नाडीमर्ग नरसंहार- मानवता हुई शर्मसार

06 Dec 2017 17:19:05

 


 

हेमंत विजेंद्र

मानवता और आतंकवाद :-

मानवता मनुष्य के व्यवहार मे समाहित वह विशेष गुण है जो उसे अपनी करूणा, अपना प्रेम, अपनी तमाम खुशियां पर हित समर्पित करने हेतु आतुर करती है। वह स्वयं की चिंता करे बगैर दुसरो की दुःख-तकलीफ, उनकी मुसीबतो को ओर अपनी सोच रखता है। वह पुरज़ोर कोशिश करता है के किसी न किसी तरह समाज मे अपना वो योगदान दे, जो किसी की ख़ुशी का कारण बने। उसका माध्यम चाहे तन,मन धन हो या उनके लिए किया गया चिंतन। वो हर संभव प्रयास करता है के उसका जीवन, किसी न किसी जरूरतमंद के काम आ आये। लेकिन जब ये मानवता का गुण मनुष्य के जीवन से अलग हो जाता है तब यह वो हिंसक, विकराल रूप धारण कर लेता है जिसे हम वर्तमान समय में आतंकवाद की संज्ञा देते है। आतंकवाद वह घिनौना रूप है जिसे बर्बादी ही पसन्द है। यह समाज में घुला वो ज़हर है जिसके साथ जीना असम्भव है।

पाकिस्तान का जम्मू-कश्मीर में आतंक को बढ़ावा क्यो :-

आज कुछ जेहादी ताकतों ने धर्म का सहारा लेकर मनुष्य की सोच को एक विशेष धार्मिक समुदाय के विकास को बढ़ावा देने के लिए आतंक का जाल बुना हुआ है। लश्कर-तैयबा, हिजबुल मुजाहिदीन, जैश-ए-महोम्मद ये वो संगठन है जो मानवता को कलंकृत करने के लिए जिम्मेदार है। जब कुछ लोग इसे समर्थन दे तो इन्हें जल्द ही रोका जा सकता है, लेकिन जब एक पूरा देश ही इसका समर्थन करे, इनका संरक्षण करे, इसका विस्तार करे तो उस पर काबू पाने में समय लगता है। पाकिस्तान वह देश है जो इन जेहादी ताकतों को पनपने के लिए पनाह, पैसा, तकनीक, हथियार देकर अपने नाजायज़ इरादों को पूरा करने के लिए बेकरार है। पाकिस्तान की इस नीति से अगर किसी को ज्यादा नुकसान हुआ है तो वो हौ भारत का जम्मू-कश्मीर राज्य। पाकिस्तान आतंक का सहारा लेकर इस राज्य को हथियाना चाहता है। वो इस प्रयास में रहा है कि किसी न किसी तरह जम्मू कश्मीर राज्य के कश्मीर क्षेत्र की संस्कृति उनका अस्तित्व यहाँ से मिटा दे। पाकिस्तान प्रायोजित इस आतंकवाद ने भगवान शिव शंकर,ऋषि कश्यप, अभिनवगुप्त लल्लेश्वरी, नुंद ऋषि  और कुशग बकुला रिमपोछे जैसे विभुतियों की पावन भूमि पर बडी ही बर्बता से कहर बरपाया है।

जम्मू-कश्मीर में धर्मनिरपेक्षता ताक परआतंक की सीमा चरम पर।

भारत एक धर्मनिरपेक्ष देश है। यहाँ सभी धर्मों को समान दर्जा दिया जाता रहा है। लेकिन जम्मू-कश्मीर ही एक मात्र राज्य है जहाँ यह बात गलत सिद्ध हो जाती है। इसके पीछे किसी का हाथ है, तो वो है पाकिस्तान।  इस क्षेत्र मे अगर कोई समुदाय ज्यादा प्रभावित हुआ है तो वो कश्मीरी हिन्दुओं। धर्म की बात की जाए तो हिन्दू। पाकिस्तान द्वारा 90 के दशक मे जम्मू-कश्मीर को पूर्णतः इस्लामिक राज्य बनाने के लिए वहां रह रहे कश्मीर में हिन्दुओं  के क़त्लेआम की साजिश रची गयी थी। अपनी जिंदगियो को बचाने के लिए 2 लाख से भी ज्यादा  कश्मीरी हिन्दुओंो ने वहाँ से पलायन कर दिया था। और अधीकतर जम्मू में बस गए थे। लेकिन जो वहाँ रह गए थे वो पाकिस्तान की आँखों मे शूल की तरह चुभ रहे थे। पाकिस्तान ने समय समय पर उन्हें वहाँ से खदेड़ने और उनका नामी निशान मिटाने के लिए आतंकी अभियान चलाए है। जिनमे मुख्त:  संग्रामपुरा हत्याकांड (1997), वँधामा नरसंहार( 25 जनवरी 1998), नाडीमर्ग नरसंहार (23 मार्च 2003) है।

