गिलगित पर है गिरगिट की नज़र ​

27 Mar 2017 12:11:11


सूर्य पान्डेय 
 
गिलगित-बाल्टिस्तान को पाकिस्तान की ओर से पांचवां राज्य घोषित करने की कोशिशों की ब्रिटिश संसद ने निंदा की है। इससे संतोष मिलता है कि ब्रिटेन ने जम्मू-कश्मीर की संवैधानिक स्थिति पर भारत की राय का समर्थन किया है। लेकिन, क्या इस वक्त हमारे मन में यह सवाल नहीं उठना चाहिए कि हमने अपने खोए हिस्से को पाने के लिए अब तक क्या किया? जम्मू-कश्मीर को लेकर विवाद पैदा करने में जिन अंग्रेजों की भूमिका मानी जाती है, उनकी ही संसद ने पाक के प्रस्ताव की निंदा की है। सवाल है कि जब अंग्रेजी संसद इस प्रस्ताव को पारित कर रही थी, तब हमारी संसद में क्या हो रहा था? हमारी संसद आरक्षण समेत ऐसे तमाम मुद्दों पर बहस और हंगामे में जुटी थी, जिन पर कभी भी चर्चा हो सकती थी।
 
इससे दुखद क्या हो सकता है कि जिस गिलगित-बाल्टिस्तान को हम अपने जम्मू-कश्मीर राज्य का अभिन्न हिस्सा बताते हैं, उस पर पाकिस्तान का कब्जा मजबूत होने पर किसी माननीय सांसद ने सवाल तक नहीं पूछा। देश के बीचोंबीच जंतर-मंतर पर हर दिन भाषा, प्रांत, नस्ल, जाति और तमाम तरह के अधिकारों की मांग को लेकर सैकड़ों प्रदर्शन चलते हैं, लेकिन गिलगित-बाल्टिस्तान के मुद्दे पर कहीं एक बैनर नहीं दिखा। अखबारों के पन्ने एक राज्य में टुंडा-कबाब कम मिल पाने की चिंता से रंगे हैं, टीवी स्क्रीन्स पर 'चप्पलबाज सांसद' छाया है, लेकिन देश के एक हिस्से पर बढ़ता संकट हमारी चेतना में नहीं है। क्या यह एक देश के तौर पर हमारी सामूहिक चेतना सवाल नहीं खड़े करता। राजनीतिक, सामाजिक और सांस्कृतिक क्षेत्र में राष्ट्र की एकता को लेकर इस प्रकार की विचारशून्यता अखरती है। यही वजह है कि गिलगित-बाल्टिस्तान को लेकर ब्रिटेन से मिले समर्थन का भी हम लाभ उठाने की स्थिति में नहीं दिखते।
 
वर्तमान सरकार का अजेंडा हमेशा से जम्मू-कश्मीर की विसंगतियों को दूर करने का रहा है, उसने भी इस बारे में प्रेस कॉन्फ्रेंस कर पाक सरकार को चेतावनी देने भर की रस्म अदायगी की। क्या इस मौके पर राष्ट्र और दुनिया के नाम हम अपनी एकता का संदेश नहीं दे सकते थे? हर मुद्दे पर संसद से सड़क तक हंगामा करने वाले विपक्षी दलों ने भी कहीं विरोध प्रदर्शन या सरकार से अपना पक्ष रखने की मांग नहीं की। ब्रिटेन की संसद के समर्थन से ज्यादा यह हमारे लिए पीड़ा का सबब होना चाहिए। हार के मुहाने पर पहुंचकर तमाम देशों ने जंग जीती होंगी, लेकिन सब कुछ हासिल कर बहुत कुछ गंवा देने का भारत की जम्मू-कश्मीर नीति एक बड़ा उदाहरण है।
 
कानूनी और संवैधानिक तौर पर जम्मू-कश्मीर भारत का अभिन्न हिस्सा है, उसका आज एक तिहाई ही हमारे पास है। गिलगित-बाल्टिस्तान का मुद्दे पर तो अब पाक ही नहीं चीन भी हमारे समक्ष खड़ा है। ऐसा क्यों है? इसलिए क्योंकि हमने एक राष्ट्र के तौर पर कभी सोचा ही नहीं कि हमने क्या खोया है और क्या पाना है? पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर की हम अकसर बात करते हैं, लेकिन करीब 15 लाख की आबादी और 72,494 वर्ग किलोमीटर क्षेत्रफल वाले गिलगित-बाल्टिस्तान की हम चर्चा नहीं करते। यह एक राष्ट्र के तौर पर हमारी सामूहिक असफलता का स्मारक है।
 
