कश्मीर में ये क्या और क्यों हो रहा है?

08 May 2017 14:12:32


रवि पाराशर

टाइम्स ऑफ़ इंडिया अख़बार ने चौंकाने वाली ख़बर प्रकाशित की है कि कश्मीर में क़रीब 50 सऊदी और पाकिस्तानी चैनल निजी ऑपरेटरों के ज़रिए घर-घर देखे जा रहे हैं। इन चैनलों में ज़ाकिर नाइक का पीस टीवी चैनल भी शामिल है, जिस पर भारत सरकार ने प्रतिबंध लगा रखा है। दूसरे विदेशी चैनल भी केंद्र सरकार की इजाज़त के बिना देश में कही भी नहीं दिखाए जा सकते। इन चैनलों के ज़रिए भारत विरोधी दुष्प्रचार घाटी के घर-घर में देखे जा रहे हैं। दिलचस्प बात यह है कि पीडीपी-बीजेपी की सरकार के कुछ विभागों में भी ये प्रसारण दिखाने वाले निजी ऑपरेटरों की सेवाएं ली जा रही हैं। अखबार ने केबल टीवी व्यवसाय से जुड़े एक शख़्स के हवाले से बताया है कि अकेले श्रीनगर में सरकारी लाइसेंसशुदा डीटीएच सेवाओं के अलावा 50 हज़ार निजी केबल कनेक्शन धड़ल्ले से चल रहे हैं और इसकी वजह सऊदी और पाकिस्तानी चैलन ही हैं।

ज्यादातर पाकिस्तानी चैनलों पर कश्मीर में हिंसा करने वालों को नायकों की तरह पेश किया जाता है और मुठभेड़ में मारे जाने वाले आतंकियों को शहीद का दर्जा दिया जाता है। इतना ही नहीं सऊदी चैनलों पर कट्टरपंथी मौलानाओं के प्रवचनों में उन्हें दकियानूसी बातें कहते हुए सुना जा सकता है। मसलन, मुस्लिम महिलाओं को पतियों के सामने हर तरह से आत्म समर्पित रहना चाहिए। यहां तक कि घर से निकलने के लिए भी उन्हें पतियों की इजाज़त लेनी चाहिए। अख़बार के मुताबिक़ कुछ पुलिस अधिकारी तो यहां तक कहते हैं कि सऊदी और पाकिस्तानी चैनलों के अलावा कुछ भारतीय चैलन भी ख़बरों को तोड़मरोड़ कर और अलगाववादियों के पक्ष पेश करने से बाज़ नहीं आ रहे हैं। चैनल इस तरह की ख़बरें दिखा रहे हैं, जिनसे सुरक्षा बलों की छवि ख़राब हो।

केंद्र सरकार के संबंधित विभाग ने अब इस बारे में ध्यान देने की बात कही है। जब केंद्रीय सुरक्षा बल और जम्मू कश्मीर पुलिस घाटी में 70 साल से इतनी बड़ी क़वायद कर रही है, तब इस तरह की ख़ुफ़िया चूक बड़े सवाल उठाती है। सीमाई इलाक़ों और घाटी में पाकिस्तान की शह पर हो रही हिंसा में देश के जवान साज़िशों का लगातार शिकार हो रहे हैं, देश की रक्षा के लिए सर्वोच्च क़ुर्बानियां दे रहे हैं, तब इस तरह की ख़बर किसी भी आम नागरिक को ग़ुस्से से भरने के लिए काफ़ी है। हाल ही में पत्थरबाज़ों को उकसाने वाले क़रीब 300 व्हाट्सअप ग्रुपों के बारे में भी ख़ुलासा हुआ था। बहुत से ग्रुपों के एडमिन पाकिस्तानी हैं, ऐसी भी जानकारी सामने आई थी। तब भी दावा किया गया था कि घाटी में ऐसे ग्रुपों और सोशल मीडिया के दूसरे ज़रियों पर प्रतिबंध लगाने का फ़रमान जारी किया गया है। लेकिन कई इलाक़ों से ख़बर आई कि वहां प्रतिबंधित सोशल मीडिया आसानी से देखा-पढ़ा-सुना और अग्रसारित किया जा रहा है। बड़ा सवाल यही है कि जब पश्चिमी देशों में इन्फ़ॉर्मेशन टेक्नोलॉजी के क्षेत्र में भारतीय प्रतिभाओं का लोहा माना जा रहा हो, तब हम आईटी प्रबंधन में देश में इतने कमज़ोर क्यों साबित हो रहे हैं?

क्या इसे छोटी-मोटी चूक कहा जा सकता है? कश्मीर और सीमाई इलाक़ों में हमारे सैनिक दिन-रात एक कर रहे हैं, दुश्मनों से बहादुरी से लड़ते हुए शहादत दे रहे हैं, तब क्या आईटी और प्रसारण प्रबंधन में इतनी बड़ी चूक को किसी भी स्तर पर बर्दाश्त किया जा सकता है? हरगिज़ नहीं। छत्तीसगढ़ के सुकमा में नक्सलियों ने 25 जवानों की जान ले ली। नक्सली सैकड़ों की संख्या में थे, अत्याधुनिक हथियारों से लैस थे। तब भी ख़ुफ़िया तंत्र की नाकामी की बात सामने आई थी। इतना ही नहीं सीआरपीएफ़ की उस टुकड़ी की कमांड की नासमझी और लापरवाही की बात भी सामने आई। सुकमा ऐसी जगह नहीं है, जहां नक्सलियों ने पहली बार हमला किया हो। उस इलाक़े में ही नक्सली कई बार जवानों को निशाना बना चुके हैं। इसके बावजूद हमारा तंत्र कोई सबक़ नहीं लेता। ऐसी हर वारदात के बाद कड़े क़दम उठाने की बात बड़े ज़ोरशोर से कही जाती हैं। कुछ दिन तक ऐसा लगता भी है कि सरकारें और अधिकारी जी-जान से जुट गए हैं, लेकिन फिर समय बीतने के साथ ही सब कुछ भुला दिया जाता है।

