एक देश में दो विधान, दो निशान, दो प्रधान- नहीं चलेंगे, नहीं चलेंगे” इस वैचारिक उद्घोष को लेकर डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने अपना बलिदान दिया। इस विचारों में जो गौरवपूर्ण भाव है वो भाव आखिर में क्या है?

26 Dec 2017 16:46:06

संवाद भाग – 3

 


 

मुकेश कुमार सिंह

प्रश्न – “एक देश में दो विधान, दो निशान, दो प्रधान- नहीं चलेंगे, नहीं चलेंगे” इस वैचारिक उद्घोष को लेकर डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने अपना बलिदान दिया। इस विचारों में जो गौरवपूर्ण भाव है वो भाव आखिर में क्या है?

 

उत्तर - आज भारत को स्वतंत्र हुए 70 वर्ष हो चुके है। लेकिन यह उद्घोष भारत के स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात हुए पहले राष्ट्रवादी आंदोलन का था। जो भारत की स्वतंत्रता के मात्र 3-4 वर्ष के पश्चात दिया गया था। जिसके परिणामस्वरूप संपूर्ण भारत पुनः एक होकर सड़कों पर उतर आया था। अगर वास्तविकता में इसका भाव समझना है तो हम सभी को संविधान निर्माताओं की भारत की संकल्पना को समझना पड़ेगा, और इसके साथ में भारत के सामरिक रूप से सबसे महत्वपूर्ण राज्य के तत्कालीक समय के घटनाक्रम को भी समझना पड़ेगा। भारत को 15 अगस्त 1947 को अंग्रेजों से स्वतंत्रता मिली। स्वतंत्रता के कुछ समय पूर्व ही देश के लिए संविधान निर्माण की प्रक्रिया प्रारम्भ हो चुकी थी। संविधान निर्माण की प्रक्रिया में देश के कोने-कोने से आये अपने-अपने क्षेत्र के विशेषज्ञों ने भाग लिया। संविधान निर्माताओं ने संविधान निर्माण में दो बातों का विशेष ध्यान रखा। पहला देश में एकमेव का भाव बना रहे और दूसरा देश के कुछ वर्ग जैसे महिलाएं, अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति एवं अन्य पिछड़े वर्गो के हितों के संरक्षण के लिए व्यवस्थाएं बनायी थी। इसीलिए राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, राज्यों में मुख्यमंत्री, राज्यपाल, एक चुनाव आयोग, उच्चतम न्यायालय और राष्ट्र ध्वज जैसे विषयों के साथ देश के नागरिकों के मूल अधिकार, राज्य के नीति-निर्देशक सिद्धान्तों के साथ महिलाएं, अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति एवं अन्य पिछड़ें वर्गो के सशक्तिकरण हेतु अनेक प्रावधानों की व्यवस्था की गयी थी। लेकिन जम्मू कश्मीर में जवाहरलाल नेहरू और शेख अब्दुल्ला ने संविधान निर्माताओं की भारत की संकल्पना को छिन्न-भिन्न करते हुए एक राजनीतिक सहमति बनाई जिसे “दिल्ली करार” का नाम दिया गया। यहां यह समझना अनिवार्य है कि “दिल्ली करार” केवल मात्र एक राजनीतिक सहमति थी जिसका कोई वैधानिक आधार नहीं है। जवाहरलाल नेहरू और शेख अब्दुल्ला की इस राजनीतिक सहमति का संसद के अंदर और बाहर दोनों जगह जबरदस्त विरोध हुआ। 