क्या “कश्मीर समस्या” वास्तव में कोई समस्या है ? संवाद भाग - 2

06 Dec 2017 13:08:46

 

  

वास्तविक नियत्रण पर स्थित देमचोक गाँव के निवासी भारतीय झंडे के साथ चीन की सेना को उत्तर देते हुये 

     

मुकेश कुमार सिंह

 संवाद भाग - 2

प्रश्न - क्या “कश्मीर समस्या” वास्तव में कोई समस्या है ?  

उत्तर - अगर हम विषयों का सही से अध्ययन करें तो यह ध्यान आता है कि “कश्मीर समस्या” या “जम्मू कश्मीर समस्या” जैसी कोई अवधारणा विश्व में है ही नहीं । जम्मू कश्मीर में समस्याएं हो सकती है, जम्मू कश्मीर कोई समस्या नहीं है । आज देश का छत्तीसगढ़ राज्य नक्सलवाद से प्रभावित है तो हम सब इसे नक्सलवाद की समस्या कहते हैं न कि छत्तीसगढ़ समस्या । जब हम जम्मू कश्मीर राज्य में चल रही समस्याओं को कश्मीर समस्या के रूप में परिभाषित करते है तो लगता है जैसे संपूर्ण राज्य भारत के खिलाफ है, जो कि तथ्यात्मक रूप से गलत है । जम्मू के क्षेत्र में रहने वाला डोगरा, गुज्जर एवं पहाड़ी, लद्दाख में रहने वाला बुद्धिस्ट, शिना, बलती या पुरिग, कश्मीर में रहने वाला शिया, पहाड़ी और गुज्जर पूरी तरह से भारत के पक्ष में खड़ा है तो सम्पूर्ण राज्य को समस्याग्रस्त बताना तर्कसंगत नहीं है।

जहां तक समस्याओं का प्रश्न है तो जम्मू कश्मीर में अलगाववाद एक समस्या है । जम्मू कश्मीर में आतंकवाद एक समस्या है, इतिहास का विकृतीकरण एक समस्या है और कट्टर इस्लामिक एजेंडा एक समस्या है । यह समस्याएं वर्तमान में उत्पन्न नहीं हुई है बल्कि इसके पीछे शुरूआत से ही एक विदेशी षड्यंत्र था जो जम्मू कश्मीर की धरती पर रचा गया था, और उसके बाद सूचना एवं जानकारियों के विकृतीकरण के कारण समस्याएं निरंतर बढ़ती रही । इसमें सबसे बड़ा योगदान दिल्ली और श्रीनगर में बैठे कुछ नेताओं, नौकरशाहों, पत्रकारों और अधिवक्ताओं का रहा है । हम देखें तो ध्यान आता है कि जब-जब जम्मू कश्मीर में स्थितियां सुधरने लगती है तब दिल्ली कोई न कोई ऐसा कदम उठाती है जो राज्य में समस्या को फिर से उभरने का मौका दे देती है । उदाहरण स्वरूप 2010 में असंतोष के बाद राज्य में हालत सुधार रहे थे किन्तु केंद्र सरकार ने 3 वार्ताकारों की एक टीम भेज दी, जिसने ऐसी सिफारिशें की जो अत्यंत घातक थी । जैसे अनुच्छेद 370 को स्थायी बनाना, 1953 के बाद लागू किये गये संवैधानिक प्रावधानों की पुनः समीक्षा करना । इस प्रकार के कदम अलगाववादियों को एक नया जीवन प्रदान करते है जिससे वो अपनी गतिविधियां को और मुखर होकर चलाते है । हालांकि बुरहान के एनकाउंटर के पश्चात ऐसा पहली बार देखा गया कि राज्य के 3-4 जिलों में गड़बड़ी कर रहे अलगावादियों को पूरी तरह से नजरअंदाज किया गया है जिससे उनके हौसले पस्त होते जा रहे है ।

 

प्रश्न - सीमा पर रहने वाले नागरिकों का शेष भारत के साथ भावनात्मक एकीकरण होना जरूरी है । इसके लिए कौन-कौन से प्रयास किए जाने चाहिए ?

