एक सी है आतंकी मूसा और गीलानी की सोच

31 May 2017 14:25:10

रवि पाराशर

कश्मीर घाटी के हालात बिगाड़ने, वहां ख़ून-ख़राबा कर अंतर्राष्ट्रीय बिरादरी के सामने मानवाधिकारों की दुहाई देकर घड़ियाली आंसू बहाने के लिए पाकिस्तान सरकार, वहां की ख़ुफ़िया एजेंसियों और आतंकी संगठनों से बेशुमार फंडिंग लिए जाने के पर्दाफ़ाश के बाद अब ऑल पार्टी हुर्रियत कॉन्फ्रेंस यानी एपीएचसी ने दिखावे की ऐसी दलदली कार्रवाई की है, जिससे आरोप और पुख़्ता होते नज़र आ रहे हैं। हुर्रियत चेयरमैन सैयद अली शाह गीलानी ने एक निजी न्यूज़ चैनल के स्टिंग ऑपरेशन में फंसे एपीएचसी में शामिल नेशनल फ्रंट को संगठन से निलंबित कर दिया है। स्टिंग ऑपरेशन में फ्रंट का नेता नईम ख़ान पाकिस्तान से पैसे आने की बात स्वीकारते साफ़ सुनाई दे रहा है। नईम ख़ान को फ़ौरी तौर पर संगठन से निलंबित किए जाने के फ़रमान में यह भी कहा गया है कि निजी न्यूज़ चैनल ने वीडियो से छेड़छाड़ की है।


सवाल यह है कि अगर ख़ुद गीलानी यह मानते हैं कि निजी चैनल ने वीडियो या ऑडियो से छेड़छाड़ की है
, तो फिर उन्हें नैतिकता के आधार पर नईम ख़ान को एपीएचसी से सस्पेंड करने की क्या ज़रूरत थी? नईम ख़ान अगर दूध का धुला है, तो फिर उसे सस्पेंड करने के नाटक की क्या ज़रूरत है? दूसरी बात यह है कि पाकिस्तान से हुर्रियत नेताओं और कश्मीर में सक्रिय आतंकियों को पैसे मिलने की बात नई बात नहीं है। ये आरोप अक्सर लगते हैं और बहुत पहले से लगते आ रहे हैं, तो क्या गीलानी ने अपने संगठन के किसी नेता को इससे पहले भी सस्पेंड किया है? साफ़ है कि ऐसी कार्रवाई पहले इसलिए नहीं करनी पड़ी, क्योंकि साफ़ तौर पर पैसे लेने की बात स्वीकारने जैसा पुख़्ता सुबूत पहले कभी सामने नहीं आया। अब नए मामले में नईम ख़ान को सस्पेंड कर गीलानी ने एक तरह से ख़ुद ही साबित कर दिया है कि पाकिस्तान परस्त हुर्रियत किसी नैतिक, सामाजिक, राजनैतिक आधार पर नहीं, बल्कि किसी आपराधिक संगठित गिरोह की तरह बाक़ायदा सुपारी लेकर भारत के ख़िलाफ़ काम कर रही है। वहां के युवाओं को गुमराह कर रही है। हथियारों के साथ-साथ उन्हें नशे का गुलाम बनाने का काम कर रही है। सुरक्षा बलों को निशाना बनाने का काम कर रही है। कुल मिलाकर हुर्रियत कॉन्फ्रेंस और आतंकी संगठनों में साठगांठ बहुत पहले से ही है, यह बात अब साबित हो चुकी है। यह कहना सही होगा कि आतंकी संगठन असल में हुर्रियत कॉन्फ्रेंस की साज़िश की खंदकों की सियासी आड़ लेकर घाटी में निर्दोष लोगों और सुरक्षा बलों पर गोलियां बरसा रहे हैं।