1953 में जनसंघ के प्रथम अधिवेशन में डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने देश को जम्मू कश्मीर के बारे में एक उद्घोष दिया “एक देश में दो विधान, दो निशान, दो प्रधान- नहीं चलेंगे नहीं चलेंगे”। पूरे देश में इस उद्धघोष को व्यापक जन समर्थन प्राप्त हुआ। इसी कड़ी में यह निर्णय लिया गया कि देशभर के कार्यकर्ता जम्मू कश्मीर में जाकर गिरफ्तारी देंगे। इसी आंदोलन में मुखर्जी जी जम्मू कश्मीर आए, उनकी गिरफ्तारी हुई और बाद में रहस्यमयी परिस्थितियों में उनकी मृत्यु भी हुई। उनका बलिदान संवैधानिक मूल्यों के लिए बलिदान था। हालांकि यह बलिदान व्यर्थ नहीं गया। जम्मू कश्मीर से परमिट सिस्टम हटा दिया गया और राज्य में तिरंगा ससम्मान फहराया जाने लगा। उच्चतम न्यायालय, चुनाव आयोग और महालेखाकार के अधिकार क्षेत्र का विस्तार जम्मू कश्मीर तक कर दिया गया। जम्मू कश्मीर के राज्यपाल को सदर-ए-रियासत न कहकर राज्यपाल और मुख्यमंत्री को प्रधानमंत्री न कहकर अन्य राज्यों की तरह मुख्यमंत्री कहा जाने लगा। इस प्रकार देश में दो निशान और दो प्रधान की कुप्रथा तो समाप्त हो गयी। किन्तु आज भी जम्मू कश्मीर में अनेक संवैधानिक विसंगतियां है जिनका निराकरण अति आवश्यक है। जम्मू कश्मीर में आज भी, अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति एवं अन्य पिछड़ें वर्गो और महिलाओं के साथ अलग विधान के नाम पर अत्याचार हो रहे है। डॉ. मुखर्जी जी के द्वारा दिये गये उद्घोष से उनके व्यक्तित्व की गहराई और समझ का पता चलता है। 65 वर्ष पश्चात भी डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी के द्वारा उठाये गये विषय आज भी अत्यधिक प्रासंगिक है। उनके उद्घोष का आशय स्पष्ट था कि एक देश में दो व्यवस्थाएं नहीं चल सकती। देश के अनुसूचित जाति के लोगों के साथ उत्तर प्रदेश में अलग और जम्मू कश्मीर में अलग व्यवहार नहीं किया जा सकता। जहां आज देश के किसी दूसरे राज्य में सफाई कर्मचारी के घर में पैदा होकर एक बच्चा बड़ा होकर अपनी योग्यता और मेहनत के बल से डॉक्टर और इंजीनियर बन सकता है। लेकिन जम्मू कश्मीर में एक ऐसा सफाई कर्मचारी वर्ग रहता है जिसके लिए लिखित नियम बना दिया गया है कि एक सफाईकर्मी का बेटा केवल सफाईकर्मी ही बना रह सकता है। जिस दिन हम अनुसूचित जाति के साथ-साथ महिलाओं, अनुसूचित जनजाति समाज एवं ओबीसी जैसे वर्गो के साथ जम्मू कश्मीर में हो रहे अन्याय से मुक्ति पा लेंगे उस दिन यह देश डॉ. श्याम प्रसाद मुखर्जी जी के द्वारा किये गये आह्वान की संपूर्ति मान पायेगा।

