क्या है हुर्रियत कॉन्फ्रेंस की हैसियत?

12 May 2017 13:33:34

रवि पाराशर

गत 9 मई को राष्ट्रीय राइफल्स के जत्थे में अख़नूर में तैनात लेफ़्टिनेंट उमर फ़ैयाज़ की शोपियां में जिस तरह कायरतापूर्वक हत्या कर दी गई, उससे एक बात फिर से साफ़ हो गई है कि कश्मीर में सक्रिय आतंकी केवल गोली की भाषा ही समझते हैं। महज़ 23 साल के नौजवान फ़ैयाज़ पहली बार छुट्टी लेकर मामा के घर शादी में शामिल होने आए थे। इसी दौरान निहत्थे लेफ़्टिनेंट को अगवा कर लिया गया और बाद में गोलियों से छलनी उनका शव मिला। पिछले दिसंबर में उन्हें पहली तैनाती मिली थी।

हाल ही में कुलगाम ज़िले में एक आतंकी के जनाज़े में शामिल आतंकियों ने सरेआम गोलियां चलाकर दहशतगर्दी का संदेश दिया था। साफ़ है कि आतंकी सरकार को गोलियों की ज़ुबान में ही संदेश भेज रहे हैं। सीएम मेहबूबा बातचीत के लिए केंद्र पर कितना भी दबाव बनाएं, आतंकियों और उनके समर्थकों को बातचीत की दरकार बिल्कुल नहीं है। उन्हें लगता है कि वे ताक़त के बल पर सरकार को झुकाने का माद्दा रखते हैं। ऐसे लोगों को यह सवाल ख़ुद से और अपने आकाओं से पूछना चाहिए कि क्या वे दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र की ताक़तवर फ़ौज को बंदूक के ज़रिए झुका सकते हैं?  वह तो मानवाधिकारों का लिहाज़ करते हुए फ़ौज ताक़त का असली इस्तेमाल नहीं कर रही है। आतंकी आम लोगों को डरा-धमका कर उन्हें ढाल बनने के लिए मजबूर नहीं करें, तो आतंकियों के सफ़ाए में बहुत वक़्त नहीं लग सकता।   

हुतात्मा लेफ़्टिनेंट उमर फ़ैयाज़

31 दिसंबर को हंदवाड़ा के चौगल में शहीद हुए जम्मू कश्मीर पुलिस के सिपाही अब्दुल करीम के जनाज़े में क़रीब चार हज़ार लोग शामिल हुए। उनका अंतिम संस्कार उत्तरी कश्मीर के लांगेट में किया गया था। उस वक़्त भी लोग खुलकर कहते सुने गए कि यह जेहाद नहीं आतंकवाद है। इसी तरह लेफ़्टिनेंट फ़ैयाज़ के अंतिम संस्कार में हज़ारों कश्मीरी दुखी मन से शामिल हुए। सुरक्षा बलों के कश्मीरी जवानों के जनाज़े में उमज़ी ग़मग़ीन भीड़ को सकारात्मक संदेश के तौर पर ही देखा जाना चाहिए। हाल ही साथी आतंकी के जनाज़े में जिस तरह हवा में गोलियां चलाकर उसे महिमामंडित करने की कोशिश के दौरान जिस तरह आम लोगों में भगदड़ और चीख़-पुकार मची, उससे भी यही साफ़ होता है कि कश्मीर के बहुसंख्य आम लोगों को अंतिम संस्कारों में जबरन शामिल होने को मजबूर किया जाता है, ताकि दुनिया को यह दिखाया जा सके कि वे उनके साथ हैं। लेकिन हक़ीक़त कुछ और ही है। हाल ही में एक वीडियो में दिख रहा था कि किस तरह आतंक की हिमायत करने वाले युवा पुलिस की भर्ती में शामिल होने वाले युवाओं को यातनाएं दे रहे हैं।

