कश्मीर घाटी में घमासान के असल माइने

14 Apr 2017 13:19:00


रवि पाराशर

गत नौ अप्रैल को श्रीनगर लोकसभा सीट पर उपचुनाव के दौरान के कुछ वीडियो सोशल मीडिया पर हैं, जिनमें दिख रहा है कि किस तरह कश्मीरी युवा हथियारबंद सुरक्षाकर्मियों को उकसा रहे हैं, अपमानित कर रहे हैं। इसके बावजूद जवान गोलियां नहीं चला रहे हैं। ऐसे वीडियो पहले भी देखने को मिले हैं। लेकिन अलगाववादी सोच वाले कथित बुद्धिजीवियों के एक वर्ग ने कश्मीर में तैनात सुरक्षाकर्मियों के बारे में नकारात्मक छवि बनाने की मुहिम छेड़ रखी है। जब भी पैलेट गन या जवाबी कार्रवाई में कश्मीरी नागरिकों की मौत होती है, तब यही माहौल बनाया जाता है कि भारतीय सुरक्षा बल वहां दमन कर रहे हैं। जबकि हक़ीक़त यह है कि घाटी में क़ानून-व्यवस्था की पहली ज़िम्मेदारी जम्मू-कश्मीर पुलिस की है, जिसमें बहुसंख्य जवान राज्य के ही निवासी हैं।

श्रीनगर सीट पर उपचुनाव के बीच सुरक्षा बलों के साथ वहां के कुछ गुमराह युवाओं का बर्ताव सबने देखा और उसके एक दिन बाद यानी 10 अप्रैल को सुप्रीम कोर्ट में पैलेट गन के इस्तेमाल के मामले में सुनवाई हुई। जम्मू-कश्मीर हाईकोर्ट बार एसोसिएशन (कश्मीर) की पैलेट गन पर प्रतिबंध की मांग हाईकोर्ट में ख़ारिज होने के बाद इसे सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई है। सुप्रीम कोर्ट ने अपीलकर्ताओं से पूछा कि हमलावर भीड़ से निपटने के लिए क्या उपाय किए जाएं, वे ही सुझाव दें। कोर्ट ये सवाल भी उठाया कि सात से 12 साल के बच्चे उग्र भीड़ में क्यों आते हैं? बच्चे भीड़ के आगे ही क्यों खड़े किए जाते हैं? कोर्ट ने आश्चर्य जताया कि सुरक्षा बलों की जवाबी कार्रवाई में घायल होने वाले ज़्यादातर युवा 13 से 20 और 20 से 24 साल के ही होते हैं।

सवाल यह है कि भीड़ सरकारी और निजी संपत्ति को नुकसान पहुंचाती है, सुरक्षा बलों पर हमला करती है, तो क्या जवान शांति से जान देते रहें? भीड़ का फ़ायदा उठाकर आतंकी सुरक्षा बलों पर हथगोले फेंकते हैं, तो क्या पत्थर फेंकते युवाओं की भीड़ की वजह से जवान जान देते रहें? भीड़ शांति से खड़े युवाओं की नहीं, पत्थरबाज़ों की होती है। पिछले साल आठ जुलाई को आतंकी कमांडर बुरहान वानी के मारे जाने के बाद से 11 अगस्त के बीच सुरक्षा बलों पर 1522 हमले हुए। हमलों में 3777 सुरक्षाकर्मी घायल और दो जवान शहीद हो गए। चुनाव वाले दिन युवाओं ने पथराव, आगज़नी और हिंसा की 200 से ज़्यादा वारदात कीं। जवाबी कार्रवाई में आठ नागरिकों की मौत हुई और सुरक्षाकर्मियों, मतदानकर्मियों और लोगों समेत क़रीब 150 घायल हो गए। सरकारी और निजी संपत्ति का करोड़ों का नुकसान हुआ। चुनाव लोकतंत्र का प्रतीक है। ज़ाहिर है कि हिंसक युवा उनके हाथों की कठपुतली हैं, जो लोकतंत्र में भरोसा नहीं करते। हालात कितने बिगाड़ दिए गए हैं, इसका अंदाज़ा लगाना मुश्किल नहीं है।

पिछले साल 25 जुलाई तक पथराव की 1029 वारदात हुईं। इनमें सुरक्षा बलों के 3550 जवान घायल हुए थे। जबकि इस दौरान घायल होने वाले उपद्रवियों की संख्या 2309 रही। यह भी सच है कि 48 नागरिकों की मौत हो गई, जबकि दो जवान शहीद हुए। घायल होने वालों में 1300 से ज्यादा सीआरपीएफ़ के जवान थे, जबकि 2230 से ज़्यादा जम्मू-कश्मीर पुलिस के। 30 जुलाई, 2016 तक 317 उपद्रवी पैलेट गन से घायल हुए, जिनमें क़रीब आधे लोगों को आंखों पर चोट लगी। वर्ष 2015 में घाटी में 730 हिंसक प्रदर्शन हुए। जवाबी कार्रवाई में पांच नागरिकों की मौत हुई और 240 घायल हुए। जबकि पथराव में 886 जवान घायल हुए। पिछले साल जुलाई तक घाटी में 152 आतंकी वारदात हुईं, जिनमें सुरक्षा बलों के 30 जवान शहीद हुए। ज़ाहिर है कि पिछले साल 8 जुलाई के बाद से आतंकी वारदात और हिंसक प्रदर्शनों की संख्या में बेहद इज़ाफ़ा हुआ है। बहुत से कश्मीरी युवाओं ने बंदूकें थामी हैं, तो सुरक्षा बलों के जवानों के शहीद होने का सिलसिला भी काफ़ी बढ़ा है। इसकी बड़ी वजह पथराव करने वाली युवाओं की गुमराह भीड़ ही है।

