‘एम’ उदारवादी है, तो ‘जी’ कैसा होगा?

27 Jun 2017 12:27:17

मीरवाइज़ उमर फ़ारूक़

रवि पाराशर

श्रीनगर में जामिया मस्जिद के बाहर जम्मू कश्मीर पुलिस के डीएसपी मोहम्मद अयूब पंडित की पीट-पीट कर हत्या कर दी गई। कहा जा रहा है कि हुर्रियत नेता मीरवाइज़ उमर फ़ारूक़ उस वक्त मस्जिद के अंदर थे। हालांकि ख़ुद मीरवाइज़ ने इस बात को ग़लत बताया है और कहा है कि वि इस हत्याकांड के बाद मस्जिद पहुंचे थे। ऐसा भी शायद पहली बार हुआ है कि मीरवाइज़ ने जम्मू कश्मीर पुलिस के किसी जवान की हत्या पर अफ़सोस जताया हो। उन्होंने डीएसपी अयूब की हत्या को ग़ैर-इस्लामी बताया है। हत्या की जांच जारी है और दो आरोपी पकड़े जा चुके हैं। इसे बड़ी साज़िश भी कहा जा रहा है और ऐसा समझना ग़लत भी नहीं है। हाल के दिनों में कश्मीर घाटी में जम्मू कश्मीर पुलिस ने पत्थबाज़ों और आतंकियों के ख़िलाफ़ सख़्त कार्रवाइयां की हैं। इस वजह से इस तबके के मन में पुलिस के जवानों के प्रति नकारात्मक भाव आया है। 13-14 जून को तो लश्कर के आतंकी बशीर लश्कर ने बाक़ायदा वीडियो जारी कर जम्मू कश्मीर  पुलिस के जवानों से अपील की कि वे अपने आतंकी भाइयों का साथ दें। सरकार से तनख़्वाह लेने की बजाए उन्हें लश्कर-ए-तैयबा के पेरोल पर आने की अपील की गई। बहरहाल, अभी तक किसी जवान की हत्या पर दुख नहीं जताने वाले मीरवाइज़ ने अगर डीएसपी अयूब की हत्या पर अफ़सोस जताया है, तो यह चोर की दाढ़ी में तिनके जैसा ही है।

इंग्लैंड में चैंपियंस ट्रोफी के फाइनल मुकाबले में भारत पर पाकिस्तान की जीत के तुरंत बाद ऑल पार्टी हुर्रियत कॉन्फ्रेंस के नेता मीरवाइज़ उमर फ़ारूक़ के लिए ईद आ गई। फ़ारूक़ को आम तौर पर अलगाववादी नेताओं के उदारवादी धड़े का अगुवा माना जाता है। घाटी की नकारात्मक सियासत में मीरवाइज़ की अच्छी हैसियत है, यह इससे ही साबित होता है कि उनके धड़े को बाक़ायदा ‘हुर्रियत एम’ कहा जाता है और कट्टरपंथी धड़े को सैयद अली शाह गीलानी के नाम पर ‘हुर्रियत जी’ कहा जाता है।  बड़ा सवाल यह है कि पाकिस्तान क्रिकेट टीम को बधाई देने वाला कोई नेता भारत के प्रति उदार रवैया रखने वाला करार दिया जा सकता है?

हाल ही में श्रीनगर सीट पर लोकसभा चुनाव के दौरान आत्मरक्षा के लिए सेना ने एक पत्थरबाज़ को जीप से बांध लिया था। इसका वीडियो नेशनल कॉन्फ्रेंस के नेता उमर अब्दुल्ला ने सोशल मीडिया पर अपलोड किया, तो तमाम अलगाववादी नेता और आतंकवादी तिलमिला गए और सेना के ख़िलाफ़ तीखे बयानों की बाढ़ आ गई। वैसे चुनाव प्रचार के दौरान पत्थरबाज़ों के समर्थन में उमर के पिता पूर्व केंद्रीय और जम्मू कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री फ़ारूक़ अब्दुल्ला ने भी कम आग नहीं उगली थी।

