कार्यों की भी जानकारी भी वहीं से  मिलेगी।

भारत के संविधान के साथ भी कुछ ऐसा ही है, वहा भी किसी को अगर अपने अधिकारों की जानकारी लेनी है तो वो अपने संविधान का अध्ययन करेगा।

भारत का संविधान 26 जनवरी 1950 को लागू किया गया। समय-समय पर भारत सरकार अपने हिसाब से राष्ट्रहित के लिए संविधान में संशोधन करती रहती है। भारत में संविधान में संशोधन के लिए भारतीय संविधान के अनुच्छेद-368 में प्रावधान है। जैसा हाल ही में जीएसटी को लागू किया गया। संविधान में संशोधन या नए अनुच्छेदों को जोड़ने के लिए संविधान की एक रीती-निति होती है कि किसी भी अनुच्छेद को संविधान में जोड़ने से पहले उस अनुच्छेद को दोनों सदन लोकसभा या राज्यसभा में रखना होता है।

लोकसभा या राज्यसभा में उस अनुच्छेद की एवज में जो बिल आता है। सत्ता पक्ष  या विपक्ष के पास बिल को पास करने का समर्थन हो तो लोकसभा से पास होकर वो बिल राज्यसभा के पास जाता है।

राज्यसभा में लोकसभा की तरह बिल को पास करने के लिए समर्थन चाहिए होता है। किसी कारण अगर लोकसभा या राज्यसभा में सत्तापक्ष या विपक्ष के पास समर्थन न हो तो बिल अटक भी जाता है। राज्यसभा बिल को पास करके राष्ट्रपति के पास भेजती है। राष्ट्रपति के हस्ताक्षर के बाद तब जाकर वो बिल संविधान में लागू किया जाता है। इतनी सारी प्रक्रियाओं में गुजरकर बिल को संविधान में अनुच्छेद के रुप में मान्यता मिलती है।

लेकिन यदि आज जम्मू कश्मीर में लागू एक अनुच्छेद 35A  के विषय में पड़ेगे तो आप हैरान रह जाएगें। जम्मू कश्मीर में 1954 में एक असवैंधानिक अनुच्छेद 35-A को जोड़ा गया। इस अनुच्छेद को असवैंधानिक इसलिए कहा गया। क्योकि यह अनुच्छेद कभी संसद  के समक्ष नहीं रखा गया भारत के प्रथम राष्ट्रपति राजेन्द्र प्रसाद ने प्रथम प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरु के कहने पर 1954 जम्मू कश्मीर के लिए अनुच्छेद जोडा गया जिसे 35-A नाम दिया गया।

संविधान में कोई भी अनुच्छेद जोड़ा जाता है तो उसकी एक प्रक्रिया होती है लेकिन अनुच्छेद 35-A के साथ ऐसा कुछ भी नही किया गया और उसको संविधान के मूल प्रावधानों से भी दूर रखा गया।

कोई भी कानून जब देश के सामनें रखा जाता है तो उसकी शक्ति 6 सप्ताह के लिए होती है अगर इस समय सीमा के अंदर अनुच्छेद को संसद के सदन में नही रखा जाता है तो इस अवधि को बाद उसकी शक्तियां स्वंय ही समाप्त हो जाती है।

असंवैधानिक अनुच्छेद 35-A 63 सालों के बाद भी जम्मू कश्मीर की बेटियों, सफाई कर्मचारियों और रिफ्यूजी हिंदुओं के साथ आजतक भी अन्याय करता आ रहा है। इसी अनुच्छेद ने जम्मू कश्मीर की विधानसभा को शक्ति दी है कि वहा का मूल निवासी कौन होगा और पीआरसी किसे दिया जाएगा किसे नही यह तय करता है। इसी अनुच्छेद 35-A का फायदा जम्मू कश्मीर की विधानसभआ पिछलें 63 सालों से उठा रही है। आज जब इस असंवैधानिक अनुच्छेद 35-A पर सुप्रीमकोर्ट में सुनवाई शुरु हुई है तो उनके बीच में रोड़ा अटकाने का काम जम्मू-कश्मीर के पक्ष और विपक्ष के नेताओं ने शुरु कर दिया है।

 

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