कश्मीर के पत्थरबाज़ों को काउंसिलिंग की ज़रूरत

25 Apr 2017 13:13:44


रवि पाराशर

अच्छी ख़बर है कि 22 अप्रैल को कश्मीर के बडगाम ज़िले में हुई मुठभेड़ में सुरक्षा बलों ने लश्कर के दो आतंकियों को मार गिराया। वैसे तो सुरक्षा बल घाटी में आतंकियों का लगातार सफ़ाया कर रहे हैं, लेकिन अप्रैल के चौथे शनिवार की मुठभेड़ इस माइने में अच्छी ख़बर है कि इस दौरान पत्थरबाज़ सुरक्षा बलों का ध्यान नहीं बंटा पाए। आतंकियों के ख़िलाफ़ कार्रवाई के दौरान नहीं के बराबर युवक जवानों का विरोध जताने के लिए जुट पाए। इससे पहले हर मुठभेड़ के दौरान आतंकियों की मदद के लिए सुरक्षा बलों का ध्यान बंटाने के लिए बड़ी संख्या में पत्थरबाज़ जुट रहे थे।

देश के सेना प्रमुख और जम्मू कश्मीर पुलिस के मुखिया के कड़े बयानों के बाद भी जब पत्थरबाजों के हौसले कम नहीं हुए, तो मुठभेड़ों के दौरान आतंकियों की मदद करने वालों पर सुरक्षा बलों ने सख़्त रवैया भी अख़्तियार किया। इसका ही नतीजा था कि मार्च में घाटी में हुई दो मुठभेड़ों के दौरान चार पत्थरबाज़ युवकों की मौत हो गई। नौ मार्च को पुलवामा ज़िले के त्राल इलाक़े में हुई मुठभेड़ में दो आतंकी मारे गए और एक युवक गोली लगने से जान गवां बैठा। इससे पहले 24 घंटे के दौरान दो आतंकी मारे गए, जम्मू कश्मीर पुलिस का एक जवान शहीद हुआ और तीन पुलिसकर्मी घायल भी हुए। इसके बाद 28 मार्च को बडगाम ज़िले के चाडूरा इलाक़े में मुठभेड़ के दौरान सुरक्षाकर्मियों का घेरा तोड़ने के लिए बड़ी संख्या में पत्थरबाज़ जुटे। उन्हें तितर-बितर करने के लिए कड़ी कार्रवाई करनी पड़ी, जिसमें तीन स्थानीय युवकों की मौत हो गई। एक आतंकी ही मारा जा सका। आतंकियों की मदद के लिए युवकों ने बड़े पैमाने पर पत्थर बरसाए, जिसका नतीजा यह हुआ कि 63 जवान घायल हो गए, जिनमें 43 जवान सीआरपीएफ़ के थे और 20 जम्मू कश्मीर पुलिस के।

बडगाम ज़िले में 22 अप्रैल को हुई मुठभेड़ के दौरान पत्थरबाज़ों की नगण्य संख्या की वजह दो तरह की प्रक्रिया का नतीजा है। पहली तो यही कि सुरक्षा बलों ने आतंकियों की मदद के इरादे से जुटी भीड़ पर सख्ती बरते जाने का साफ़-साफ़ संकेत दिया और दूसरी प्रक्रिया यह कि ऐसे गुमराह युवकों की पहचान कर उन्हें काउंसिलिंग के लिए बुलाया। सख़्ती का जितना सकारात्मक नतीजा नहीं निकला, उतना समझाने-बुझाने की प्रक्रिया का निकला। पता चला है कि घाटी में पत्थरबाज़ों का गिरोह बड़े संगठित तरीक़े से काम कर रहा है। ढाई सौ की संख्या वाले 300 व्हाट्सअप ग्रुप घाटी में सक्रिय थे। इन ग्रुपों के ज़रिए पत्थर जुटाए जाने का काम किया जा रहा था। यह संख्या 75 हज़ार बैठती है। ग्रुपों के लोग पत्थर रेलवे ट्रेक के आसपास से चुरा कर लाते हैं। पुलिस और दूसरे सुरक्षा बलों ने इन ग्रुपों के एडमिन और सदस्यों की पहचान कर उन्हें काउंसिलिंग के लिए बुलाया। उन्हें समझाया गया कि वे आतंकियों की मदद कर आत्मघाती क़दम नहीं उठाएं। बल्कि विकास की मुख्य धारा से जुड़ कर अपना भविष्य बनाएं। इस दिशा में उनकी हरसंभव मदद की जाएगी। 22 अप्रैल की मुठभेड़ के दौरान सुरक्षा बलों के नगण्य विरोध से तो यही लगता है कि पत्थरबाज़ युवकों के ज़ेहन पर सुरक्षा बलों की काउंसिलिंग का असर सकारात्मक पड़ता दिखाई दे रहा है। इस दिशा में इस तरह के दूसरे सकारात्मक क़दम भी उठाए जाने की ज़रूरत है।

