गीलानी की पार्टी तहरीक-ए-हुर्रियत की हक़ीक़त

05 Jun 2017 19:11:41

रवि पाराशर

पुख़्ता ख़बर है कि कश्मीर घाटी में हालात ख़राब करने के लिए हवाला के ज़रिए हर साल एक हज़ार करोड़ रुपए से ज़्यादा आतंकियों और अलगाववादियों तक पहुंचाए जा रहे हैं। घाटी में हवाला के इस गड़बड़झाले के मामले में पिछले तीन साल में 15 से ज़्यादा केस दर्ज किए गए हैं। हाल ही में एक चैनल के स्टिंग ऑपरेशन में पैसे लिए जाने की बात सामने आने के बाद जांच में तेज़ी आई है और कुछ नए केस दर्ज किए जा सकते हैं। केंद्र सरकार ने पिछले साल 30 नवंबर को राज्यसभा में माना था कि रिपोर्टें इस तरफ़ इशारा कर रही हैं कि हवाला से मिल रहे पैसों का इस्तेमाल हालात बिगाड़ने कि लिए किया जा रहा है। पता चला है कि पिछले साल 8 जुलाई को आतंकी बुरहान वानी के मारे जाने के बाद हिंसा और उपद्रव के लिए हवाला के ज़रिए सौ करोड़ से ज़्यादा रुपए घाटी में भेजे गए। एक राष्ट्रीय हिंदी अख़बार के मुताबिक़ नोटबंदी के वक़्त कश्मीर में हवाला के ज़रिए भेजे गए दो हज़ार करोड़ रुपए चलन में थे। लेकिन ये बेकार हो गए। यही वजह थी कि क़रीब दो महीने तक पत्थरबाज़ी की वारदात पर भी ब्रेक लग गए थे। 

अलगाववादी सोच रखने वाले हुर्रियत के कट्टरपंथी धड़े से एक सवाल ज़रूर पूछा जाना चाहिए कि क्या अरबों रुपए लेकर धरती का स्वर्ग कहे जाने वाले कश्मीर की फ़ज़ा बिगड़ाने का काम इस्लामी है?  कम से कम ऑल पार्टी हुर्रियत कॉन्फ्रेंस के चेयरमैन सैयद अली शाह गीलानी को तो इस सवाल का जवाब ज़रूर देना चाहिए। वजह यह है कि उनकी कथित सियासी पार्टी तहरीक-ए-हुर्रियत जम्मू कश्मीर का तो मुख्य मक़सद कश्मीर में इस्लामी शासन क़ायम करना ही है। हालांकि बड़ी चालाकी से अपनी पार्टी की वैबसाइट पर उन्होंने  शब्दजाल फैलाकर कश्मीर के लोगों को फांसने की कोशिश की है। आधिकारिक वैबसाइट पर कहा गया है कि “ऐसी पार्टी की ज़रूरत है, जो बिना किसी लाग-लपेट के जम्मू कश्मीर के लोगों के आत्मनिर्णय के अधिकार की बात करे, जो इस्लाम के दिशा-निर्देशों के तहत आधारभूत मानवाधिकार और नैतिक मूल्यों की रौशनी में इस लक्ष्य को हासिल करने के लिए कटिबद्ध हो। ऐसी पार्टी इसलिए ज़रूरी है, क्योंकि दूसरी सभी पार्टियां दिशाहीन हो गई हैं....।”  ग़ौरतलब है कि तहरीक-ए-हुर्रियत भारत को साम्राज्यवादी करार देती है।

गीलानी की पुरानी पार्टी का नाम जमात-ए-इस्लामी जम्मू कश्मीर था। लेकिन 7 अगस्त, 2004 को तहरीक-ए-हुर्रियत जम्मू कश्मीर नाम से नए संगठन का ऐलान किया गया और इसे बाक़ायदा “राजनैतिक संगठन” घोषित किया गया। नई पार्टी के दिशा-निर्देशक सिद्धांतों का वर्गीकरण तीन बिंदुओं के तहत किया गया है। ये हैं- “ख़ुदा के प्रति फ़र्माबरदारी, मानव जाति से प्रेम और मौत के बाद जवाबदेही।” लक्ष्यों के बारे में बताया गया है कि “पार्टी जम्मू कश्मीर के लोगों, समाज और राज्य की उन्नति के लिए शांतिपूर्ण उद्यम करेगी। साथ ही उनके आत्मनिर्णय के अधिकार के लिए लड़ेगी। इस अधिकार को संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के प्रस्तावों के ज़रिए मान्यता मिली हुई है। भारत सरकार और उसके पहले प्रधानमंत्री राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर यह अधिकार देने का वादा कर चुके हैं। जम्मू कश्मीर पर भारत का ज़बरन क़ब्ज़ा है। संयुक्त राष्ट्र में इसे विवादित क्षेत्र माना गया है। कश्मीर के लोगों को भारत के क़ब्ज़े से मुक्ति पाने का नैतिक, मानवीय और लोकतांत्रिक हक़ है।”

