शताब्दियों की आस्था का प्रतीक है कश्मीर का भद्रकाली मन्दिर

31 Dec 2017 22:58:28


डा. मयंक शेखर

कश्मीर के कुपवाडा जिले के हंदवाड़ा तहसील में देवदार वृक्षों से घिरे उँचे स्थान पर माता भद्रकाली का मन्दिर स्थित है । माता भद्रकाली, जम्मू-कश्मीर के लोगों की कुल देवी हैं । मन्दिर परिसर में रह रहे लोगों ने बताया कि यहाँ एक अति प्राचीन मूर्ति थी जो आतंकवादियों के हमले में तीन खण्डों में टूट गयी जिसका साक्ष्य स्पष्ट रूप से यहाँ देखा जा सकता है । वर्ष 2004 में इस मन्दिर का पुनर्निर्माण किया गया । पास में ही एक देवदार का वृक्ष है जो मन्दिर के पुनर्निर्माण में बाधा बन रहा था । अतः उसे काटना जरूरी था । जब उसे काटना शुरु किया गया तो एक आश्चर्यजनक दैवी घटना घटी । उस वृक्ष से रक्त की धारा निकलने लगी । तब से लोगों ने उस वृक्ष को माता भद्रकाली का ही रूप मानकर उसकी उपासना करने लगे । प्रत्येक माह में लगभग 40-50 व्यक्ति इस मन्दिर का दर्शन करने आते हैं ।

माता भद्रकाली के पूजन का स्पष्ट उल्लेख “नीलमत पुराण” में मिलता है । उसके अनुसार, चैत्र शुक्ल की नवमी तिथि को भद्रकाली की पूजा करने पर व्यक्ति के सारे मनोरथ पूर्ण होते हैं।

तामेव नवमीं प्राप्य सोपवासो नरः शुचि ।

संपूजयेद्भद्रकालीं पुष्पधूपान्नसंपदा ॥ 772॥ नीलमत पुराण

सर्वा वा नवमी पूज्या भद्रकालीश्वरीश्वरी ।

कार्यसिद्धिमवाप्नोति तस्यां पूजयिता नरः ॥773॥ नीलमत पुराण

 

आज भी मन्दिर में इस दिन माता भद्रकाली की पूजा-अर्चना व्यापक स्तर पर होती है । माता भद्रकाली की पूजा की ऐतिहासिकता का वर्णन नीलमत पुराण में मिलता है जो इस प्रकार है:

चारो युगों की समाप्ति होने पर, कश्मीर घाटी को छोडकर सभी मनुष्य जा चुके थे । केवल एक वृद्ध ब्राह्मण जिसका नाम चन्द्रदेव था, वह घाटी नहीं छोड पाया था । घाटी में रहने वाले पैशाच उस चन्द्रदेव को विभिन्न प्रकार से कष्ट देने लगे । अन्त में चन्द्रदेव, नागों के राजा नील के शरण में पहुचँ गया । चन्द्रदेव राजा नील के पास ही लगभग छह महीने रहा । घाटी को पैशाचों से एवं अत्यधिक ठंड से मुक्त करने हेतु राजा नील ने उस वृद्ध ब्राह्मण को विभिन्न प्रकार की पूजा-पद्धतियाँ बतायी । छह माह के बीत जाने पर जब पुनः लोग कश्मीर घाटी में आने लगे तब उनके राजा वीर्योदय की मुलाकात चन्द्रदेव से हुई । चन्द्रदेव ने सारा वृत्तान्त उन्हें बताया एवं राजा नील द्वारा बतायी गयी सारी पूजा-पद्धतियों को भी सुनाया । तब सारे लोग राजा नील द्वारा बतायी गयी पूजा-विधियों का पालन करने लगे । परिणामस्वरूप, कश्मीर घाटी अत्यधिक ठंड एवं पैशाचों से मुक्त हो गई । राजा नील ने चन्द्रदेव ब्राह्मण को विभिन्न प्रकार की पूजा-अर्चना बतायी थी । राजा नील ने ऋद्धि, वृद्धि, निद्रा, धनेश, नलकूवर, शंख, पद्म, भद्रकाली, एवं सरस्वती की पूजा करने को कहा था ।

ऋद्धिर्वृद्धिस्तथा निद्रा धनेशो नलकूवरः ।

 शंखपद्मनिधी पूज्यौ भद्रकाली सरस्वती ॥706॥ नीलमत पुराण

तब से कश्मीर में माता भद्रकाली की पूजा होती चली आ रही है । काश्मीर शैवदर्शन में काली के द्वादश रूप का बहुत महत्त्व है । द्वादश काली के नाम इस प्रकार हैं: सृष्टि काली, रक्त काली, स्थिति नाश काली, यम काली, संहार काली, मृत्यु काली, भद्र काली, मार्तण्ड काली, परमार्क काली, कलाग्नि-रुद्र काली, महाकाल काली, महाभैरव चण्डोग्रकाली । “श्रीक्रमसद्भाव भट्टारक” आगम में भद्रकाली को रुद्रकाली के नाम से व्यपदिष्ट किया गया है । श्रीपञ्चशतिक आगम में इसे भद्रकाली कहा गया है । नाम में भेद है, काम में या वस्तु सद्भाव में कोई अन्तर नहीं है ।