पाक ने बसाए दूसरे राज्य के निवासी
भले ही कश्मीर से धारा 370 नहीं हटी है पर पाकिस्ता ने पाकिस्तान ने बीते कई दशक के दौरान योजनाबद्ध काम किया है। जुल्फिकार अली भुट्टो के शासनकाल में सबसे पहले यहां स्टेट सब्जेक्ट कानून खत्म किया गया था। यह वही कानूनी प्रावधान है, जिसके चलते आज भी भारत के दूसरे हिस्सों के लोग जम्मू कश्मीर में जमीन खरीद कर वहां बस नहीं सकते। 1970 के दशक में पाकिस्तान ने अपने गैर-कानूनी कब्जे वाले गिलगित-बाल्टिस्तान से यह प्रावधान हटाकर वहां की आबादी की संरचना बदल डालने का रास्ता खोल दिया। फिर इस इलाके में पंजाब व पख्तूनख्वा से सुन्नी संप्रदाय के लोगों को बसाया जाने लगा। अब यहां पर बहुसंख्यक शिया समुदाय संख्या कम हो गई है। हालत यह है कि अपने ही क्षेत्र में शिया समुदाय को आए दिन कट्टरपंथियों के अमानवीय हमलों का सामना करना पड़ता है। आबादी का यह संतुलन बिगड़ा तो इस इलाके में पाक-परस्त जमात का दबदबा बनता चला गया।
 
क्या है गिलगित-बाल्टिस्तान की स्थिति?
गिलगित-बाल्टिस्तान को पाकिस्तान में पीओके के उत्तरी क्षेत्र के नाम से जाना जाता है। पांच जिलों में बंटे इस उत्तरी क्षेत्र की बड़ी आबादी शियाओं और इस्माइलियों की है, जिन्हें सुन्नी इस्लामिक राष्ट्र पाकिस्तान में लगातार प्रताड़ित किया जा रहा है। इस इलाके के मूल निवासी शियाओं, इस्माइलियों और विभिन्न जनजातियों के उत्पीड़न की कहानी लंबी है। पाक ने यहां के लोगों को हमेशा ही सांप्रदायिक आधार पर लड़ाने की कोशिश की है ताकि उसके उत्पीड़न के खिलाफ एकजुटता न हो सके।
 
कब हमने उठाई गिलगित-बाल्टिस्तान में उत्पीड़न की आवाज? 
यदि दो देश किसी खाली पड़ी भूमि के लिए जंग में उतरते हैं तो फैसला सेना के हाथ होता है। लेकिन, यदि उस जमीन में आबादी हो तो उस इलाके के लोगों का समर्थन भी तय करता है कि किस देश का दावा पुख्ता है। इस मामले में भी हम पिछड़ते दिखे हैं, पाकिस्तान की तमाम ज्यादतियों को हम राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय मंचों पर उठाने में नाकाम रहे हैं। अब तक के सबसे कट्टर इस्लामिक राष्ट्रपतियों में से एक जिया-उल हक के मार्शल लॉ के दौर में इस्लाम के नाम पर यहां शरीयत लागू कर दिया गया था। 1982 के बाद से ही यहां सांप्रदायिक हिंसा का दौर जारी है।
 
1988 में पाक सेना ने यहां कई शिया प्रदर्शनकारियों को जिंदा फूंक दिया था। 1996 में बाहरी लोगों को बसाने का विरोध कर रहे शियाओं पर पाक सेना ने ताबड़तोड़ फायरिंग की थी। यहां पहली बार अक्टूबर 1994 में चुनाव हुए थे, जिसके बाद 26 सदस्यीय नॉर्दन एरियाज एग्जिक्यूटिव काउंसिल का गठन किया गया। लेकिन, मार्च 1995 में कहा गया कि इस काउंसिल के पास किसी तरह के कानून को पारित करने का अधिकार नहीं होगा, यह काउंसिल सिर्फ सलाह दे सकती है। सवाल है कि भारत के प्रतिनिधियों ने संयुक्त राष्ट्र समेत अंतरराष्ट्रीय मंचों पर कितनी बार इन मुद्दों को उठाया।
 
 

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