कश्मीर के 10 ज़िलों अनंतनाग, बांदीपोरा, बारामूला, बडगाम, गांदेरबल, कुलगाम, कुपवाड़ा, पुलवामा, शोपियां और श्रीनगर की कुल आबादी 69 लाख, सात हज़ार 622 है। यह आंकड़ा 2011 की जनगणना के हिसाब से है। ज़ाहिर है कि अब छह साल बाद इसमें इज़ाफ़ा हुआ होगा। पिछली जनगणना के हिसाब से ही कश्मीर में मुस्लिम आबादी देश में सबसे ज़्यादा 96.40 प्रतिशत है। इस हिसाब से कुल आबादी में से मुसलमान नागरिकों की संख्या 66 लाख, 58 हज़ार, 948 हुई। अगर देश की कुल आबादी में युवाओं का फ़ीसद 65 मानें और कश्मीर के मामले में भी यही औसत फ़ॉर्मूला रखा जाए, तो वहां 30 साल से नीचे के युवाओं की संख्या हुई 43 लाख, 28 हज़ार, 316 बैठती है। पिछली जनगणना के आधार पर कश्मीर में 20 साल से कम उम्र के युवाओं का आंकड़ा है 41 फ़ीसदी। तो यह आंकड़ा हुआ 27 लाख 30 हज़ार, 169। इस हिसाब से पत्थरबाज़ व्हाट्सअप ग्रुपों में शामिल 75 हज़ार युवकों का आंकड़ा काफ़ी कम कहा जा सकता है। क्योंकि यह तथ्य है कि ज़्यादातर पत्थरबाज़ युवकों में 20 साल तक उम्र के ही लड़के शामिल हैं। हाल ही में पैलेट गन के इस्तेमाल के ख़िलाफ़ हुई सुनवाई में सुप्रीम कोर्ट में भी यही तथ्य पेश किया गया।

एक और आंकड़ा राष्ट्रवादियों के दिल को सुकून पहुंचा सकता है। पिछले साल आठ जुलाई को हिज़्ब आतंकी बुहरान वानी के मारे जाने के बाद शुरू हुए विरोध प्रदर्शनों के दौरान कश्मीर में बोर्ड की परीक्षाएं मार्च, 2017 में कराए जाने के लिए काफ़ी प्रदर्शन हुए, लेकिन जम्मू कश्मीर सरकार इसके लिए तैयार नहीं हुई। सरकार ने हालांकि मार्च, 2017 में भी परीक्षाएं दोबारा कराए जाने का विकल्प मुहैया कराया, लेकिन तथ्य यह है कि 95 फ़ीसदी से ज्यादा छात्र पिछले साल नवंबर में आयोजित की गई बोर्ड परीक्षाओं में शामिल हुए। 55 हज़ार से ज़्यादा छात्र दसवीं की परीक्षा में शामिल हुए और 12वीं की परीक्षा 53159 छात्र-छात्राओं ने दी। 12वीं का नतीजा भी पिछले वर्षों के मुक़ाबले आश्चर्यजनक रूप से अच्छा रहा। वर्ष 2015 में 12वीं में 55.18 प्रतिशत छात्र-छात्राएं पास हुए थे, 2016 में नतीजा रहा 57.19 फ़ीसदी। लेकिन 2017 में घोषित किए गए नतीजों में 12वीं में पास होने वालों की संख्या रही 75.45 प्रतिशत। हालांकि यह भी हकीकत है कि इस बार क़रीब पांच महीने पढ़ाई में व्यवधान होने की वजह से आधे सिलेबस से ही परीक्षा ली गई और अपेक्षाकृत आसान सवाल पूछे गए। फिर भी पास प्रतिशत में बढ़ोतरी से साफ़ हो गया कि हड़ताल, पत्थरबाज़ी, स्कूलों में आगज़नी और आतंकी वारदात में इज़ाफ़ा होने के बावजूद मुख्यधारा में शामिल रहने की इच्छा रखने वाले युवा छात्र-छात्राओं ने घर पर ही पढ़ाई पर पूरा ज़ोर दिया और वे अंतत: परीक्षाओं के बहिष्कार के अलगाववादी झांसे में नहीं आए। परीक्षा परिणामों ने यह भी साबित कर दिया कि घाटी के क़रीब एक लाख परिवार अलगाववादियों के नापाक मंसूबों से कोई इत्तेफ़ाक नहीं रखते। यह भी साफ़ हो गया कि महज़ कुछ हज़ार गुमराह युवाओं के बूते पर अलगाववादी और राष्ट्रविरोधी ताक़तें वहां लोकतंत्र में यक़ीन करने वालों को बंधक बनाए हुए हैं।

पत्थरबाज़ युवकों की काउंसिलिंग का अगर सही नतीजा निकल रहा है, तो इस प्रक्रिया को आगे बढ़ाने की ज़रूरत है। फिलहाल 300 पत्थरबाज़ व्हाट्सअप ग्रुप निष्कृय होने की ख़बर है, क्योंकि इंटरनेट सेवाओं पर प्रतिबंध है। लेकिन यह भी सच है कि इंटरनेट सेवाएं अनंतकाल तक बंद नहीं की जा सकतीं। मुख्यधारा में शामिल रहने वाले युवाओं के लिए यह ज़्यादती होगी। पढ़ाई और प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी के लिए आज इंटरनेट सेवा बहाल रहना बहुत ज़रूरी है। लिहाज़ा सुरक्षा एजेंसियों को ऑपरेशन सद्भावना के तहत काउंसिलिंग और दूसरे तरीक़ों से युवाओं को समझाना होगा। काउंसिलिंग उन परिवारों के बड़े लोगों की भी होनी चाहिए, जिनके लड़के लालचवश या किसी तरह की ब्रेन वॉशिंग की वजह से भटककर अलगाववादियों और आतंकियों के मकड़जाल में फंस गए हैं। वैसे पिछले दिनों सुरक्षा बलों के भर्ती कैंपों के प्रति कश्मीरी युवाओं का बढ़ता रुझान भी अच्छे संकेत दे चुका है। इस भरोसे को क़ायम रखने की ज़रूरत है।

 

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