 

उत्तर - जम्मू कश्मीर सामरिक दृष्टि से अति संवेदनशील राज्य है, जहां पर हमारी अंतर्राष्ट्रीय सीमा एवं नियंत्रण रेखा दोनों है । देश का यह राज्य पाकिस्तान एवं चीन जैसे देश की सीमाओं से जुड़ा हुआ है ।  वर्तमान समय में भी मीरपुर, मुजफ्फराबाद, भिंबर, कोटली, गिलगित, बल्तिस्तान जो कि जम्मू कश्मीर रियासत के हिस्से थे जो आज पाकिस्तान के कब्जे में है, दूसरी तरफ लद्दाख का आक्साईचीन नामक क्षेत्र चीन के अवैध कब्जे में है ।

पाकिस्तान आए दिन हमारे लिए समस्या पैदा करता है, घुसपैठ, गोलाबारी एवं आतंकी हमले जैसी घटनाएं यहां आए दिन घटती रहती है जिसका शिकार जम्मू कश्मीर राज्य में सांबा, कठुआ, अखनूर, आर एस पुरा, राजोरी, पुंछ और कारगिल के लोग निरंतर होते हैं । लेकिन यहां की देशभक्त जनता के योगदान के कारण 1947 से लेकर आज तक दोनों पड़ोसी दुश्मन राष्ट्रों के अनेक षड्यंत्र विफल किये हैं ।

1965, 1971 के युद्ध के समय आतंकवाद के खिलाफ सुरक्षाबलों के साथ रहने वाले लोगों को पता है कि जम्मू कश्मीर की देशभक्त जनता ने राष्ट्र की एकता एवं अखंडता के लिए कंधे से कंधा मिलाकर संघर्ष किया है । तमाम कठिनाइयों और अभावों के बीच रहकर भी लद्दाख की देशभक्त जनता ने वो चाहे देमचोक है, चाहे वह चुशुल है, चाहे वह चउर है सब जगह वहां के लोगों ने बखूबी हिम्मत से काम किया । आप कभी देमचोक गांव जाकर देखिए सिंधु नदी के उधर देमचोक का आधा हिस्सा चीन के अवैध कब्जे वाले हिस्से में पड़ता है वहां चीन ने 80 पक्के घर बनाये है जबकि भारत ने 80 कच्चे घर बनाये है । चीन ने उन 80 घरों तक आवागमन की सुविधा के लिए सड़क बनायी है । चीन ने भारत के हिस्सें वाले लोगों से कहा है कि आप लोग सिंधु नदी पार कर हमारे घर में आकर रहो । आपको चीन में कहीं भी आने का अधिकार रहेगा । मोबाइल, इंटरनेट जैसी सुविधायें आपको मुफ्त में मिलेंगी । वहां पर बिजली, सड़क, पानी, जैसी सुविधाएं है । जबकि भारत अपने उन नागरिकों को सड़क, बिजली, पानी जैसी मूलभूत सुविधाएं प्रदान करने में असफल है । चीन को यह मालूम है जिस दिन देमचोक के 80 परिवार चीन में आ गये, भारत का अगला गांव देमचोक से 40 किलोमीटर आगे है । लेकिन देमचोक के लोगों का अदम्य साहस एवं देशभक्ति ही है कि वहां के लोगों ने चीन के बहकावें में नहीं आये जिसके कारण से देमचोक भारत के पास है ।

 

 

वी. के. मेनन

  

 