‘कश्मीर समस्या’ शब्द युग्म से सारे भारतीय और पूरी दुनिया परिचित है। जब भी कश्मीर में या फिर पाकिस्तान से जुड़े सीमाई इलाक़ों में देश विरोधी कोई हरक़त होती है, तो बहुसंख्य भारतीय भावनात्मक प्रतिक्रिया करते हैं। लेकिन यह भी सच्चाई है कि देश की आज़ादी को 70 साल हो जाने के बावजूद अभी तक बहुसंख्य भारतीयों के ज़ेहन में बहुत से तथ्य ठीक-ठीक तरह से पैबस्त नहीं हैं। अब जबकि, पाकिस्तान और उसके दोस्त कश्मीर समस्या को अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर मशहूर कर चुके हैं, तब ग्लोबल बिरादरी के स्तर पर बहुत नकारात्मक प्रतिक्रिया भले ही नहीं होती हो, लेकिन भारत के लोगों को इस समस्या और कश्मीर के बारे में सही-सही जानकारी ज़रूर होनी चाहिए। इसके लिए इस ऐतिहासिक प्रसंग की बारीक़ जानकारी देने के लिए केंद्र सरकार को अपनी ओर से कोशिश करनी चाहिए। इसके लिए कश्मीर और इससे जुड़े भारतीय पक्ष को विभिन्न स्तरों पर पाठ्यक्रमों में शामिल करने के बारे में सोचा जा सकता है। प्राथमिक शिक्षा के स्तर पर न सही, इसके लिए 10वीं, 12वीं और उच्च स्तर की पढ़ाई के लिए अलग-अलग कोर्स डिज़ायन किए जा सकते हैं। ऐसा इसलिए करना ज़रूरी है, ताकि भारत के अभिन्न अंग कश्मीर के बारे में देश के नौजवानों के ज़ेहन में सही तस्वीर बने। ऐसा हुआ, तो वे अपने-अपने स्तर पर विश्व बिरादरी के सामने, पाकिस्तान के हिमाइतियों और अलगाववादियों के ख़िलाफ़ मानसिक दबाव के केंद्र के तौर पर काम कर सकें।

जब भी कश्मीर समस्या का ज़िक्र आम भारतीय के सामने होता है, तो हुर्रियत कॉन्फ्रेंस का नाम भी आता है। लोग हुर्रियत के नाम से अच्छी तरह वाक़िफ़ भले हों, उन्हें यह नहीं पता कि कश्मीर समस्या को हल करने की दिशा में इस संगठन की भूमिका असल में है क्या? उन्हें नहीं पता कि ऑल पार्टी हुर्रियत कॉन्फ्रेंस यानी एपीएचसी नाम के असल नाम वाले इस संगठन की कोई सामाजिक, राजनैतिक, सांस्कृतिक या कूटनैतिक औक़ात है भी कि नहीं? यही वजह है कि जब भी कश्मीर में हिंसा होती है, सैनिक शहीद होते हैं और उनके शवों के साथ बर्बरता की जाती है, तो भारतीयों का ख़ून तो खौल उठता है और वे सीमा पार जाकर मार-काट के समर्थन में ऐसा भावनात्मक माहौल बना देते हैं, जिससे लगने लगता है कि हमारे देश की सरकार कश्मीर समस्या को लेकर कुछ नहीं कर रही, हाथ पर हाथ धरे बैठी है।

लोग इतने आग-बबूला हो जाते हैं कि उन्हें लगता है कि पाकिस्तान को कुछ घंटे में ही पूरी तरह नेस्तनाबूद किया जा सकता है, लेकिन हमारी सरकार पता नहीं किस वजह से विवश है? सोशल मीडिया पर सरकार के ख़िलाफ़ भावुक संदेशों की बाढ़ आ जाती है। छुटभैये कवि ऐसे जोशीले गीत मंचों पर चीख-चीख कर पढ़ने लगते हैं कि उन्हें छूट दे दी जाए, तो वे पाकिस्तान में घुसकर उसे सबक़ सिखाने को तैयार हैं। वे फ़ौज को खुली छूट देने की वक़ालत करने लगते हैं। कविताएं और गीत इतने जोशीले होते हैं कि कोई उन्हें सुने, तो एक बार को तो सारे तर्क भूलकर भुजाएं दुश्मन से दो-दो हाथ करने को फड़फड़ाने लगती हैं। बहुत बार भावुकता का स्तर इतना बढ़ जाता है कि हम अपनी सरकार को कायर और डरपोक तक करार देने लगते हैं। जबकि हम जानते हैं कि पिछले साल सितंबर में हमारी सेना ने उरी में अपने कैंप पर हमले का बदला लेने के लिए पीओके में सर्जिकल स्ट्राइक कर पाकिस्तान को करारा जवाब दिया था। इससे पहले 2015 में भी हमारे जांबाज़ सुरक्षा बल म्यांमार के जंगलों में घुसकर वहां चल रहे आतंकी शिविरों को तहस-नहस कर चुके हैं। अपने सुरक्षा बलों के नुकसान और देश विरोधी किसी भी घटनाक्रम पर क्रोध आना लाज़िमी है। लेकिन हमारे राष्ट्रभक्त नौजवानों को समस्या के बारे में तथ्यपरक और तर्कसंगत जानकारी होगी, तो शायद उनके गुस्से का उफान उतना नकारात्मक नहीं होगा, जितना अभी महसूस होता है।