सच्चाई यह भी है कि अलगाववादियों ने हमेशा घाटी में चुनाव बहिष्कार की अपीलें की हैं, लेकिन पहले कभी इतना असर नहीं देखा गया। असल सवाल यह है कि क्या श्रीनगर उपचुनाव में केवल सात फ़ीसदी वोटिंग चुनाव बहिष्कार की अपील का ही नतीजा है? हरग़िज़ नहीं। बड़े पैमाने पर हिंसा की सुनियोजित साज़िश नहीं होती, तो इतनी कम वोटिंग नहीं होती। कोई भी आम आदमी जान हथेली पर लेकर वोट डालने नहीं निकलेगा। इसे अलगाववादियों और आतंकियों के हिंसक गठजोड़ के सुबूत के तौर पर महसूस किया जाना चाहिए। यह केंद्र और जम्मू कश्मीर सरकारों के साथ-साथ सभी स्टेक होल्डर्स के लिए चिंता की बात है। इससे निपटने के लिए नए सिरे से रणनीति बनाने की तत्काल ज़रूरत है।

दूसरी सच्चाई यह है कि राज्य की कथित मुख्यधारा की सियासी पार्टी नेशनल कॉन्फ्रेंस भी चुनाव में हिंसक वारदात के लिए कम ज़िम्मेदार नहीं है। श्रीनगर सीट पर मतदान के तुरंत बाद पार्टी नेता उमर अब्दुल्ला ने हिंसा के लिए मुख्यमंत्री मेहबूबा मुफ़्ती को ज़िम्मेदार ठहरा दिया। अचरज है कि ऐसा करते वक़्त उन्हें अपने पिता और श्रीनगर सीट से पार्टी फ़ारूक़ अब्दुल्ला के बयान याद नहीं आए। गत 25 फ़रवरी को श्रीनगर में फारूक ने कहा था कि कश्मीर के लड़कों ने आतंकवाद का रास्ता अपनाया है। लड़कों ने खुदा से वादा किया है कि वे जान देकर भी मुल्क (कश्मीर) के लिए आज़ादी हासिल करेंगे। कश्मीरियों की नई पीढ़ी को बंदूकों का भी ख़ौफ़ नहीं। ये लोग मुल्क की आजादी के लिए संघर्ष कर रहे हैं। इसी महीने 5 अप्रैल को फ़ारूक बोले कि जो युवा पत्थरबाजी कर रहे हैं, उनका पर्यटन से कोई लेना-देना नहीं है। वे यह सब देश (कश्मीर) के लिए कर रहे हैं। वे जीवन कुर्बान कर रहे हैं, ताकि समस्या का समाधान निकल सके। असल में हाल ही में प्रधानमंत्री मोदी ने कश्मीरी युवाओं से अपील की थी कि या तो वे पर्यटन चुनें या आतंकवाद। कश्मीर के भारत में मिले रहने की हामी रही नेशनल कॉन्फ्रेंस का यह बदला रुख़ हिंसावादी सोच को बढ़ावा देना नहीं, तो और क्या है। फ़ारूक़ अब कश्मीर को अलग देश की तरह देख रहे हैं, तो यह महज़ चुनाव जीतने का हथकंडा मात्र नहीं, कुछ और है, जिसे समझे जाने की ज़रूरत है। ये वही फ़ारूक हैं, जिन्होंने बिजली चोरी के मामले में 3 मार्च, 2014 को कहा था कि कश्मीरी चोर नहीं, महाचोर हैं।

बहरहाल, बहुत से बुद्धिजीवी दलील देते हैं कि पत्थरों का जवाब गोली नहीं हो सकती और ‘भटकी हुई गोली’ हमेशा कश्मीरियों को ही क्यों लगती हैं? सच है कि पत्थरों का जवाब गोली नहीं हो सकती, लेकिन जवान जब गोलियों का मुक़ाबला गोलियों से कर रहे हों, तब अंधाधुंध बरसाए जाने वाले पत्थर क्या महज़ पत्थर होते हैं? जवान नागरिकों पर फायरिंग करने लगें, तो क्या इतनी कम मौतें होंगी? घाटी में रोज़ हज़ारों शव नज़र आएंगे। यह भी अंतिम रूप से सच है कि किसी समस्या का समाधान गोलियों से नहीं हो सकता। लेकिन क्या सेना एकतरफ़ा हिंसा होने दे? घाटी को अशांत बनाए रखने की पाकिस्तान की साज़िश पर आंखें बंद रखे? क्या शांति एकतरफ़ा प्रक्रिया है? कश्मीर के तमाम अख़बार, बुद्धिजीवी, लेखक सुरक्षा बलों पर तोहमत लगाते रहते हैं, लेकिन कोई वहां के युवाओं को पत्थरबाज़ी छोड़ने की नसीहत नहीं देता। उन्हें गुमराह नहीं होने की सलाह नहीं देता। इस मामले में सुप्रीम कोर्ट का यह सवाल बहुत माइने रखता है कि किसी के लकड़ी के घर पर अगर कोई पेट्रोल बम फेंकेगा, तो घर के लोगों को क्या करना चाहिए?

(लेखक वरिष्ठ स्तंभकार हैं और 28 वर्षों तक मुख्यधारा की सक्रिय पत्रकारिता से जुड़े रहे हैं। कई प्रमुख अख़बारों और टीवी न्यूज़ चैनलों का लंबा अनुभव है)

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