यह कश्मीर हमारा है, जहाँ अबतक 40,000 से ज्यादा जाने चली गयी हैं

02 May 2017 13:14:00


विनोद मिश्रा

यह कश्मीर हमारा है जहाँ अबतक चालीस हजार से ज्यादा जाने चली गयी हैं I यह जान हिन्दुस्तानियो की गयी है यह जान पाकिस्तान से भेजे गए आतंकवादियों की गयी है । इससे अलग कई हजार जाने भारत -पाकिस्तान के बीच तीन जंग में भी गयी है। आप चाहे तो कह दे इतनी मौते सीरिया और इराक़ में महज एक वर्ष  में हुई है।  कश्मीर का यह आंकड़ा पिछले 27 साल का है (होम मिनिंस्टरी के ताजा आंकड़े से खुलसा ) ।  हम यह भी कह सकते हैं दुनिया के और देशों में महज चंद वर्षो में आतंकवाद ने 3 लाख से ज्यादा जाने ली हैं।  कश्मीर का आतंकवाद और दुनिया दूसरे मुल्को के खुनी जंग में काफी फ़र्क़ है। एक जम्हूरी मुल्क हिंदुस्तान अपने सनकी पड़ौसी के उन्मादी जनरलो का डंक वर्षो से  झेल रहा है जो सीधी लड़ाई लड़ नहीं सकता लेकिन ब्लीडिंग इंडिया बाय थाउजेंड्स कट्स से हमें लहुलहान कर रखा है।
 
तो क्या हम सचमुच पाकिस्तान की साजिशो का सॉफ्ट टारगेट बन गए है या इस मुल्क की जम्हूरियत कश्मीर में पैर जमा नहीं पाई है ? इसलिए अब्दुल्लाह से  लेकर मुफ़्ती तक,लोन, गिलानी, फ़ारूक़, मलिक भी हमारे चाचा बने हुए है, कोई कहता है इससे बात करो कोई कहता है पाकिस्तान से  बात करो। सियासत ऐसी कि वादी के 5 जिलों के मुठ्ठी भर लोग 17 जिलों की आबादी को घोड़ा समझ लिया है और अपने को सवार। कश्मीर का मतलब जम्मू -कश्मीर और लदाख से है लेकिन आपने कभी लद्दाख और जम्मू से किसी मुख्यमंत्री का नाम नहीं सुना होगा।  आवादी और क्षेत्रफल के हिसाब से जम्मू ,कश्मीर से काफी बड़ा है लेकिन एम एल ए और एम पी की सीट कश्मीर को ज्यादा मिली है ,लद्दाख का  क्षेत्रफल जम्मू और श्रीनगर से तीन गुना बड़ा है लेकिन उसकी नुमाइंदगी सबसे कम।  क्यों भाई ! कश्मीर ही चाचा क्यों लगता है ? हुर्रियत कांफ्रेंस के साबिक चेयरमैन मौलाना अब्बास अंसारी से मैंने पूछा चाचा आतंकवादी भी तो आपके अपने है फिर वे आप लोगों पर हमला क्यों करते है, कई हुर्रियत के लीडरों की जान आतंकवादियों ने ली है।  अब्बास साहब का जवाब था भाई "कश्मीर में किस गन से कौन मरा ढूंढते रह जाओगे " इससे समझने की जरूरत है। चाचा ने भतीजे की जान ली, भतीजे ने चाचा से बदला लिया। हर जमात की अपनी तंजीम अपना बन्दुक। यानी कश्मीर  में अलहदगी पसंद की सियासत बारूद से तय होती है जम्हूरीअत से नहीं। 
 
राजधानी दिल्ली और श्रीनगर में कुछ बड़े  स्टेट्समैन की जमात (माफ़ कीजिए यह टिपण्णी सबके लिए नहीं है ) ट्रैक टू- थ्री डिप्लोमेसी के नाम पर कई वर्षों से अपनी दूकान चलाते रहे हैं। कभी शातिर नौकरशाह अपनी नाकामी छुपाने के लिए राउंड टेबल कांफ्रेंस तो कभी स्पेशल कमिटी बनाकर मुल्क को चूना लगाते रहे है। आज फ़ारूक़ अब्दुलाह जिस बातचीत की पैरवी कर रहे है वे वर्षों तक इसी  सिस्टम के हिस्सा रहे है क्या कोई समाधान निकाल पाए ? आज  उन्हें बताने की जरुरत है कि वे फेल रहे है जम्हूरियत की जड़ों में मठ्ठा उन्होंने भी डाला है। अटल जी की  सरकार में यशवंत  सिन्हा कद्दावर मंत्री रहे हैं गिलानी को छोड़कर बांकी सभी 23 अलगावादी जमातों से उनकी सरकार ने बात की थी यही सिलसिला मनमोहन सिंह की सरकार ने भी जारी रखी थी,क्या नतीजा निकला ?  हुर्रियत की जमाते आज तक अपना एजेंडा सरकार के सामने नहीं रख पायी। यानी जो जमाते पाकिस्तान हाई कमिशन की  मर्जी से एक कदम आगे नहीं बढ़ा सकती उससे बात करने की वकालत सिर्फ मीडिया के लिए खबर हो सकती है कश्मीर का इससे कोई भला नहीं होगा। समस्या का समाधान जम्हूरियत में है भारत के गणतंत्र की मजबूती में है। क्यों आजतक इस देश के सियासतदानो ने कश्मीर के 36,000 पंचायत प्रतिनिधियों की सुध नहीं ली। क्यों मकामी एम एल ए ने  पंचायत प्रधानों का हक़ छीन लिया है ? क्यों  देश का जी एस टी जम्मू कश्मीर में लागू नहीं हो सकता। देश की तरक़्क़ी का फायदा कश्मीर को मिले इससे बड़ा समाधान कुछ हो नहीं सकता। 
 
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं) 

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