यह मसला सोशल मीडिया पर उछलने के बाद सेना ने जांच की घोषणा की और आख़िरी तौर पर ऐसा फ़ैसला करने वाले मेजर को क्लीनचिट दे दी गई। न केवल क्लीनचिट दी गई, बल्कि उस मेजर के रणकौशल की सार्वजनिक प्रशंसा भी की गई। छद्म युद्ध में भारतीय सेना ने जिस तरह मानव ढाल का कुशल और तात्कालिक प्रयोग किया, उसके ख़िलाफ़ हुर्रियत नेता मीरवाइज़ का ज़हरीला बयान आप सुन लेंगे, तो उमर फ़ारूक़ के उदारवादी धड़े के नेता होने की आपकी अरसे से पली हुई धारणा पल भर में काफ़ूर हो जाएगी। आपकी चेतना आपसे झनझनाने वाले सवाल करेगी कि अगर कश्मीर समस्या के संदर्भ में मीरवाइज़ को आज उदारवादी करार दिया जा सकता है, फिर तो ‘उदार’ शब्द के माइने ही बदल दिए जाने चाहिए।  बड़ा सवाल यह है कि अगर मीरवाइज़ को उदार कहा जा सकता है, तो फिर कट्टरपंथी सैयद अली शाह गीलानी की अगुवाई वाले गुट की भावनाएं भारत के प्रति कितनी नकारात्म होंगी? मीरवाइज़ का बयान सुनकर आप गणित के रिवर्स मैथड से इसे आसानी से समझ सकते हैं।

इन्हीं कथित उदारवादी हुर्रियत नेता मीरवाइज़ ने चैंपियस ट्रोफ़ी के सेमीफ़ाइनल में इंग्लैंड को हराने पर मीरवाइज़ ने ट्वीट कर पाकिस्तान क्रिकेट टीम को बधाई दी। ट्वीट में लिखा गया कि आतिशबाज़ी का शोर सुनकर पता चला कि पाकिस्तान जीत गया। साफ़ है कि पाकिस्तान के जीतने पर आतिशबाज़ी का इंतज़ाम हुर्रियत ‘एम’ ने ही किया होगा, तभी उन्हें उसकी जीत का इल्म हो गया। अब ख़बरें हैं कि कश्मीर में अमन बहाली के लिए इन्हीं की सरपरस्ती वाले गुट से बातचीत के संकेत मिल रहे हैं। यह सही है कि हुर्रियत के गठन के बाद मीरवाइज़ के सुर गीलानी के मुक़ाबले लचीले थे। मीरवाइज़ ने तब भारत के साथ बातचीत के पक्ष में माहौल बनाया, जबकि गीलानी गुट पाकिस्तान के बिना भारत से किसी तरह की बातचीत का पक्षधर नहीं रहा। लेकिन इधर के दिनों में जिस तरह मुख्यधारा की कश्मीरी सियासत करने वाली नेशनल कॉन्फ्रेंस के कर्ता-धर्ताओं के तेवरों में तीक्ष्ण बदलाव आया है, उसी तरह मीरवाइज़ के सुर भी तो नहीं बदल गए? और क्यों बदल गए? क्या यह खाल बचाने की मौक़ापरस्ती है? भारत की जीत पर तो मीरवाइज़ की तरफ़ से बयान जारी किया ही नहीं जा सकता, क्योंकि अगर ऐसा किया गया, तो यह हुर्रियत ‘एम’ की सियासत के ताबूत में आख़िरी कील पैबस्त होने जैसा होगा।  

कथित उदारवाद के स्पष्ट अनुदारवाद या कट्टरपंथ में बदलते जाने को समझने के लिए हाल ही का एक और महत्वपूर्ण घटनाक्रम अहम कड़ी साबित हो सकता है। पाकिस्तान सरकार, वहां की ख़ुफ़िया एंजेंसी, सेना, आतंकी संगठनों और दूसरे मुस्लिम देशों से मोटी रक़में लिए जाने का स्टिंग ऑपरेशन सामने आने के बाद हुर्रियत नेताओं में खलबली मची हुई है। इस सिलसिले में नेशनल इन्वेस्टीगेशन एजेंसी यानी एनआईए ने केस दर्ज किए हैं और कश्मीर समेत देश भर में कई जगहों पर दबिश और छापेमारी की है। एजेंसी के हाथ कुछ महत्वपूर्ण दस्तावेज़ लगे और कई हुर्रियत नेताओं से सीधी पूछताछ में बहुत से सुराग़ भी मिले हैं। स्टिंग ऑपरेशन में फंसे नेताओं को यह कहते हुए सुना जा सकता है कि पैसे लेने वालों में मीरवाइज़ का नाम भी शामिल है। लेकिन ग़ौर करने वाली बात यह है कि अभी तक (22 जून, 2017 तक) मीरवाइज़ से कोई पूछताछ नहीं की गई है। न ही हुर्रियत ‘एम’ के किसी नेता के किसी ठिकाने पर छापेमारी की गई है।