 

 

प्रश्न - जम्मू कश्मीर में पिछले सत्तर सालों से जो भयावह स्थिति है, वह किस कारण है?

 

उत्तर - जम्मू कश्मीर लम्बें समय से दुष्प्रचार का शिकार रहा है। भारत 1947 को स्वतंत्र हुआ और तब से लेकर आज तक विभाजनकारी तत्वों ने तथ्यों का इतना विकृतीकरण किया है कि आज 70 वर्ष के पश्चात् जम्मू कश्मीर को लेकर अनेक प्रकार के भ्रम और आशंकाएं उत्पन्न हो गयी। आज जम्मू कश्मीर में जितनी भी समस्याएं है, उनके मूल में केवल जम्मू कश्मीर में जानकारी का विकृतीकरण और शेष भारत में जानकारी का अभाव है।

उदाहरण के तौर पर यदि आज भारत के किसी भी हिस्से में जम्मू कश्मीर की बात की जाए तो लोगों के मन जो पहली धारणा बनती है वह अलगाववाद और आतंकवाद है। जबकि यह सत्य एवं तथ्य नहीं है। जम्मू कश्मीर का पूरा क्षेत्रफल 2,22,000 वर्ग किमी है उसमें से लगभग 1,21,000  वर्ग किमी आज  पाकिस्तान और चीन के कब्जे में है, जिसको पाक अधिक्रांत जम्मू कश्मीर (POJK) एवं चीन अधिक्रांत जम्मू कश्मीर (COJK) के नाम से जाना जाता है। वर्तमान में भारत के पास 1,00000 वर्ग  किमी है। वर्तमान समय में जम्मू कश्मीर का सबसे बड़ा क्षेत्र है। वह है लद्दाख इसका क्षेत्रफल 59,000 वर्ग किमी है इस पूरे क्षेत्र में कहीं पर भी अलगाववाद या आतंकवाद का नामोनिशान नहीं है। दूसरा सबसे बड़ा क्षेत्र जम्मू है। इसका क्षेत्रफल लगभग 26,000  वर्ग किमी है इसमें 10 जिले आते है, इस पूरे क्षेत्र में कहीं पर भी आतंकवाद या अलगाववाद का समर्थन नहीं है। तीसरा जम्मू कश्मीर का सबसे छोटा क्षेत्र कश्मीर है उसे भी तीन भागों में बांट सकते है, श्रीनगर या  झेलम घाटी, लोलाब घाटी और गुरेज घाटी। इसमें से केवल मात्र श्रीनगर / झेलम घाटी के 5  जिले ही ऐसे है जहां पर आतंकवाद या अलगाववादी तत्व मौजूद है।

जिस प्रकार शेष भारत में जानकारी और सूचना के अभाव के चलते जम्मू कश्मीर को लेकर अनेक भ्रम पैदा होते है। ठीक उसी प्रकार जम्मू कश्मीर के अंदर जानकारी और सूचना का विकृतीकरण कर अनेक भ्रम उत्पन किये गये है। एक उदाहरण के माध्यम से समझिये कि जम्मू कश्मीर में आजादी के बाद से लेकर आज तक वहां के अधिमिलन पत्र को लेकर अनेक भ्रम उत्पन करने की कोशिश की गयी है। जम्मू कश्मीर में निरंतर एक भ्रम पैदा करने की कोशिश की गयी कि 1947 में जो भारत का विभाजन हुआ उसका आधार धार्मिक था। मुस्लिम बहुल क्षेत्र को भारत से काटकर पाकिस्तान बनाया गया जो कि एक ऐतिहासिक और वैधानिक रूप से गलत अवधारणा है। भारत का विभाजन कभी धार्मिक आधार पर नहीं हुआ। यदि धर्म के आधार पर विभाजन हुआ तो वह मात्र ब्रिटिश इंडिया का हुआ था। ब्रिटिश इंडिया वह क्षेत्र था जिस पर अंग्रेज सीधे-सीधे शासन करते थे। इस ब्रिटिश इंडिया में से मुस्लिम बहुल क्षेत्र काटकर पाकिस्तान का निर्माण किया गया था। शेष भारत जिसे देसी रियासतें या राज्य कहा जाता था। वहां पर यह अधिकार एकमात्र राजा के पास था कि वह अपने राज्य को किस देश के साथ विलय करना चाहता था। 26 अक्टूबर 1947 को जम्मू कश्मीर के महाराजा हरि सिंह ने अधिमिलन पत्र पर हस्ताक्षर कर जम्मू कश्मीर को भारत का वैधानिक रुप से अंग बना दिया था। जम्मू कश्मीर में यह निरंतर प्रचार किया जाता है कि जम्मू कश्मीर मुस्लिम बहुल होने के कारण पाकिस्तान में जाना चाहिए था। यहां पर बहुत आसानी के साथ यह तथ्य भुला दिया जाता है कि जम्मू कश्मीर ब्रिटिश भारत का अंग न होकर एक देशी रियासत थी। जिसके भविष्य का निर्णय करना केवल और केवल वहां के महाराजा के हाथ में था। इस झूठे प्रचार के चलते आज जम्मू कश्मीर में हमें अनेक समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है। जम्मू कश्मीर भारत डोमिनियन का हिस्सा बनेगा या पाकिस्तान डोमिनियन का इसमें धर्म का कोई रोल नहीं था, यह विशेषाधिकार केवल महाराजा के पास था। इस झूठे प्रचार का प्रयोग स्वतंत्रता के पहले और स्वतंत्रता के बाद भी कुछ समय तक सम्राज्यवादी ताकतों ने किया। इस समय पाकिस्तान की आड़ में इस्लामिक कट्टरवाद कर रहा है।

 

 

 

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