घाटी के जांबाज़ों से दहशत में आतंकवादी

19 Jun 2017 16:11:52


रवि पाराशर

जम्मू कश्मीर के हालात की हक़ीक़त बयां करने वाली कुछ महत्वपूर्ण ख़बरों पर आमतौर पर हमारा ध्यान नहीं जाता। ऐसी ही कुछ ख़बरों में से एक है कि 15 जुलाई को तड़के क़रीब साढ़े चार बजे जम्मू कश्मीर के सांबा सेक्टर में चार संदिग्ध आतंकवादियों को स्थानीय लोगों ने देखा। तुरंत पुलिस को ख़बर की गई और आनन-फानन में इलाक़े में तलाशी अभियान शुरू कर दिया गया। दूसरी ख़बर है कि जम्मू कश्मीर और दूसरे सीमावर्ती राज्यों से हाल के दिनों में पाकिस्तानी ख़ुफ़िया एजेंसी आईएसआई के 13 जासूसों को गिरफ्तार किया गया है। ये सभी आईएसआई के स्लीपर सेल से जुड़े हैं। स्पीपर सेल यानी ऐसे स्थानीय लोग, जो किसी लालच की वजह से पाकिस्तानी ख़ुफ़िया एजेंसी की प्रत्यक्ष या परोक्ष मदद करते हैं। यानी सेना की गतिविधियों, सैन्य इलाक़ों के नक्शों और अहम ठिकानों से जुड़ी बारीक़ जानकारी उस तक पहुंचाते रहते हैं और ज़रूरत पड़ने पर घुसपैठ कर भारत में घुसे या फिर स्थानीय आतंकियों को पनाह और दूसरी ज़रूरी सुरक्षा मुहैया कराते हैं।

इन दोनों ही ख़बरों से साफ़ हो जाता है कि अब जम्मू कश्मीर के आम लोग आतंकियों के बारे में सुरक्षा बलों को इनपुट देने में हिचक नहीं रहे। वे आतंकी धमकियों से डर नहीं रहे हैं, बल्कि आतंकवादी हरक़तों से परेशान होकर सुरक्षा बलों की मदद करने लगे हैं। लेकिन देश भर में मीडिया में आ रही ख़बरों को देखकर यही लगता है कि कश्मीर घाटी के युवा केवल हिंसक गतिविधियों में लिप्त हैं। इस लिहाज़ से मीडिया संस्थानों को अपने कवरेज की समीक्षा ज़रूर करनी चाहिए। मीडिया कवरेज के सिलसिले में एक और अहम बात यह है कि मुख्यधारा के मीडियाकर्मियों को बहुत सी बारीक़ जानकारी का अभाव है। मसलन, हर तरह के तलाशी अभियान, मुठभेड़, कर्फ्यू लगाए जाने, हड़तालों के दिनों में सड़कों पर अवरोध लगाए जाने और पत्थरबाज़ी की कवरेज में यह स्पष्ट नहीं किया जाता कि अक्सर अग्रिम मोर्चे पर जम्मू कश्मीर पुलिस के जवान ही तैनात होते हैं। टीवी-रेडियो पर ख़बरें देखी-सुनी जाएं या अख़बारों में पढ़ी जाएं, हर बार यही लगता है जैसे जम्मू कश्मीर में पुलिस का कोई वजूद है ही नहीं, वहां सुरक्षा से जुड़े सारे काम सेना और केंद्रीय अर्धसैनिक बल ही कर रहे हैं। 15 जून को सांबा सेक्टर में चार संदिग्ध हथियारबंद देखे जाने की ख़बर मैंने जिस चैनल पर देखी, उसके रिपोर्टर ने ज़रूर ज़िम्मेदारी का परिचय दिया। रिपोर्टर ने फ़ोन पर बताया कि स्थानीय लोगों ने पुलिस को संदिग्धों के देखे जाने की जानकारी दी और पुलिसकर्मी बिना वक़्त गंवाए घेरेबंदी और तलाशी अभियान में जुट गए। यही ख़बर जब दूसरे चैनलों पर मैंने देखी, तो क़रीब-क़रीब सभी एंकर यही कह रहे थे कि संदिग्धों का इनपुट मिलने के बाद सेना ने तलाशी अभियान शुरू कर दिया है, चप्पे-चप्पे की छानबीन की जा रही है, वगैरह-वगैरह...।