कुछ तथ्यों, आंकड़ों के ज़रिए जम्मू-कश्मीर को समझने की कोशिश करते हैं। मोटे तौर पर यह राज्य तीन हिस्सों में बंटा है। तीनों हिस्से राजनैतिक, सांस्कृतिक, भाषाई, जलवायु और क़रीब-क़रीब हर घटक के हिसाब से एक जैसे नहीं हैं। जम्मू और कश्मीर संभागों में 10-10 ज़िले हैं। लद्दाख में दो ज़िले हैं। जिसे हम ‘कश्मीर समस्या’ कहते हैं, उसका जम्मू और लद्दाख से लेना-देना नहीं है। समस्या की जड़ कश्मीर घाटी है। इसके अलावा पाकिस्तान के अवैध क़ब्ज़े वाले जम्मू-कश्मीर यानी पीओजेके और चीन के क़ब्ज़े वाले जम्मू-कश्मीर यानी सीओजेके का हिस्सा भी विवाद के केंद्र में है। अभी भारत के पास जम्मू-कश्मीर राज्य के रूप में एक लाख, एक हज़ार, 387 वर्ग किलोमीटर ज़मीन है। पाकिस्तान के क़ब्ज़े में जम्मू कश्मीर राज्य का 78 हज़ार 114 वर्ग किलोमीटर हिस्सा है, जबकि चीन के पास 37 हज़ार 555 वर्ग किलोमीटर।

जम्मू संभाग का कुल क्षेत्रफल 26 हज़ार, 293 वर्ग किलोमीटर और आबादी है 53 लाख, पांच हज़ार, 811 है। कश्मीर संभाग का क्षेत्रफल 15 हज़ार, 948 और आबादी 69 लाख, सात हज़ार, 622 है। इसी तरह लद्दाख का क्षेत्रफल 59 हज़ार, 146 वर्ग किलोमीटर और आबादी दो लाख, 90 हज़ार, 492 है। यानी जम्मू और लद्दाख के कुल 85 हज़ार, 439 वर्ग किलोमीटर यानी राज्य के 84.26 प्रतिशत इलाक़े में कुल 56 लाख, 41 हज़ार, 303 लोग रहते हैं। दूसरी तरफ़ कश्मीर संभाग के 15.73 फ़ीसदी हिस्से में क़रीब 13 लाख ज़्यादा लोग रहते हैं। इन आंकड़ों में जनगणना के क़रीब छह साल बाद अच्छा इज़ाफ़ा हुआ होगा। आंकड़ों से जम्मू और लद्दाख के मुक़ाबले कश्मीर में आबादी के घनत्व का अंदाज़ा लगाया जा सकता है। कश्मीर में 96.40 प्रतिशत आबादी यानी ज़्यादातर मुस्लिम धर्म के लोग हैं। घाटी में हिंदू आबादी 2.48 प्रतिशत ही है। जबकि पूरे राज्य की औसत मुस्लिम आबादी 68.31 और हिंदू आबादी 28.45 प्रतिशत है।