नाडीमर्ग  नरसंहार :-

नाडीमर्ग गाँव मे 1990 से पहले कश्मीरी हिन्दुओं के 51 परिवार गुजर बसर करते थे। जो की उनके पलायन के बाद 11 ही रह गए थे। अब यहाँ कश्मीरीओं हिन्दू  अल्पसंख्यक हो गए थे। इन अल्पसंख्यक, कश्मीरी हिन्दुओं के साथ हए हत्याकांड  ने बर्बरता की सारी हदें पार कर दी थी। मानवता को शर्मसार करने मे तनिक भी कसर नहीं छोड़ी थी। इसने हर भारतीय के ह्रदय मे ऐसा घाव दिया है ,जिससे उबरना आसान नही। 23 मार्च 2003 का दिन जम्मू कश्मीर के इतिहास में उन शोकाकुल दिनों में दर्ज हुआ जिसकी मात्र चर्चा ही कलेजे को चीरने के लिए पर्याप्त है। इस रात्रि, 10:00 बजे के बाद आतंकियों ने वो ख़ूनी खेला जिसकी टीस  आजतक भारतीयों के जहन से नहीं जा सकी। 7 आतँकवादी, भारतीय फौज की वर्दी में उस समय के पुलवामा (वर्तमान शोपियां) जिले के नादिमार्ग गाँव में घुस गए। जो की तत्कालीन मुख्यमंत्री मुफ्ती मोहहमद सयैद के निवास स्थान से मात्र 7 km की दूरी पर स्थित है। आतंकियों ने बड़ी ही बेदर्दी से 24 कश्मीरी हिन्दुओं को मौत के घाट उतार दिया। जिनमें 11 महिलाएं, 11 पुरूष और शेष वो मासूम बच्चे थे जिन्होंने अभी तक बोलना और चलना भी नहीं सीखा था।

उस दर्दनाकभयावह रात की कहानीप्रत्यक्षदर्शियों की जुबानी :-


प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार सभी आतंकी, घरों में भारतीय फौज की वेशभूषा पहन कर आये और उनसे तलाशी लेनी चाही। कइयो ने चुपचाप लेने दी। फूला, जो कि खुशकिस्मती से बच गयी थी उसने बताया की, तलाशी लेते हुए उन्होंने सभी को बाहर मैदान मे चिनार के पेड़ के नीचे एकत्र होने के लिए कहा। बहुतो ने ऐसा करने से इंकार कर दिया। फिर वो आतंकी जबरस्ती उन्हें घसीटकर वहाँ ले गए। उन्होंने उनके साथ जबरन मारपीट की। और उनके जेवरात व नकदी भी लूट ली। यह बहुत ही भयावह दृश्य था। फूला ने अपने बेटे को चिमनी में छिपा दिया था और खुद भी झाड़ियों मे छिप गयी थी। सोमनाथ, जो कि उन्ही दिनों सरकारी नोकरी से सेवानिवृत्त हुए थे। उन्होंने अपनी इनामी राशि और पेंशन राशि (1 लाख 70 हजार रुपये) अपनी अलमारी मे रखी थी। आतंकियों ने उन्हें लूट लिया। जब उससे बाहर जाने को कहा गया और अपने परिवार के दूसरे सदस्यों को भी बाहर लाने को कहा, जो कि अपनी जान बचाने के लिए छुप गए थे, तब इंकार करने पर उसके गाल पर जोरदार तमाचे मारे गए। आतंकियों ने 24 कश्मीरी हिन्दुओं को चिनार के पेड़ के नीचे एक पंक्ति मे बैठा दिया। और लूटी हुई नकदी व समान को मैटाडोर में रख दिया। उसके बाद निर्ममता, क्रूरता और हैवानियत दिखाते हुए सभी पर अंधाधुंध गोलियां बरसानी शुरू कर दी। वो सभी चिल्लाते रहे, अपनी जान बख्शने की याचना करते रहे किन्तु उन दरिंदों ने उनकी एक ना सुनी। अधिकतर गोलियां उनके चहरे पर चलाई गई। उनके गालो के चिथड़े उड़ गए। चारो तरफ खून ही खून फैल गया। मातम पसर गया। चुन्नीलाल,  जिसकी जांघ मे गोली लगी थी, उसकी भी किस्मत अच्छी थी। उसने मृत होने का नाटक किया और बच गया। जालिमों ने महिलाओं, बुजुर्गों समेत 2 साल के मासूम बच्चे मोनू तक को नही छोड़ा। गिरजा कुमारी (23) जो कि विक्लांग थी उसके साथ भी जानवरों की तरह व्यवहार किया गया। और घसीट कर बाहर लाया गया था। चारो तरफ सन्नाटा पसर गया था। एक हस्ता खेलता गाँव जहां कभी ख़ुशियों के गीत गूंजते थे वो आज लश्कर-ए-तैयबा के आतंकवादियों द्वारा वीरान कर दिया गया था। दरिंदो ने कश्मीरी हिन्दुओं को गिद्धों के भोजन के लिए खुले आसमान के नीच छोड़ दिया और इस कुकृत्य को अंजाम देकर चले गए।