अब आप सोचेंगे कि ख़बर की इन दो तरह की अभिव्यक्ति में फ़र्क़ क्या है? बहुत बड़ा फ़र्क़ है। असल में कश्मीर में सक्रिय अलगाववादी ताक़तें, पाकिस्तान सरकार, वहां की ख़ुफ़िया एजेंसियां और सेना अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर यह प्रोपेगेंडा करने में जुटी है कि कश्मीर में भारतीय सेना मानवाधिकारों का जमकर उल्लंघन कर रही है। सेना के जवान कश्मीरियों का क़त्ल-ए-आम कर रहे हैं। सेना के जवान कश्मीरी लड़कियों के साथ बर्बरता से रेप करते हैं, वगैरह-वगैरह। जबकि ऐसे आरोपों में कोई सच्चाई नहीं है। यह ज़रूर सच है कि कभी-कभी क्रॉस फ़ायरिंग में किसी आम कश्मीरी की मौत हो जाती है या ग़लतफ़हमी की वजह से कोई निर्दोष जवान गिरफ्तार कर लिया जाता है। लेकिन ऐसा हर मामला सेना से ही जुड़ा हो, यह सच नहीं है। जम्मू कश्मीर में आबादी वाले सभी इलाक़ों में क़ानून-व्यवस्था क़ायम करने का पहला काम राज्य पुलिस का ही है। हालात बिगड़ने के बाद पुलिस के अनुरोध पर सेना या अर्धसैनिक बल आते हैं। आबादी वाले सभी इलाक़ों में आतंकियों के ख़िलाफ़ मुठभेड़ों में जम्मू कश्मीर पुलिस भी कंधे से कंधा मिलाकर काम करती है। इस लेख में सेना और पुलिस के बीच विभाजन रेखा खींचने का अर्थ यह नहीं लगाया जाना चाहिए कि ऐसा कहा जा रहा है कि बर्बरता सेना नहीं, बल्कि पुलिस करती है।

असल में अधिसंख्य मामलों में बर्बरता न तो पुलिस करती है, न ही सेना, बल्कि बर्बरता करते हैं आतंकवादी। लेकिन अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर जम्मू कश्मीर के लोगों की बहुलता वाली पुलिस को बदनाम करने का मसला जमता नहीं है, लिहाज़ा भारतीय सेना की छवि को निशाना बनाया जाता है और सेना के बूते कश्मीर पर भारत के जबरन क़ब्ज़े का बेमानी और ग़ैरक़ानूनी मुद्दा हवा में उछाला जाता है। विडंबना की स्थिति यह है कि अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर मानवाधिकारों की रक्षा की दुहाई देने वाले एमनेस्टी इंटरनेशनल जैसे संगठन इन मिथ्या आरोपों को तरज़ीह दे रहे हैं। इस लिहाज़ से बहुत ज़रूरी है कि मुख्यधारा की न्यूज़ एजेंसियों, टीवी न्यूज़ चैनलों, अख़बारों, पत्रिकाओं और डिजिटल मीडिया यानी देश के कुल मीडिया और सोशल मीडिया का सार्थक इस्तेमाल करने वाले भारतीय नागरिकों को जम्मू कश्मीर में क़ानून-व्यवस्था से जुड़े हर मसले में सेना को घसीटने की प्रवृत्ति से बचना चाहिए। जम्मू कश्मीर में अगर सेना और केंद्रीय अर्धसैनिक बल आतंकियों की कमर तोड़ने में लगे हैं, तो राज्य पुलिस के जांबाज़ भी पूरी बहादुरी और देश प्रेम के जज़्बे के साथ क़ुर्बानियां देने में पीछे नहीं हैं। जिस तरह हम सेना के जवानों की बहादुरी के क़िस्से प्रचारित-प्रस्तारित करते हैं, उसी तरह हमें आतंकवाद और भ्रष्टाचार के ख़िलाफ़ जम्मू कश्मीर पुलिस की कामयाबियों की दास्तानों को शेष भारत के सामने लाना चाहिए। इसके लिए मीडिया संस्थानों को अपने कर्मियों को ट्रेनिंग देने की ज़रूरत है। सेना, अर्धसैनिक बलों और जम्मू कश्मीर पुलिस से पीआर विभागों और जम्मू कश्मीर की गतिविधियों में दिलचस्पी रखने वाले ग़ैर-सरकारी संस्थानों को मीडिया के लोगों तक यह संदेश पहुंचाने की ज़रूरत है।