मोटे तौर पर बात करें, तो कश्मीर समस्या राज्य की क़रीब 16 फ़ीसदी ज़मीन तक ही सिमटी है। लेकिन माहौल ऐसा बन गया है कि लगता है कि पूरा राज्य ही समस्याग्रस्त है। कश्मीर घाटी के दस ज़िलों में से केवल चार यानी दक्षिणी कश्मीर के बारामूला, कुलगाम, अनंतनाग और शोपियां ही हिंसा के बड़े केंद्र हैं। हिज़्ब कमांडर बुरहान वानी के मारे जाने के बाद पिछले साल 8 जुलाई से शुरू की गई सुनियोजित हिंसा की आग में घाटी के बाक़ी हिस्से को भी चपेट में लेने की साज़िश की गई। इससे पहले आमतौर पर शांत रहने वाले ग्रामीण इलाक़े भी हिंसा की चपेट में आने लगे। वहां कई स्कूल ख़ाक कर दिए गए और सोशल मीडिया के ज़रिए दुष्प्रचार कर माहौल ख़राब करने की कोशिशें अब भी जारी हैं।

90 के दशक की शुरुआत में आतंकी हिंसा का दौर चालू हुआ और ग़ौरतलब है कि इसके बाद ही यानी कश्मीर समस्या की पैदाइश के क़रीब 46 साल बाद 9 मार्च, 1993 को ऑल पार्टी हुर्रियत कॉन्फ्रेंस का गठन किया गया। यानी 46 साल तक कश्मीर में भारत के ख़िलाफ़ आंदोलन चलाने वाले हुर्रियत के विभिन्न घटकों को घाटी में बंदूकों, हथगोलों, मोर्टारों की तड़तड़ाहट शुरू होने के तीन साल बाद ही अलगाववादी विचारों की पुख़्तग़ी के लिए ये होश आ गया कि उन्हें एकजुट हो जाना चाहिए। क्या यह महज़ कोई संयोग हो सकता है? साफ़ है कि फ़ौज के दबदबे वाली पाकिस्तानी हूक़ूमत ने, वहां की ख़ुफ़िया एजेंसी आईएसआई ने और पाकिस्तान में चलाए जा रहे आतंकी कैंपों के शातिर दिमाग़ आकाओं ने एकजुट होकर 1990 के दशक की शुरुआत में कश्मीर में घुसपैठ के ज़रिए आतंकी लड़ाके भेजने शुरू किए। जब उन्होंने यहां स्लीपर सेल विकसित कर लिए, कुछ कश्मीरी नौजवानों को बरगला कर उनके हाथों में हथियार पकड़ा दिए, तो इसके बाद अलगाववादी विचारों को संगठित करने की साज़िश रची गई। हाथ में हथियार तब तक कारगर नहीं हो सकता, जब तक कि दिमाग़ में अलगाव जैसा कोई नकारात्मक मक़सद नहीं कुलबुलाए। ये समझना मुश्किल नहीं है।

गठन के 24 साल बाद अब हुर्रियत कॉन्फ्रेंस में काफ़ी मतभेद उभर चुके हैं। समय-समय पर ये मुखर भी होते हैं। हुर्रियत के धुर कट्टरपंथी धड़े के मुखिया सैयद अली शाह गीलानी के साथ 24 धार्मिक, सामाजिक, राजनैतिक संगठन हैं। इस धड़े को हुर्रियत जी के नाम से जाना जाता है। मीरवाइज़ उमर फ़ारूक़ की अगुवाई वाला गुट भी है, जिसे हुर्रियत एम के नाम से जाना जाता है। अगर हम कश्मीर घाटी के राजनैतिक इदारों पर ध्यान दें, तो ऑल पार्टी हुर्रियत कॉन्फ्रेंस के अलावा वहां कुछ निर्दलीय नेता भी भारत के विरोध में मुखर हैं। इसके अलावा पीडीपी, बीजेपी, कांग्रेस, नेशनल कॉन्फ्रेंस के अलावा वामपंथी नेता भी सक्रिय हैं। वामपंथियों का बेशक कोई जनाधार भले नहीं हो, लेकिन कश्मीर का मीडिया कुछ वामपंथी नेताओं को उतनी ही तवज्जो देता है, जितनी दूसरे मुखर अलगाववादी नेताओं को। इस लिहाज़ से मोटे तौर पर माना जा सकता है घाटी में क़रीब 40 धार्मिक, सामाजिक और राजनैतिक संगठन ज़्यादा सक्रिय हैं। राजनैतिक संगठनों में बीजेपी को छोड़कर बाक़ी सभी संगठन अलगाववादियों के असर में दिखाई देते हैं। पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी यानी पीडीपी जम्मू कश्मीर सरकार में शामिल है, लिहाज़ा फिलहाल अलगाववाद से सावधानीपूर्वक दूरी बनाकर रखना उसकी सियासी मजबूरी है। वैसे चुनाव आयोग के आंकड़े देखे जाएं, हालात चौंकाने वाले हैं। पिछले यानी 2014 के विधानसभा चुनाव लड़ने वालों में निर्दलियों समेत 34 पार्टियां शामिल हैं। 35वीं श्रेणी नोटा वालों की है। ये पूरे राज्य का आंकड़ा है, केवल कश्मीर का नहीं।