आतंकी कमांडर ज़ाकिर मूसा के कश्मीर में इस्लामी शासन स्थापित करने के मंसूबे भी सामने आ चुके हैं और आतंकी संगठन हिज़्ब-उल-मुजाहिदीन से उसकी बर्ख़ास्तगी या कहें कि संगठन से ख़ुद उसके किनारा करने की ख़बरें भी सभी लोग जानते हैं। घाटी में सर्वाधिक सक्रिय आतंकी संगठनों में से एक के कश्मीर कमांडर ने अगर ऐलानिया तौर पर बग़ावत की है, तो इसका क्या मतलब हो सकता है? ख़ासतौर पर इस तथ्य की रौशनी में कि 15 साल पहले भी इस तरह की बग़ावत हिज़्ब में हुई थी और उस कमांडर की हत्या हो गई थी, मूसा अगर बाक़ायदा बयान जारी कर रहा है, तो इसका एक बड़ा मतलब तो यही निकल रहा है कि उसे घाटी में बड़े पैमाने पर समर्थन हासिल है। यह समर्थन किसका हो सकता है? यह समर्थन बीजेपी, पीडीपी या कांग्रेस की तरफ़ से तो हो नहीं सकता। मौक़ा परस्त नेशनल कॉन्फ्रेंस के पिता-पुत्र फ़ारूक़ अब्दुल्ला और उमर अब्दुल्ला का समर्थन हो सकता है, लेकिन ये बयानवीर केवल गाल-बजाऊ समर्थन ही दे सकते हैं। किसी आतंकी संगठन के महत्वपूर्ण पद पर रहने के बाद उसे चुनौती देने की हिम्मत कोई तब ही कर सकता है, जब उसे भरोसा हो कि आसानी से उसका कुछ नहीं बिगड़ पाएगा। कश्मीर में ऐसा कोई हाथ हो सकता है, तो वह हुर्रियत कॉन्फ्रेंस के अलावा और किसी का नहीं हो सकता।

इस पूरे घटनाक्रम से एक और बात साफ़ हो गई है कि कश्मीर की भारत से आज़ादी के पैरोकार तमाम आतंकी संगठन इसे सियासी समस्या के तौर पर ही विश्व बिरादरी के सामने पेश करना चाहते हैं, लेकिन उनका असल मक़सद कुछ और ही है। उनके और ऑल पार्टी हुर्रियत कॉन्फ्रेंस के चेयरमैन सैयद अली शाह गीलानी के मक़सद एक जैसे ही हैं, भले ही कश्मीर और शेष भारत के लोगों के साथ-साथ अंतर्राष्ट्रीय मंचों को बहकाने के लिए बातें कुछ भी की जाएं। हुर्रियत कॉन्फ्रेंस की आधिकारिक वेबसाइट देखी जाए, तो यह बात भी साफ़ हो जाती है कि यह संगठन गीलानी का ही जेबी संगठन है। साइट के होम पेज पर चंदे के लिए जो बैंक अकाउंट नंबर दिया गया है, वह किसी संगठन का नहीं, बल्कि गीलानी का निजी अकाउंट है। होम पेज पर ऊपर और नीचे गीलानी के भाषणों, प्रेस वक्तव्यों के सौ-सौ वीडियो अपलोड किए गए हैं। साइट का अड्रैस भले ही हुर्रियत कॉन्फ्रेंस के नाम से हो, लेकिन असल में यह गीलानी की पार्टी तहरीक--हुर्रियत जम्मू-कश्मीर की वैबसाइट है। पार्टी का लोगो भी साफ़-साफ़ संदेश दे रहा है। लोगो में दुनिया के ग्लोबनुमा आकार में हरे रंग की आउटलाइनों के साथ एक खुली किताब रखी दिखाई गई है। ज़ाहिर है कि यह किताब भारत का संविधान नहीं हो सकती। अगर इस किताब को इस्लाम धर्म से जुड़ी पवित्र किताब क़ुरान माना जाए, तो संदेश साफ़ है कि गीलानी की पार्टी पूरी दुनिया के इस्लामीकरण के ख़्वाब देखती है। हालांकि किसी भी स्तर पर किसी भी धर्म की आलोचना नहीं की जानी चाहिए। इस्लाम को मानने वाला कोई व्यक्ति अगर यह चाहता है कि पूरी दुनिया में उसकी सोच का फैलाव हो, तो इसमें किसी को कोई आपत्ति नहीं होनी चाहिए। लेकिन अगर अपनी विचारधारा के प्रचार-प्रसार के लिए कोई कश्मीरी अलगाववादियों जैसे रास्ते अख़्तियार करे, तो फिर उसकी न केवल भर्त्सना की जानी चाहिए, बल्कि हरसंभव तरीक़े से उसे प्रतिबंधित और दंडित किया जाना चाहिए। ख़ून-ख़राबा, देश के साथ विश्वासघात, देश के भविष्य युवाओं को गुमराह करना, नकारात्मकता फैलाना, दुश्मन देश के पैसे से देश के विरुद्ध षड्यंत्र करना किसी धर्म में नहीं सिखाया जाता है। तो फिर ये सारी नकारात्मक गतिविधियां किसी धर्म की स्थापना या प्रचार-प्रसार का ज़रिया नहीं हो सकतीं।

