जम्मू-कश्मीर में शिक्षा का इतिहास 12वीं शताब्दी से महाराजा हरी सिंह तक

25 Dec 2017 13:32:54

 


देवेश खंडेलवाल

एक यूरोपियन कहावत है कि किसी राष्ट्र पर तलवार के दम पर विजय प्राप्त की जा सकती है लेकिन साम्राज्य की स्थापना के लिए बुद्धिमत्ता की जरूरत होती हैं। मध्यकालीन इतिहास में मंगोल योद्धाओं ने अपने साम्राज्य का विस्तार मध्य एशिया से निकलकर पूर्वी यूरोप से जापान सागर तक कर लिया था। इसमें उत्तर में साइबेरिया, पूर्व एवं दक्षिण में इंडो-चायना प्रायद्वीप और ईरान का पठार शामिल था। धरती के लगभग एक चौथाई हिस्से पर राज करने वाले इन मंगोल योद्धाओं के सलाहकार भारत की कश्मीर घाटी के मनीषी थे। चंगेज खान की तीसरी पीढ़ी के सम्राट गुयुक खान के दरबार में कश्मीर के पंडितों को सम्राट के खास सलाहकारों के रूप में स्थान मिला था। कुबलाई खान ने भी कश्मीर के पंडितों को अपनी राजधानी में सम्मान और सत्कार के साथ स्थान दिया था। इनमे से एक तिब्बती मूल के आध्यात्मिक विद्वान शाक्य पंडित शामिल थे। उन्हें पण्डित की उपाधि उनकी संस्कृत में विद्वत्तापूर्ण उपलब्धियों और ज्ञान के कारण मिली थी।

इस वक्त तक भारत में विदेशी आक्रमणों की संख्या में इजाफा होने लगा था। अधिकतर आक्रमण जम्मू-कश्मीर की तरफ से भारत में हुए। इन लगातार हो रहे आक्रमणों के चलते भारत की राजनैतिक सत्ता कमजोर हुई और कई शताब्दियों के प्रयत्न के बाद अफगान आक्रान्ताओं का जम्मू-कश्मीर में शासन हो गया। इस दौर को राज्य के बुरे दिनों की शुरुआत कहा जा सकता है। इन अफगानी शासकों ने क्रूरता की हद्द पार दी। सम्पूर्ण राज्य में हिन्दू ब्राहमणों का जबरन धर्म परिवर्तन करवाया गया। शारदा लिपि कृत संस्कृत की जगह अन्य विदेशी भाषाओ को प्राथमिकता दी। इस विपत्ति में एक संतोष की बात भी थी। यह शासक इतने हिंसात्मक थे कि ये आपस में भी लड़ते रहे अथवा गृह युद्ध में व्यस्त रहे। इसका फायदा उठाकर महाराजा रणजीत सिंह ने फिर से जम्मू-कश्मीर को स्वतंत्र कराया।   

उधर देश के सबसे पूर्वी हिस्से में ब्रिटिश राज स्थापित हो गया था। उन्होंने अपनी राजधानी कलकत्ता बनाई। वहां से विस्तार के लिए उन्होंने तलवार के साथ-साथ भारत की सांस्कृतिक और आध्यात्मिक एकता पर चोट मरना शुरू किया। साल 1836 में एक ब्रिटिश अधिकारी, थॉमस बैबिंग्टन मैकॉले ने अपने पिता को भारत से एक पत्र भेजा। उन्होंने लिखा कि हमारे द्वारा स्थापित अंग्रेजी के विद्यालय सफल हो रहे हैं। अतः मुझे विश्वास है कि जिस भी किसी हिन्दू ने यहां से शिक्षा प्राप्त की वह अपने धर्म से कभी ईमानदारी नही कर पायेगा। उसका यह प्रयोग, वास्तव में, सफल रहा। जल्दी ही इस शिक्षा पद्धति ने सम्पूर्ण भारत को जकड़ लिया। यह भारत की आत्मा को सीधा धक्का था। देखा जाए तो वर्तमान में भी हम जबरन थोपी गयी इस समस्या से उबर नही पाए हैं।

भारत में ब्रिटिश सरकार का एकमात्र कार्य स्थानीय नागरिकों का किसी भी हद्द तक जाकर शोषण करना था। उनकी मनमानी नीतियों ने सम्पूर्ण देश की शिक्षा परम्पराओं और व्यवस्थाओं को तहस-नहस कर दिया था। इससे एक अन्य प्रकार की समस्या पैदा हो गयी। मध्यकाल तक के इतिहास से पता चलता है कि हमेशा से भारत में शिक्षा प्रत्येक वर्ग को सुगमता से उपलब्ध थी। तक्षशिला, नालंदा और विक्रमशिला जैसे विश्वविद्यालयों ने विश्वभर में अपनी पहचान और श्रेष्ठता बनाई। लेकिन आधुनिक काल में ब्रिटिश सरकार ने इस व्यवस्था में ढांचागत परिवर्तन कर दिया। यह मात्र उन्होंने भारत में अपने अस्तित्व को बचाए रखने के लिए जानबूझकर किया।