सीमा को सुरक्षित बनाना है तो सीमा रेखा और नियंत्रण रेखा पर रहने वाले भारतीयों को मजबूत बनाना होगा जिसके लिए उनमें अपनापन एवं एकीकरण के भाव को मजबूत करना होगा । शेष भारत में रहने वाले लोग और जम्मू कश्मीर में सीमा और नियंत्रण रेखा पर रहने वाले लोगों के बीच संवाद स्थापित करने और उसको निरंतर जारी रखने की जरूरत है । सीमा और नियंत्रण रेखा पर रहने वाले लोगों के प्रति शेष भारत में जागरूकता होनी चाहिए । उनकी समस्याओं एवं प्रश्नों के विषय में जब भारत से आवाज उठेगी तो उससे सीमा पर रहने वाले लोगों का भावनात्मक एकीकरण पूरे देश के साथ बढ़ेगा । देश की राष्ट्रवादी शक्तियां इस बात के लिए निरंतर कार्य कर रही है कि सीमावर्ती और शेष भारत के लोगों में यह संवाद बने । इस संवाद को मजबूती प्रदान हो इसके लिए जम्मू कश्मीर में सीमा रेखा और नियंत्रण रेखा पर स्थित अनेक गांव में शिक्षा एवं स्वास्थ्य से संबंधित अनेक कार्य राष्ट्रवादी शक्तियां कर रही है । दूसरी तरफ जब पाकिस्तान अपनी नापाक हरकतों से बाज नहीं आता है तब भारतीय सेना उसका मुहंतोड़ जवाब देती है । इस भारतीय कार्रवाई पर कुछ पाक परस्त भारतीय मीडिया घर को अखरती है और वे “अमन की आशा’’ जैसे पाखंड रच सकती है । लेकिन आर एस पूरा, पुंछ, अखनूर, और सांबा क्षेत्रों में रह रहे लोगों को निरंतर गोलीबारी से कठिन हालातों का सामना करना पड़ता है। उन्हें अपने घर छोड़कर कैंपों में शरण लेनी पड़ती है लेकिन फिर भी वे भारतीय सेना का साथ देते है ।

प्रश्न - जम्मू कश्मीर भारत का अविभाज्य अंग है । इस मुद्दे पर हमें पाकिस्तान को कटघरे में खड़ा करना चाहिए । लेकिन भारत कटघरे में खड़ा है, ऐसी विपरीत स्थिति के क्या कारण है ?

 

उत्तर - जम्मू कश्मीर को लेकर आज भारत में किसी प्रकार का संशय नहीं है। जम्मू कश्मीर भारत का वैसा ही अभिन्न हिस्सा है जैसा देश के अन्य राज्य । जम्मू कश्मीर भारत के संविधान की अनुसूची एक में 15वें स्थान पर वर्णित राज्य है । जम्मू कश्मीर के संविधान का सेक्शन 3 भी इसी तथ्य को इंगित करता है । पाकिस्तान ने भी आज तक विश्व के किसी भी पटल पर जम्मू कश्मीर पर दावा नहीं किया है । जहां तक भारत के कटघरे में खड़े होने का प्रश्न है इसका कारण भारत की नीतियों में निरंतरता का अभाव था । हम केवल देश विरोधी ताकतों के प्रश्नों का जबाब देने में व्यस्त रहे है । भारत की संसद ने जम्मू कश्मीर पर 1994 में एक संकल्प तो लिया लेकिन धरातल पर इस विषय पर अभी तक कुछ नहीं किया है । भारत की नीतिगत कमजोरी का लाभ देश के दुश्मनों ने खूब ही उठाया । ध्यान रहे कि भारत को जम्मू कश्मीर के संदर्भ में कठघरे में खड़े करने के प्रयास पहले पश्चिमी राष्ट्र पोषित तथाकथित बौद्धिक वर्ग ने किया और वर्तमान में देश विरोधी ताकतें इस्लामिक कट्टरवाद के चलते कर रही है ।