गीलानी की पार्टी तहरीक--हुर्रियत की वैबसाइट में इस सवाल का जवाब दिया गया है कि किसी को उसमें क्यों शामिल होना चाहिए। पार्टी के मुताबिक़ “आज दुनिया का हर पांचवां देश मुस्लिम देश है, लेकिन उनकी हालत ठीक नहीं है। ताक़तवर देश मुस्लिम देशों को लूट रहे हैं। आपको इन सारी समस्याओं के हल की कोशिश कर अपनी ज़िंदगी को ख़ुशहाल बनाना चाहिए। अगर ऐसा है, तो आपको तहरीक--हुर्रियत के घोषणापत्र में इसका जवाब मिल जाएगा।“ आगे कहा गया है कि “आज अगर मुसलमान सबसे ज़्यादा कष्ट में हैं, तो इसकी वजह साफ़ है। वजह है कि हम वह मिशन भूल चुके हैं, जिसके लिए मुस्लिम बिरादरी/देश (Ummah) स्थापित किए गए। हमें अब अल्लाह और पैगंबरों पर भरोसा नहीं है। अब हम सांसारिक उपलब्धियों के लिए ही उपक्रम करते हैं। हम अपने दीन (इस्लाम) के लिए पैसा और वक़्त नहीं देना चाहते। मुसलमान क़ुरान पढ़ते हैं और अल्लाह के प्रति श्रद्धा दिखाते हैं, लेकिन उनकी आज्ञाओं का निरादर करने में हिचकिताते नहीं हैं। मुसलमानों को तहरीक--हुर्तियत का संदेश है कि वे अल्लाह और उनके पैगंबरों के सामने पूरी तरह आत्म-समर्पण कर दें और ख़ुद को सचेत कर लें कि उन्हें क़ुरान और पैगंबरों के ज़रिए अल्लाह के निर्देशों (Sunnah/सुन्नत) को न मानने का कोई अधिकार नहीं है। मुसलमान फिर जान लें कि इस्लाम को विजयी बनाने के लिए ज़िंदगी और पैसे की क़ुर्बानी कोई बड़ी क़ीमत नहीं है। हालांकि यह लक्ष्य सबके एक पार्टी के बैनर तले आए बिना हासिल करना मुश्किल है।“