ब्रिटिश सरकार ने शिक्षा को एक खास वर्ग के लिए निश्चित कर दिया। दूसरी ओर संसाधनों के एकतरफा दोहन ने गरीबी को समाज का पर्याय बना दिया। अब स्थिति यह थी कि एक सामान्य नागरिक के लिए शिक्षा प्राप्त करना उसकी सोच तक से बाहर हो गया। ब्रिटिश शिक्षा का स्वरुप ऐसा था कि अगर वह जैसे-तैसे प्रयास भी करता तो भारतीयता उसके चरित्र से निकल जाती थी। इस कुटिल नीति का गहरा असर जम्मू-कश्मीर पर भी हुआ।

साल 1846 में हिन्दू डोगरा, महाराजा गुलाब सिंह ने जम्मू-कश्मीर की बागडोर अपने हाथों में ली। उन्होंने और इनके वंशजों ने इस पाश्चात्य शिक्षा व्यवस्था को ख़त्म करके पुनः भारत की महान परंपरा को स्थापित करने की कोशिश की। इनमे प्रमुख नाम आता है महाराजा हरी सिंह का। महाराजा हरि सिंह 1925 में गद्दी पर बैठे और सर्वप्रथम अशिक्षा के खिलाफ अभियान चलाना शुरू किया। उन्होंने प्राथमिक और उच्च विद्यालयो की स्थापना की और छात्रवृति एवं शोध कार्यों को बढ़ावा दिया।

उन्होंने इन सब कार्यों के लिए राज्य के सरकारी बजट की राशि 100 प्रतिशत तक बढ़ा दी। महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि उन्होंने धर्म, जाति और नस्ल में कोई भेद नही किया। शेख अब्दुल्ला जिसने राज्य में साम्प्रदायिकता और धार्मिक उन्माद फैलाया, उसे अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय ने उच्च शिक्षा के लिए  42.8 रुपए प्रतिमाह की स्नातकोत्तर छात्रवृति प्रदान की थी। मार्च 1929 में शेख ने वहां से एम.एस.सी. की पढ़ाई के लिए दाखिल लिया था। उन्होंने शिक्षा को सबके लिए सुगम बनाया था।

 न्याय को अपना धर्म मानने वाले महाराजा हरि सिंह ने महिलाओं में शिक्षा के प्रति जागरूकता लाने में विशेष योगदान दिया। 1916 तक महिलाओं की शिक्षा पर मात्र 25,000 रुपए खर्च किया जाता था लेकिन 1931 में यह अनुदान 4,81,000 तक कर दिया गया। वही कुल शिक्षा के लिए 1931 के बजट में 19,49,000 की राशि आवंटित की गई थी। राज्य के खर्चे पर प्राथमिक शिक्षा सभी विद्यार्थियों के लिए मुफ्त थी। साल 1931 तक श्रीनगर, सोपोर, जम्मू, बारामुला, मीरपुर और उधमपुर में 7,000 से ज्यादा विद्यार्थी इस व्यवस्था का लाभ ले रहे थे और उनमें अधिकतर संख्या मुसलमान छात्रों की थी। ऐसा एक भी साल नही गया जब किसी जगह नए विद्यालय और महाविद्यालय न खोले गए हो।

यही नही महाराजा हरी सिंह ने शैक्षिक सम्मेलन की शुरुआत की थी। जहां राज्य के लगभग हर क्षेत्र से शिक्षक और सरकार की तरफ से अधिकारी एवं मंत्री शामिल होते थे। विचार-विमर्श की भारतीय परंपरा के अनुसार इन सम्मेलनों में तय किया जाता था कि राज्य में शिक्षा की बेहतरी किस प्रकार सुनिश्चित की जा सकती है। साथ ही यह सभाएं चर्चा करती थी कि शैक्षणिक बुनियादी जरूरतों का विकास किस प्रकार संभव होगा। ऐसा ही एक द्वि-दिवसीय सम्मेलन 1930 में बुलाया गया था। दुर्भाग्यपूर्ण महाराजा हरी सिंह के बाद शेख अब्दुल्ला को 1947 में राज्य का आपातकालीन प्रशासक नियुक्त किया गया। आखिरकार, राज्य में फिर से साम्यवादियों और ब्रिटिश सरकार के सहयोग से शिक्षा का स्तर गिरा दिया गया।   

 

 

 

 

 

 

JKN Twitter