श्रीपञ्चशतिक आगम में रुद्रकाली को ही भद्रकाली कहा गया है । श्रीपञ्चशतिक आगम में भद्रकाली के विषय में कहा गया है कि जो अपने स्वातन्त्र्य के कारण उन्मेष (सृजन) एवं निमेष (विसर्जन) रूपी गम (संहार) और आगम (सृष्टि) को सम्पन्न करती है, तथा जो शुद्ध ज्ञान में दृष्टिगोचर होती है, मायारहित है, विज्ञान-रूपी अमृतकला का वर्षण करती है, सभी लोकों का कल्याण करने वाली है, अपने अलौकिक स्वरूप में समावेश करती है, उसे ही रुद्रकाली कहते हैं। भेद का द्रावण (अन्त) करके समरसता का सृजन करती है, कल्याणकारी है । अतः उसे भद्रकाली भी कहते हैं ।

गमागमसुगम्यस्था महाबोधावलोकिनी ।

  मायामलविनिर्मुक्ता विज्ञानामृतनन्दिनी ॥

सर्वलोकस्य कल्याणी रुद्रा रुद्रसुखप्रदा ।

 यत्रैव शाम्यति कला रुद्रकाली सा स्मृता ।

  भेदस्य द्रावणाद्भद्रा भद्रसिद्धिकरोति या ॥

 तन्त्रालोक विवेक, 4.158

“भेदस्य द्रावणात् भद्रा” अर्थात् प्रमाण-प्रमेय वस्तुजगत् का भेदन करके यथार्थ स्वरूप का दर्शन कराती है, अतः भद्रा है । ऐसी शक्ति से युक्त होने के कारण उसे भद्रकाली कहते हैं ।    

श्रीक्रमस्तोत्र में भद्रकाली की स्तुति करते हुए कहा गया है कि जो अनन्त अपार शक्तियों से युक्त होकर एवं सृष्टिकल्प के अवसान के समान या विनाश के समान स्वरूप धारण करके, इस प्रमाणा-प्रमेय रूपी विश्व की संहारावस्था की भयंकर बेला में भयभीत करने वाली अपनी भृकुटियों को नचाती है । अपनी भयंकर प्रज्वलित रश्मियों से इस प्रमाण-प्रमेय रूपी विश्व के संस्कार को अपने स्वरूप से अन्त कर देती है, उस भद्रकाली को प्रणाम है ।

आचार्य अभिनवगुप्त अपने “तन्त्रालोक” के चतुर्थ आह्निक में काली के स्वरूप की विशद् चर्चा करते हैं । आचार्य अभिनवगुप्त कलन के पाँच अर्थ करते हैं- क्षेप, ज्ञान, प्राप्ति, संख्यान, एवं नाद । उनका मानना है कि ये अर्थ कलन की पाँच विधाओं के प्रतीक हैं एवं इस पञ्चविध कलन-व्यापार के कारण ही परम शक्ति को देवी, काली या कालसंकर्षिणी कहते हैं । काली शब्द कल् धातु से बनता है । कल् धातु पाँच अर्थो में प्रयुक्त होता है:

  • कल् क्षेपे

क्षेप अर्थात् फेकना के अर्थ में कल् धातु से काली शब्द निष्पन्न होता है । स्वात्म का बाह्य उल्लास ही क्षेप है । जो अपने ही स्वरूप में स्थित प्रमाता, प्रमाण और प्रमेय रूप जगत् को, अपने स्वरूप से बाहर अर्थात् भिन्नरूप में दिखाती है, वह काली है ।

  • कल् गतौ (ज्ञानौ)

ज्ञान अर्थ में भी कल् धातु से काली शब्द बनता है । इस अर्थ में काली के अर्थ को बताते हुए कहते हैं। अपने स्वरूप से भिन्न देखने में आये जगत् को भी जो अपनी ही अनर्गला स्वातन्त्र्य शक्ति से पुनः स्वरूपमय ही परामर्श करती है, वह काली है ।

  • कल् गतौ (प्राप्तौ च)

प्राप्ति अर्थ में कल् धातु से निष्पन्न काली शब्द का अर्थ है: जो स्वात्मदर्पण में स्थित जगत् के भिन्न होने पर भी उस जगत् को अभिन्न अर्थात् स्वात्मरूपतया संस्थापित करती है, वही कालसंकर्षिणी संविद् भगवती काली है ।

  • कल् संख्याने

कल् धातु का चौथा अर्थ संख्यान अर्थात् विकल्प करने के रूप में ग्रहण किया जाता है ।

  • कल् शब्दे

कल् धातु का एक अर्थ नाद करना भी है । इस अर्थ में काली का अर्थ इस प्रकार है: जो अप्रतिहता पराभगवती निर्विकल्प तथा सविकल्प समग्र ज्ञान का परामर्श पञ्चकृत्य (सृष्टि-स्थिति-संहार-पिधान-अनुग्रह) के रूप में करती है, पश्चात् उस संपूर्ण ज्ञान को अपनी ही स्वरूप-परामर्शात्मिका तुरीयसत्ता में लीन कर लेती है, वह काली है ।

इसप्रकार हम देखते हैं कि माता भद्रकाली का कश्मीर के लोकजीवन में महत्त्वपूर्ण स्थान है । प्राचीन काल से ही माता भद्रकाली की पूजा-अर्चना व्यापक स्तर पर होती चली आ रही है। ९० के दशक में आतंकियों ने माता भद्रकाली की पूजा-अर्चना में व्यवधान डालने का पूरा प्रयास किया, किन्तु कश्मीर के लोगों की श्रद्धा-आस्था के सामने इनकी एक न चली । आज भी इस मन्दिर में हिन्दू श्रद्धालुओं द्वारा अर्पित घण्टों की ध्वनि पूरे क्षेत्र को दिव्यता प्रदान कर रही है । अभी कुछ दिनों पहले ही इस मन्दिर में बडे स्तर पर पूजा-अर्चन का आयोजन सम्पन्न हुआ है ।

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