मई के शुरू में ही कश्मीर के कृष्णा घाटी सेक्टर में देश के दो जवानों के सिर काटकर ले जाने की पाकिस्तान की घिनौती करतूत सामने आई। पाकिस्तान की तरफ़ से युद्धविराम के उल्लंघन की ख़बरें भी अब रोज़मर्रा की बात है। भारत भी जवाबी कार्रवाई करता है। दोनों तरफ़ से सुरक्षा बलों के जवानों की जान जाने की भी ख़बरें आती हैं। लेकिन अगर कोई भारतीय जवान अधिकारियों की लापरवाही, साज़-ओ-सामान की कमी, ख़ुफ़िया तंत्र की कमज़ोरी की वजह से दुश्मन का निशाना बनकर जान गंवा देता है, तो फिर उसकी भरपाई कभी नहीं हो सकती। हो सकता है कि सुकमा में सीआरपीएफ़ के 25 जवानों की शहादत के बाद देश में केंद्र के प्रति ग़ुस्से की भावना का माहौल बनने के बाद पाकिस्तानी फ़ौज ने आतंकियों की मदद से भारतीय जवानों की सिर काटने की साज़िश इस इरादे से रची हो कि इससे लोगों का गुस्सा सरकार के प्रति और भड़केगा।

शरीर से जान निकल जाए, तो फिर उसके साथ छेड़छाड़ करने पर कोई कष्ट तो नहीं पहुंचता है, लेकिन शवों को क्षत-विक्षत करने जैसी जघन्य अमानवीय हरक़तों का मक़सद तो यही हो सकता है कि जनभावनाओं को व्यवस्था के प्रति भड़काया जाए। यह भी सही है कि अगर कोई आत्मघात पर ही उतर आए, तो उसे इतना ही रोका जा सकता है कि नुकसान कम से कम हो। लेकिन यह भी तभी संभव है, जब हम हर वक़्त पूरी तरह तैयार और चौकन्ने हों। यह भी सही है कि पाकिस्तानी फ़ौज हमारी दुश्मन है, तो वह हर तरह से, हर समय हमारे सैनिकों को नुकसान पहुंचाना चाहेगी ही और यह भी हो सकता है कि भारतीय सैनिकों के साथ इस तरह की बर्बरता के काम को वहां की सरकार की मंज़ूरी नहीं हो। हम सभी जानते हैं कि पाकिस्तान की हुक़ूमत अपनी तरफ़ से अगर कुछ सकारात्मक सोचे भी, तो वहां का फ़ौजी निजाम ऐसा सपने में भी नहीं होने देगा। इस लिहाज़ से हम जानते हैं कि पाकिस्तान की कथित लोकतांत्रिक तरीक़े से चुनी गई सरकार की औक़ात क्या है? जो भी हो, जिस वजह से भी हो, यह तो सच ही है कि हमारे दो सैनिकों के सिर काट लिए गए और ऐसा पहली बार नहीं हुआ है। ऐसे में भारतीय जनमानस में उबाल तो आएगा ही। ठीक है कि हमारी सेना बदला लेने में सक्षम है और वह ऐसा करेगी भी। पिछले साल उरी हमले के बाद सितंबर में सर्जिकल स्ट्राइक कर भारतीय सेना ने पाकिस्तान को करारा जवाब दिया ही है। इसके अलावा हमें यह भी नहीं भूलना चाहिए कि 10 जून, 2015 को घात लगाकर किए गए हमले में 20 जवानों की शहादत का बदला लेने के लिए हमारे सैनिकों ने म्यामांर की सीमा में घुसकर आतंकियों के कुछ कैंप पूरी तरह बर्बाद कर दिए थे। अब सेना प्रमुख कह रहे हैं कि हमारी फ़ौज सही वक़्त पर पाकिस्तान के ख़िलाफ़ कार्रवाई करेगी, तो देश के लोगों को उन पर भरोसा है।

भारत के सुरक्षा बल जवाबी कार्रवाई में सक्षम हैं, लेकिन अगर समय-समय पर बरती जाने वाली ढिलाई बंद कर दी जाए, सैनिकों को ज़रूरत का हर सामान मुहैया करा दिया जाए, तो हमारे वीर सपूतों को इतनी क़ुर्बानियां नहीं देनी पड़ेंगी। इसके अलावा असल ज़रूरत सभी विभागों, केंद्र और संबंधित सभी सरकारों के बीच श्रेष्ठ तालमेल की भी है। जब कश्मीर जैसे संवेदनशील और देश की प्रतिष्ठा और गौरव से जुड़े सबसे बड़े मसले की बात हो और प्रतिबंध के बावजूद इंटरनेट सेवाएं जारी रहने या फिर उकसाऊ-भड़काऊ विदेशी चैनलों के कश्मीर के घर-घर में चलने की ख़बरें आती हैं, तब भरोसा कहीं डगमगाने लगता है। आज़ादी के 70 साल बाद कम से कम अब तो ऐसा नहीं लगना चाहिए कि हम इतने बड़े सवालों से जूझते हुए ऐसे लगें कि जैसे गुड्डे-गुड़िया के ब्याह का खेल खेल रहे हैं। 

 

(लेखक वरिष्ठ स्तंभकार हैं और 28 वर्षों तक मुख्यधारा की सक्रिय पत्रकारिता से जुड़े रहे हैं। कई प्रमुख अख़बारों और टीवी न्यूज़ चैनलों का लंबा अनुभव है)

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