कश्मीर में मानवाधिकार हनन का महाझूठ

19 Jun 2017 15:53:12


रवि पाराशर

जिनेवा में भारतीय समयानुसार 16 जून की देर रात संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद के 35वें सत्र में कश्मीर के अलगाववादी नेता और दूसरे नकारात्मक बुद्धिजीवी कश्मीर में मानवाधिकारों के उल्लंघन के लिए भारतीय फौज को ज़िम्मेदार ठहरा रहे थे, उसके कुछ घंटे बाद ही कश्मीर में लश्कर के आतंकी पुलिस कर्मियों की जीप पर अंधाधुंध गोलियां चला रहे थे। 16 जून को अंजाम दी गई इस वारदात में दक्षिणी कश्मीर के अनंतनाग ज़िले के अछाबल थाने के प्रभारी सब इंसपेक्टर समेत जम्मू कश्मीर पुलिस के छह जवान शहीद हो गए।  

जिस वक़्त कश्मीर घाटी में नफ़रत और देश के ख़िलाफ़ हिंसा का यह बर्बर हमला चल रहा था, उससे कुछ पहले देश विरोधी कश्मीरी प्रतिनिधिमंडल के नुमाइंदे यूएनएचआरसी में झूठ भर-भर कर उगल रहे थे। यूथ फ़ोरम ऑफ़ कश्मीर (वाईकेएफ़) के कार्यकारी निदेशक अहमद क़ुरैशी ने कहा कि भारत ने कश्मीर के लोगों के प्रति आधिकारिक तौर पर जंग छेड़ रखी है। क़ुरैशी के मुंह से ज़हर भरा यह झूठ निकलने के कुछ ही घंटे बाद लश्कर के आतंकी जान गंवा चुके छह पुलिसकर्मियों की लाशों के पास पहुंचे होंगे। क़ुरैशी ने यह भी कहा कि कश्मीर में आत्मनिर्णय समेत नागरिक और सियासी अधिकारों के लिए दुनिया का सबसे बड़ा आंदोलन नौजवान लड़के-लड़कियां चला रहे हैं, लेकिन भारत उन्हें यातनाएं देकर, उनकी हत्या कर आंदोलन को कुचलना चाहता है, तो लगता है कि इस बयान की रौशनी में ही आतंकियों ने निर्जीव पड़े पुलिसकर्मियों के चेहरे विकृत कर दिए होंगे।

संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद के 35वें सत्र में क़ुरैशी यहीं नहीं रुके। उन्होंने एक और झूठ बोला। कहा कि कश्मीर के आंदोलन में लड़कियां भी शामिल हैं, लेकिन शांतिपूर्ण विरोध का स्वागत करने के बजाए दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र निहत्थी महिलाओं पर बर्बर ताक़त का इस्तेमाल कर रहा है। सत्र में ऑल पार्टी हुर्रियत कॉन्फ्रेंस के नेता हसन बाना भी झूठ बोलने में पीछे नहीं रहे। वे बोले कि स्कूलों और विश्वविद्यालयों के छात्र-छात्राएं भारतीय हमलों के सबसे ज़्यादा शिकार हो रहे हैं। एमनेस्टी इंटरनेशनल के हवाले से बानी ने कहा कि भारत कश्मीर की नौजवान पीढ़ी को अघोषित नीति के तहत निशाना बना रहा है। कश्मीरी प्रतिनिधिमंडल के नेता अल्ताफ हुसैन वानी ने तो सबसे बड़ा झूठ बोला। वानी के मुताबिक़ दूसरे विश्व युद्ध में नागरिकों की मौत की दर केवल पांच फ़ीसदी थी, लेकिन कश्मीर में यह दर 80 प्रतिशत तक पहुंच गई है।

अनंतनाग ज़िले में जम्मू कश्मीर पुलिस के छह जवानों की हत्या के कुछ वक़्त पहले कुलगाम ज़िले के अरवानी इलाक़े में सुरक्षा बलों और पुलिस के जवानों ने लश्कर के स्थानीय कमांडर जुनैद मट्टू और उसके एक साथी को ढेर कर दिया था। माना जा रहा है कि पुलिसकर्मियों की हत्या उसका ही बदला लेने के लिए की गई। जिस वक़्त मट्टू की घेरेबंदी चल रही थी, मुठभेड़ स्थल पर आतंकियों को भगाने में मदद करने के लिए काफ़ी पत्थरबाज़ जमा हो गए। उन्हें रोकने के लिए सुरक्षा बलों को ताक़त का इस्तेमाल करना पड़ा और गोली लगने से 14 साल के अहसन डार और 34 साल के मुहम्मद अशरफ़ खार की जान चली गई। दो नागरिकों की मौत दुर्भाग्यपूर्ण है। लेकिन सवाल यह है कि सुरक्षा बलों के लाख समझाने के बावजूद अगर स्थानीय युवक आतंकियों की मदद करने से बाज़ नहीं आते, तो ऐसा क्यों हो रहा है? इसके लिए भारतीय सेना या जम्मू कश्मीर पुलिस नहीं, बल्कि कश्मीर और पाकिस्तान में सक्रिय अलगाववादी ताक़तें ही ज़िम्मेदार हैं। ऐसी हर मौत की ज़िम्मेदारी कश्मीर में सक्रिय नकारात्मक ताक़तों के ही सिर जाती है। सवाल यह भी है कि क्या केवल किसी नागरिक का ही मानवाधिकार होता है? सुरक्षा बलों में शामिल जवान क्या आख़िरी तौर पर मनुष्य नहीं होते? देश के क़ानून के मुताबिक़ अपनी या दूसरे की संपत्ति और जान की सुरक्षा के लिए किसी नागरिक को हमलावर की जान लेने का अधिकार है। सवाल यह है कि क्या पत्थरबाज़ों की तरफ़ ध्यान बंटने पर सुरक्षा बलों के जवान आतंकियों की गोली का निशाना बन जाएं? हर व्यक्ति के अधिकार हैं, लेकिन देश की सुरक्षा के क्रम में उठाए जाने वाले क़दमों के बीच ऐसे किसी अधिकार की वकालत नहीं की जा सकती।