फिर भी ख़बरों के मुताबिक़ अगर पीडीपी-बीजेपी की सरकार की मुखिया महबूबा मुफ़्ती ने हाल ही में दिल्ली में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मिलकर अलगाववादी नेताओं से बातचीत की वक़ालत की, तो कम से कम उन्हें कोई न कोई ऐसा तर्क ज़रूर सामने रखना चाहिए, जिससे साबित हो सके कि कश्मीर में हुर्रियत नेताओं का कोई वास्तविक वजूद है भी या नहीं। भारतीय लोकतंत्र में यक़ीन नहीं रखने वाले किसी भी तबक़े से क्या बातचीत की जा सकती है? जो हर हाल में यह माने बैठे हैं कि वे तो पाकिस्तान के हिस्से हैं, उनसे बातचीत अगर की भी जाए, तो उसका क्या कोई नतीजा निकल सकता है? बातचीत से तो बीच का ही रास्ता निकलता है। हुर्रियत कॉन्फ्रेंस को अगर बातचीत की मेज़ पर आना है, तो उसे यह ज़िद छोड़ने का सार्वजनिक ऐलान पहले करना ही पड़ेगा कि वो पाकिस्तान के साथ मिलने का दिवास्वप्न देखना छोड़ भी सकती है। ऐसा ऐलान अगर हुर्रियत कर भी दे, तो भी बातचीत करना या नहीं करना देश की सरकार का फ़ैसला होगा, कोई जबरन या बंदूकें तानकर किसी को बातचीत के लिए मजबूर कैसे कर सकता है?

हुर्रियत कॉन्फ्रेंस ने हर बार जम्मू-कश्मीर में लोकतांत्रिक चुनावों के बहिष्कार का ही ऐलान किया है। भारत दुनिया का सबसे मज़बूत लोकतांत्रिक देश है। ऐसे में हर बार चुनाव बहिष्कार का मतलब है कि आप बुरी तरह देशद्रोही भावना के शिकार हैं या कम से कम देश हित में तो नहीं ही सोचते हैं। सवाल यह है कि जो तबक़ा राज्य की जनता की नुमाइंदगी किसी भी स्तर पर नहीं करता, उससे बातचीत क्यों की जाए? और क्या की जाए  या किस मक़सद और किस एजेंडे पर की जाए? अगर हम मान लें कि घाटी में सक्रिय क़रीब 40 इदारों को बराबर समर्थन हासिल है, तो महज़ 10 ज़िलों में किसके कितने सपोर्टर होंगे, यह आसानी से समझा जा सकता है।

दूसरी बात, कश्मीर के लोगों ने एक बार भी हुर्रियत कॉन्फ्रेंस की चुनाव बहिष्कार की कॉल का सौ फ़ीसदी समर्थन नहीं किया। ज़्यादातर लोग वोट डालने निकलते हैं। विधानसभा चुनाव, 2014 में तो पूरे राज्य में 65.52 प्रतिशत वोट डाले गए। पांचवें चरण में सर्वाधिक 76 फ़ीसदी और चौधे चरण में सबसे कम 49 फ़ीसदी वोट पड़े। चुनाव बहिष्कार करने वाले क़रीब 40 संगठनों को छोड़ दें, तो पूरे राज्य में निर्दलियों के अलावा 34 पार्टियां चुनाव में शामिल हुईं। नोटा के तहत भी काफ़ी लोगों ने वोटिंग मशीन का बटन दबाया। ऐसे में क्या हुर्रियत कॉन्फ्रेंस को अपने गिरेबां में झांककर देखने की ज़रूरत नहीं है कि उसकी चुनाव बहिष्कार की अपील का क्या हश्र हुआ? राज्य के ज़्यादातर लोग वोट डालने निकले। जो नहीं निकले, वे सारे के सारे हुर्रियत कॉन्फ्रेंस के असर की वजह से नहीं निकले, यह मानना सरासर मूर्खता होगी। अब जब जम्मू-कश्मीर के लोग ही हुर्रियत के वजूद को बुरी तरह नकारते हैं, तो फिर केंद्र सरकार को उसे तवज्जो क्यों देनी चाहिए? क्यों मुख्यमंत्री महबूबा मुफ़्ती को यह लगना चाहिए कि केंद्र अलगाववादियों से बातचीत करे?