पार्टी के बारे में वैबसाइट पर आगे कहा गया है कि “इस ख़ुदाई काम को आगे बढ़ाने के लिए ही तहरीक--हुर्रियत बनाई गई है और जैसा कि समझा जाता है, यह कोई राजनैतिक पार्टी नहीं है, जिसका मुख्य मक़सद चुनाव जीतना होता है। यह धार्मिक पार्टी भी नहीं है....। हमारा एक ही लक्ष्य है अल्लाह के सामने हर तरीक़े से समर्पित होकर उनकी ख़ुशी जीतना। .... संक्षेप में इस वैश्विक क्रांति के लिए हमारा नारा है- धरती पर जो कुछ भी है, वह सर्वशक्तिमान अल्लाह का ही है।” “इस तरफ़ से ऊंघ रहे लोगों को जगाकर ट्रेनिंग के ज़रिए उन्हें संगठित ताक़त में बदलना तहरीक--हुर्रियत के काम का हिस्सा है। समाज में इस्लामिक विचारों को लोकप्रिय बनाना, लोगों के समूह (जेहादियों?) के ज़रिए नास्तिकों/क़ाफ़िरों (atheists) को ख़ासतौर से सत्ता से हटाकर अल्लाह को मानने वालों को राजगद्दी पर बैठाना पार्टी का काम है। यह साफ़ होना चाहिए कि तहरीक--हुर्रियत देश को इस तरह के ऐसे समाज-कल्याण वाले देश के रूप में बदलने के लिए प्रतिबद्ध है, जहां लोग चुनाव के ज़रिए सरकार चुन सकें या उसे हटा सकें।“ यहां ग़ौर करने वाली बात यह है कि हुर्रियत ने “देश” शब्द का इस्तेमाल भारत के लिए तो नहीं किया होगा। अगर “देश” शब्द भारत के लिए इस्तेमाल किया गया है, तो तहरीक--हुर्रियत का मक़सद उतना ही क़ाबिल--ऐतराज़ है, जितना कि इस शब्द को कश्मीर से जोड़ने पर जताया जाना चाहिए।

साफ़ है कि गीलानी की पार्टी चुनाव को जायज़ मानती है। ऐसे में सवाल यह है कि फिर वह कश्मीर में होने वाले विधानसभा और लोकसभा चुनावों के बहिष्कार का ऐलान क्यों करती रही है? वैसे तो संभव नहीं है, लेकिन समझने के लिए अगर मान लिया जाए कि गीलानी की मंशा के मुताबिक़ कश्मीर पाकिस्तान में शामिल हो जाए, तो सवाल यह है कि क्या तब भी तहरीक--हुर्रियत पाकिस्तान की चुनाव प्रणाली का बहिष्कार करेगी? गीलानी की पार्टी आख़िर किस तरह के चुनाव की वकालत कर रही है? क्या यह बात जानबूझकर विश्व बिरादरी की आंखों में धूल झौंकने के लिए लिखी गई है, ताकि कश्मीर समस्या को सियासी जामा पहने हुए दिखाया जा सके? ताकि कश्मीर में इस्लामी शासन लागू कराने की मंशा पर पर्दा डाला जा सके?

उपरोक्त विवरण से साफ़ हो जाता है कि सैयद अली शाह गीलानी की पार्टी आख़िरी तौर पर न केवल कश्मीर पर अल्लाह के शासन की हक़दार है, बल्कि पूरी दुनिया पर ही इस्लाम के शासन की तरफ़दारी करती है। क्या यह सपना कभी हक़ीक़त में बदल सकता है? बड़ा सवाल तो यही है कि क्या इस मंशा को सपने की श्रेणी में शामिल किया भी जा सकता है? साफ़ है कि आतंकी सरगना ज़ाकिर मूसा और गीलानी की सोच में कोई मौलिक अंतर नहीं है। हथियारबंद मूसा ने अपनी मंशा साफ़तौर पर ज़ाहिर कर दी, लेकिन अलगाववादी दिमागदार गीलानी की तरफ़ से सियासत की अमीर आड़ लेकर ज़हरीले तीर चलाए जा रहे हैं।

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