जम्मू कश्मीर का भूतकाल या वर्तमान में जो सामरिक या आर्थिक महत्व है उसमें सबसे महत्वपूर्ण “गिलगित बल्तिस्तान” है । द्वितीय विश्व युद्ध के पश्चात अंग्रेजों के समक्ष सबसे बड़ा प्रश्न यह था कि यदि उन्हें भारत छोड़ना है तो उस स्थिति में अंग्रेजों के हितों का पोषण कैसे किया जाय । अंग्रेजों को जम्मू कश्मीर के सामरिक महत्व का पूरा अंदाजा था । जम्मू कश्मीर से टर्की तक अंग्रेज चीन और रूस के विस्तार को रोकने के लिए एक इस्लामिक दीवार बनाना चाहते थे । ब्रिटिश सरकार यह अच्छी तरह से जानती थी कि भारत उन्हें कभी जम्मू कश्मीर में हस्तक्षेप नहीं करने देगा । और इसके लिए उन्होंने एक ऐसा षड्यंत्र रचा, जिसका आधार वाक्य था - “Strong stable Pakistan is in interest of British and for strong and stable Pakistan Jammu and Kashmir must go to Pakistan’’. आज जम्मू कश्मीर का जो हिस्सा पाकिस्तान के कब्जे में है अगर वह पाकिस्तान के पास नहीं होता तो पेशावर, इस्लामाबाद, लाहौर और स्यालकोट ये सब शहर भारत की 50 से 70 किमी के रेंज में थे । बलूचिस्तान पाकिस्तान में जाना ही नहीं चाहता था । पूरा जम्मू कश्मीर हमारे पास होता तो शायद बलूचिस्तान भी पाकिस्तान में नहीं जाता । यदि ऐसा होता तो पाकिस्तान ही नहीं बनता । बिना जम्मू कश्मीर के पाकिस्तान कभी भी मजबूत नहीं हो सकता था । ब्रिटिश राज की स्पष्ट योजना थी कि जम्मू कश्मीर का विलय पाकिस्तान में हो इसके लिए माउंटबेटन खुद महाराजा हरि सिंह से मिलें और उन्हें यह कहा कि यदि वे राज्य का विलय पाकिस्तान में कर देते है तो उससे जवाहरलाल नेहरू या सरदार पटेल को कोई आपत्ति नहीं होगी । 15 अगस्त से 26 अक्टूबर तक महाराजा ने आंतरिक और बाह्य सभी प्रकार के दबाव झेले लेकिन अंत में उन्होंने वही किया जो वो बहुत पहले करना चाहते थे । 26 अक्टूबर 1947 को जिस दिन महाराजा हरि सिंह ने भारत में जम्मू कश्मीर का अधिमिलन किया उसी दिन अंग्रेजों की यह योजना विफल हो गयी ।

जब ब्रिटिश राज और पश्चिमी शक्तियां जम्मू कश्मीर का अधिमिलन भारत में नहीं रोक पायी तब उन्होंने भारत को संयुक्त राष्ट्र संघ में घेरने की कोशिश की। यदि ऐतिहासिक दस्तावेजों का अध्ययन किया जाये तो विदेशी ताकतों के षड्यंत्र पूरी तरह से समझ में आ जायेगे । भारत ने संयुक्त राष्ट्र संघ में जम्मू कश्मीर में पाकिस्तान के अतिक्रमण की शिकायत की थी, लेकिन वहां षड्यंत्रकारी ताकतों ने जम्मू कश्मीर के अधिमिलन पर ही प्रश्न उठाने शुरू कर दिये । शुरूआत में भारतीय नेतृत्व इन षड्यंत्रों को समझ नहीं पाया था किंतु उसके बाद 1956 में वी. के. मेनन ने और बाद में एम. सी. छागला के संयुक्त राष्ट्र में हुए भाषणों ने स्पष्ट कर दिया कि भारत जम्मू कश्मीर में किसी बाहरी शक्ति का हस्तक्षेप बिलकुल सहन नहीं करेगा । जम्मू कश्मीर के मामलें में भारत की यह स्थिति आज तक अटल है । 

 

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