दरअस्ल, ग़ैर एडीए सरकारों ने हुर्रियत के अलगाववादियों के बिना सोचे-समझे सिर पर बैठाया। यह भी कहना ग़लत नहीं होगा कि बहुत सोच-समझ कर सिर पर बैठाया। ये दोनों विरोधाभासी बातें हैं। लेकिन समझने की ज़रूरत है। घाटी में ख़ून-ख़राबा बढ़ने के बाद जब अपनी ओर से कोशिश करने का दबाव बढ़ा, तो ग़ैर-एनडीए सरकारों ने हुर्रियत नेताओं को तरज़ीह देना शुरू किया। बहुत सी ख़बरें मिल जाएंगी, जिनमें कहा गया है कि उन्हें तवज्जो देकर देश के ख़ज़ाने की बंदरबांट की गई। इस्लामाबाद और पीओके में भी हुर्रियत संगठन सक्रिय है। उनके भी हित सधे। पाकिस्तान को भी कश्मीर में गीलानी एंड पार्टी के रूप में सधे हुए मोहरे मिल गए। वहां से भी पैसा आने लगा, यहां भी सुर्ख़ियों में रहने लगे, तो अलगाववादियों को लगने लगा कि वाक़ई उनकी कोई ज़रूरत दोनों तरफ़ से है। अब केंद्र की एनडीए सरकार ने अगर राष्ट्र हितों के हिसाब से अलगाववादियों और पाकिस्तान को आइना दिखा दिया है, तब उनकी दुविधा बढ़ गई है। यही वजह से पिछले साल, जुलाई के बाद से सैनिक ठिकानों पर हमले और कश्मीर घाटी के नागरिक इलाक़ों में बढ़ी हिंसा हताशा और बौखलाहट के रूप में नज़र आ रही है।

कश्मीर घाटी में अलगाववाद के अलाव सुलगाने वाले हुर्रियत नेता क्या कश्मीरी युवाओं से भेदभाव नहीं कर रहे हैं? वे पत्थरबाज़ों को तो शह देते हैं, लेकिन देश पर जान न्यौछावर करने वाले कश्मीरी बेटों की शहादत पर एक शब्द बोलना भी गंवारा नहीं समझते। हुर्रियत कॉन्फ्रेंस की आधिकारिक वेबसाइट पर भारतीय फ़ौज के जांबाज़ लेफ्टिनेंट उमर फ़ैयाज़ की कायरता से हत्या किए जाने की निंदा नहीं की गई है। जबकि इससे एक दिन पहले 8 मई को हुर्रियत ने पुरज़ोर मांग की है कि हिंसा करने के दौरान गिरफ्तार किए गए सभी कश्मीरी छात्रों को तुरंत रिहा किया जाना चाहिए। क्या सैयद अली शाह गीलानी, मीरवाइज़ उमर फ़ारूक़ और यासीन मलिक 23 साल के लेफ़्टिनेंट उमर फ़ैयाज़ को कश्मीर का बेटा नहीं मानते? अगर ऐसा है, तो उन पर धिक्कार है। कश्मीर का बेटा फ़ैयाज़ पूरे भारत का लाड़ला बेटा था और सभी भारतीयों को उस पर हमेशा गर्व रहेगा।

 

(लेखक वरिष्ठ स्तंभकार हैं और 28 वर्षों तक मुख्यधारा की सक्रिय पत्रकारिता से जुड़े रहे हैं। कई प्रमुख अख़बारों और टीवी न्यूज़ चैनलों का लंबा अनुभव है)

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