बहरहाल, हाल ही के दिनों में आतंकियों के कुछ वीडियो भी यही साबित करते हैं कि वे जम्मू कश्मीर पुलिस से बुरी तरह आतंकित हैं और उन्हें घाटी के आम लोगों से सहयोग नहीं मिल रहा है। गत 13-14 जून को लश्कर के स्थानीय कमांडर बशीर लश्कर का एक वीडियो इसी संदर्भ में लिया जा सकता है। ऐसा पहली बार हुआ है कि घाटी में लश्कर के किसी स्थानीय आतंकी ने वीडियो संदेश जारी किया हो। इससे पहले हिज़्ब-उल-मुजाहिदीन के वीडियो ही सामने आते रहे हैं। बशीर लश्कर फ़ौज की वर्दी में है उसके सामने धार्मिक किताब, दो एके राइफ़लें, ग्रेनेड और पिस्तौल रखी दिखाई दे रही है और वह कह राज्य पुलिस के जवानों और अधिकारियों से कह रहा है कि वि तन्ख़्वाह के तौर पर महज़ चंद रुपए और प्रमोशन पाने के लालच में दीन यानी धर्म का साथ नहीं दे रहे हैं। अगर उन्हें पैसा ही चाहिए, तो पुलिस की नौकरी छोड़कर आतंकी संगठनों में शामिल हो जाएं। इसके लिए उन्हें अच्छा पैसा दिया जाएगा। वीडियो में कहा गया है कि लोग मुजाहिदों और हुर्रियत यानी आज़ादी पसंदों का साथ दें। अगर वे फिर भी बाज़ नहीं आएंगे, तो नतीजे ठीक नहीं होंगे। सुरक्षा एजेंसियों की लगातार कोशिश है कि आतंकी संगठनों और हुर्रियत में फूट डाली जाए, ताकि हमारे मंसूबे कामयाब न हो सकें।  इस वीडियो से साफ़ हो जाता है कि आतंकी जम्मू कश्मीर पुलिस की मुस्तैद कार्रवाई से बेहद डरे हुए हैं।

हाल के दिनों के एक और वीडियो का ज़िक्र भी कर लिया जाए। उस वीडियो में नज़र आ रहा है कि आतंकी कुछ स्थानीय युवकों को यातनाएं दे रहे हैं। वह वीडियो उन दिनों का है, जब सेना में भर्ती के लिए बड़े पैमाने पर कश्मीरी युवक और युवतियां सामने आ रहे थे। वीडियो में प्रताड़ित किए जा रहे ऐसे ही कुछ युवक हैं। इन्हें यातनाएं देकर आतंकी बाक़ी कश्मीरी युवकों को डरा रहे हैं कि वे किसी भी तरह पुलिस या सेना की तरफ़दारी न करें। ज़ाहिर है कि ऐसा बड़े पैमाने पर हो रहा होगा, तभी आतंकियों को इस तरह का वीडियो जारी करने की ज़रूरत पड़ी। यानी युवा आतंक की कमर घाटी के युवा और दूसरे लोग भी तोड़ हैं और आतंकी इससे बुरी तरह घबराए हुए हैं। उन्हें स्थानीय स्तर पर समर्थन मिलना कम होता जा रहा है, तो अमन पसंद लोगों के लिए इससे अच्छी और क्या बात होगी?

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