अनंतनाग के अछाबल में पुलिस की जीप पर घात लगाकर हमला किया गया। आतंकियों को पुलिस के इस मूवमेंट की ख़बर रही होगी। हमले में पुलिसकर्मियों को जवाबी कार्रवाई का वक़्त नहीं मिला। उनका वाहन भी बख़्तबंद नहीं था। हमले में जम्मू कश्मीर पुलिस के सब इंसपेक्टर फ़िरोज़ डार, बडगाम ज़िले के निवासी सिपाही शारिक़ अहमद और तनवीर अहमद, अछाबल के शेराज़ अहमद, अनंतनाग के आसिफ़ अहमद और सब्ज़ार अहमद की जान चली गई। थाना इंचार्ज फ़िरोज़ डार पुलवामा ज़िले में अवंतीपोरा के डोगरीपुरा इलाक़े के रहने वाले थे। उनकी उम्र 32 साल थी और परिवार में उनकी पत्नी के अलावा छह और दो साल की दो बच्चियां हैं। क्या इन सभी के कोई मानवाधिकार नहीं हैं? क्या दूसरे जवानों के परिवारों के कोई मानवाधिकार नहीं हैं? हुर्रियत के नेता क्या फ़िरोज़ डार की मासूम बच्चियों की निष्कपट आंखों से आंखें मिला सकते हैं? बच्चियों को तो अभी यही समझ में नहीं आएगा कि उनके पिता कितनी कायराना साज़िश के शिकार हुए। अलगाववादी क्या अनजाने में ही शहीद हो गए दूसरे सिपाहियों के परिवार वालों का दर्द समझ पाएंगे? यह कोई मुठभेड़ नहीं थी। फिर अलगाववादी नेताओं ने अपने राज्य की पुलिस के छह सिपाहियों की मौत और उनके शवों को विकृत करने वालों की निंदा क्यों नहीं की? हैरानी की बात है कि राज्य की मुख्य धारा की पार्टी नेशनल कॉन्फ्रेंस के कार्यकारी अध्यक्ष पूर्व मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने भी इन बर्बर हत्याओं की निंदा नहीं की। उनके बयान में सिर्फ़ इस बात की निंदा की गई है कि पुलिसकर्मियों के शव क्षत-विक्षत किए गए। शवों को विकृत करने को उन्होंने कायराना हरक़त बताया है। यानी अलगाववादी नेताओं और नेशनल कॉन्फ्रेंस के लिए जम्मू कश्मीर पुलिस के जवानों की मौत कोई माइने नहीं रखती।

कुलगाम ज़िले के अरवानी इलाक़े में लश्कर आतंकी जुनैद मट्टू के साथ मुठभेड़ के दौरान दो नागरिकों की मौत के विरोध में ऑल पार्टी हुर्रियत कॉन्फ्रेंस के नेतृत्व यानी सैयद अली शाह गीलानी, मीरवाइज़ उमर फ़ारूक़ और यासीन मलिक की तरफ़ से 17  जून को कश्मीर घाटी में बंद की अपील तो की गई, लेकिन पुलिस के जवानों की हत्या के विरोध में एक शब्द भी उनके मुंह से नहीं निकला। जम्मू कश्मीर पुलिस के मुखिया एस पी वैद्य ने ज़रूर संवेदनशील बयान दिया। वैद्य ने कहा है कि चाहे पुलिस के जवानों की जान जाए या नागरिक मारे जाएं या फिर आतंकी, कुल मिलाकर कश्मीरी ही मारे जा रहे हैं। उन्होंने पुलिस के जवानों की हत्या को इंसानियत की हत्या करार दिया है।

अलगाववादी पुलिस के जवानों की हत्या की निंदा करें या नहीं करें, यह बहुत माइने नहीं रखता। लेकिन अब इतना तय है कि आतंकवादी और अलगाववादी ताक़तों की साज़िशों से तंग आ चुके घाटी के लोगों मन में इस जघन्य और नृशंस हत्याकांड की वजह से हिंसा के प्रति नफ़रत और भड़केगी। हमने देखा है कि पहले भी आतंक की गोलियों से शहीद हुए जम्मू कश्मीर के बहादुर जवानों के जनाज़ों पर हज़ारों की संख्या में स्थानीय लोग उमड़े हैं। आंतकियों को अब यह समझ लेना चाहिए कि इस तरह की वारदात को अंजाम देकर वे अपने पैरों पर ही कुल्हाड़ी मार रहे हैं। किसी की जान जाने के बाद उसके शरीर के साथ कोई भी हरक़त की जाए, उसे किसी तरह की तकलीफ़ नहीं हो सकती, लेकिन शव को विकृत करने से उससे जुड़े समाज को बड़ी मानसिक तकलीफ़ पहुंचती है। कश्मीर के अंदर शायद इस तरह की यह पहली वारदात है और यहीं से आतंकियों के प्रकट सामाजिक विरोध का रास्ता धड़ाक से खुल सकता है। अगर आतंकी यह समझते हैं कि इस तरह सुरक्षा बलों की मदद कर रहे कश्मीरियों को डराया-धमकाया जा सकता है या जम्मू कश्मीर पुलिस के जवानों का हौसला तोड़ा जा सकता है, तो वे अंतत: ग़लत साबित होंगे।

 

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