मृतको की सूची :-मरने वालों का विवरण किया जाए तो इस नरसंहार मे जियालाल भट्ट की तीन पीढिया खत्म हो गयी। स्वयं जिया लाल भट्ट (80),पत्नी- देवकी (75), तीनो बेटे- राकेश कुमार (26), अवतार कृष्ण (55), बंशीलाल (50), बहू- आशा जी(बिंदरी) 40, बेटी- सुष्मा (26), पौता-उमत कुमार (20), और पौतिया- गिरजा कुमारी (23), प्रिंशी (27)। सतीश कुमार पण्डित की पत्नी सुमन (30) उसका 2 वर्ष का नन्हा बेटा मोनू। कन्थराम के परिवार से उसके दोनों बेटे, लोकनाथ(40),राधाकृष्ण (60), बहू- गीता (40), और पौता प्रधिमन कृष्ण (25)। मनोहरनाथ पण्डित के परिवार से उनके पिता- श्री त्रिलोकीनाथ (55), पत्नी- संगीता (30), और 3 वर्ष का मासूम सूरज। चुन्नीलाल की पत्नी चाँद रानी (40), गोविंदराम का बेटा लस्सा कौल 70),  दयाराम का बेटा बंशीलाल (70), उनकी पौती-रजनी (22) और इनके अतिरिक्त रमेश पँडित।

 

सुरक्षा मे चूकआला अधिकारियों का गैरजिम्मेदाराना रवैया :-

कुछ कश्मीरी हिन्दुओं को इस तरह की घटना होने का पूर्वाभास तो था। इसलिए इस हमले से 2 दिन पूर्व ही सभी अपनी सुरक्षा को लेकर चिंतित थे। वे इसके लिए 22 मार्च 2003 को अनंतनाग के उपयुक्त व पुलवामा के उपायुक्त से भी मिले थे । और अपनी सुरक्षा के लिए गुहार लगाई थी। लेकिन उन्हें वहा से कोई भी मदद नही मिली। इसके बाद वो कम्यूनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया (CPI)  के पुलवामा से विधायक मोहम्मद खलील नायक से भी मिले। लेकिन उनकी अरदास पर विधायक जी ने भी ध्यान नही दिया। और उनकी सुरक्षा की गुहार को सिरे से नकार दिया। आला अधिकारियों की यह लापरवाही इतनी भारी पड़ जाएगी, इस बात का अनुमान कश्मीरी हिन्दुओं को नही था। अगर ये अधिकारी उनकी बातों की ओर गौर करते  और उन्हें सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम उपलब्ध करवा देते तो शायद इस हादसे को टाला जा सकता था।

 

परिणाम और सहिष्णुता :-

पाकिस्तान, जिसका उद्देश्य कश्मीरी हिन्दुओं के जहन में आतंक पैदा कर वहाँ से उन्हें विस्थापित करवाना था। इस नरसंहार की वजह से वो अपनी चाल में कुछ हद तक कामयाब हो गया था। पँडित समुदाय के 32 परिवारों के लगभग दौ सौ सदस्यो ने कंगन, मगम,कर्ण नगर, सथू, कुलगाम और सिरहमा जैसे स्थानों से पलायन किया। आतंक के अजगर ने मासूम कश्मीरी हिन्दुओं की जान को तो निगला ही, इसके साथ-साथ बहुतों को अपने ही घरों से बेघर करने के लिए मजबूर कर गया। आज तक कश्मीर घाटी के 3-4 जिलों में सक्रिय अलगाववादी इस बात का जवाब नहीं दे पाए है की अपनी जन्मभूमि से दूर क्यों? अब समय  आ गया है की  हम इन सवालों के कारण और निवारण की ओर ध्यान दे। अब समय आ गया है के हम सभी आतंक को मुहतोड़ जवाब दे, आतंक की जडो को जम्मू कश्मीर से उखड फेंके और मेरे कश्मीरी हिन्दुओं भाइयो और बहनों को उनका हक दिलाये।

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