सवाल यह है कि क्या भारत सरकार मीरवाइज़ को इस मामले में किसी क़िस्म का सेफ़ पैसेज देकर हुर्रियत में कारगर फूट या दरार के लिए इस्तेमाल करना चाहती है?  बेहद पेचीदा सिसायी और कूटनैतिक मामलों की गुत्थियों को सुलझाने या उन्हें काटकर फेंकने की कोशिशों के तहत ऐसा किया जाना बहुत हद तक असंभव भी नहीं है। मीरवाइज़ तक अपनी मंशा के संप्रेषण के लिए सरकार कोई मौखिक मध्यस्थ चुने, यह ज़रूरी नहीं है। हवाला के ज़रिए पैसे मिलने के मामले में अभी तक कार्रवाई नहीं होना ही अपने आप में स्पष्ट संकेत है, जो मीरवाइज़ ने समझ भी लिया होगा। ऐसे में सरकार तक अपनी प्रतिक्रिया पहुंचाने के लिए बंदरघुड़की का सहारा लेना मीरवाइज़ की मनोवैज्ञानिक मजबूरी हो सकती है। तेवर कड़े करो, पाकिस्तान परस्ती के सुलगते राग पर जम चुकी धूल साफ़ करो और कूटनैतिक घुड़की दो कि अगर कार्रवाई हुई, तो मैं भी कट्टरपंथियों के बेहूदे सुरों से सुर मिलाने लग जाऊंगा! शेर की खाल उतार कर मैं वापस भेड़िया बन जाऊंगा!! असल में मीरवाइज़ का किसी भी मामले पर कुछ भी बोलना केवल किसी एक अलगाववादी नेता का बोलना नहीं है, बल्कि मीरवाइज़ की आवाज़ एक पूरे धड़े की नुमाइंदगी करती है, लिहाज़ा उसकी तरफ़ से गाफ़िल नहीं हुआ जा सकता। अलगाववादी करतूतों में अगर फूट डालनी है, तो कुछ क़ीमत तो चुकानी ही होगी। ऐसे में हुर्रियत ‘एम’ का मौजूदा रुख़ एक तीर से दो शिकार करने जैसा ही है। तल्ख़ तेवर रखने से हुर्रियत जी को संदेश जाएगा कि हम साथ-साथ हैं और सरकार के लिए भी साफ़ संदेश जाएगा कि कड़ी कार्रवाई का आगाज़ न किया जाए वरना...।

अब केंद्र सरकार ने भी साफ़ कर दिया है कि चैंपियंस ट्रोफ़ी के सेमीफ़ायनल और फ़ाइनल में पाकिस्तान की जीत पर मीरवाइज़ का खुशी जताना उसे अच्छा नहीं लगा है। केंद्रीय गृह राज्य मंत्री हंसराज अहीर कह चुके हैं कि मीरवाइज़ के ट्वीट की भाषा आपत्तिजनक है। उन्होंने इसे देश के प्रति बग़ावत करने वाली भाषा क़रार दिया है और उचित समय पर उचित विचार करने की बात कही है। क्रिया पर हुई इस प्रतिक्रिया के भी कई अर्थ निकल रहे हैं। यह ऐसा भी कि जिस बच्चे की खेल प्रतिभा पर माता-पिता को ज़्यादा भरोसा हो, वही अतिरेक आवेग में खेल बिगाड़ने पर आमादा हो जाए, तो उनके माथे पर त्यौरियां चढ़ना लाज़िमी हो जाएगा। जो भी हो, सरकार अगर मीरवाइज़ उमर फ़ारूक़ को सियासत की शतरंज पर ढाई घर चलाने का इरादा रखती है, तो उसे बहुत चौकन्ना भी रहना होगा। ‘उचित समय’ की बात सुनकर मीरवाइज़ की धड़कनें भी थोड़ी बढ़ी ज़रूर  होंगी।  

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