“तहरीक-ए-हुर्रियत जम्मू कश्मीर इस्लामिक सहयोग संगठन (ओआईसी) के 57 सदस्य देशों से अपील करती है कि उनके लोग और सरकारें मुस्लिम बिरादरी से जुड़े मुद्दों का हल निकालने में मदद करें।

 

“तहरीक-ए-हुर्रियत जम्मू कश्मीर पार्टी चाहती है कि कश्मीर समस्या का समाधान संयुक्त राष्ट्र की निगरानी में हो और तीनों पक्ष- कश्मीर के लोग, भारत और पाकिस्तान बातचीत से कोई सियासी समाधान ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य में निकालें। सतही मसलों पर विचार कर क़ीमती वक़्त बर्बाद न किया जाए। पार्टी कश्मीर छोड़ चुके मुस्लिम मुहाजिरों और अल्पसंख्यकों की हिमायती है और उनकी वापसी की पक्षधर है। वे लौटें और अपनी संपत्तियों पर अधिकार करें। पार्टी ऐसी किसी सियासी प्रक्रिया में शामिल नहीं होगी, जो भारत के क़ब्ज़े को सही ठहराती हो, मुद्दे के अंतर्राष्ट्रीय स्वरूप को ख़राब करती हो या शहीदों की क़ुर्बानियों को कम करके आंकती हो।.... पार्टी युवाओं से निवेदन करेगी कि वे आकर सकारात्मक और सक्रिय भूमिका अदा करें। पार्टी दुनिया भर में मानवाधिकारों के उल्लंघन पर चुप नहीं बैठेगी।.... पार्टी मानती है कि जम्मू कश्मीर का मसला हल हुए बिना भारत और पाकिस्तान के संबंधों में सुधार नहीं आ सकता। पार्टी कश्मीर पर भारत-पाक बातचीत में कश्मीरियों के शामिल होने के लिए दबाव बनाएगी।”

“तहरीक-ए-हुर्रियत जम्मू कश्मीर इस्लामिक सहयोग संगठन (ओआईसी) के 57 सदस्य देशों से अपील करती है कि उनके लोग और सरकारें मुस्लिम बिरादरी से जुड़े मुद्दों का हल निकालने में मदद करें। वे ऐसे लोगों के हाथों में न खेलें, जिन्होंने दुनिया को अत्याचारों, भ्रष्टाचार और शैतानी से भर दिया है। ओआईसी को मुस्लिम विश्व में इस्लामिक पद्धति लागू कर व्यक्ति, समाज और देश के विकास के लिए मॉडल मुहैया कराना चाहिए। पार्टी कश्मीर पर नैतिक, सियासी और कूटनैतिक समर्थन के लिए पाकिस्तान की अहसानमंद है। पार्टी न तो थोपा हुआ समाधान मंज़ूर करेगी, न ही सीज़फ़ायर लाइन से छेड़छाड़ से जुड़ा कोई फैसला उसे मंज़ूर होगा और न ही भारतीय संविधान के तहत फैसला उसे स्वीकार होगा।

वैबसाइट में गीलानी की पार्टी तहरीक-ए हुर्रियत जम्मू कश्मीर का परिचय तीन बिंदुओं के तहत दिया गया है। ये हैं- “इस्लाम, फ्रीडम यानी आज़ादी और फ्रेटर्निटी यानी बंधुत्व, भ्रातृत्व, भाईचारा या बिरादरी।” इस्लाम यानी विश्वास की व्याख्या करते हुए लिखा गया है कि “हमारा पहला उद्देश्य, अभिप्राय और प्राथमिकता है इस्लाम। इस्लाम अल्लाह का सर्वप्रिय धर्म और जीवन पद्धति है। इसके बिना कोई पुरुष इस दुनिया में और मरने के बाद भी शांति और समृद्धि नहीं पा सकता। इस्लाम के बिना सामाजिक और आर्थिक इंसाफ़ हासिल नहीं कर सकता। इस पूरे ब्रह्मांड में सभी जीवित लोग चाहकर या न चाहते हुए और निर्जीव चीज़ें दैवी विधान से बंधी है, लिहाज़ा हर इंसान प्रकृति से मुस्लिम है। अल्लाह ने देखने के लिए आंखें दी हैं। देखने का काम हाथों से नहीं हो सकता। दिमाग़ सोचने के लिए है, इससे खाना पचाने या दूसरा कोई काम नहीं किया जा सकता। लेकिन मनुष्यों को सीमित स्वायत्तता भी दी गई है, जिसका इस्तेमाल वे अपने-अपने तरीक़े से करते हैं और इसी वजह से उनमें फ़र्क़ पैदा होता है। जो व्यक्ति अल्लाह की इच्छा के हिसाब से उसे मिली ताक़तों का इस्तेमाल करता है, वह मुसलमान है। जो व्यक्ति अल्लाह की मर्ज़ी से काम नहीं करता और अपनी या अपने पुरखों की इच्छाओं या फिर राजाओं या नेताओं के बनाए सिस्टम को मानता है, वह काफ़िर है। जो लोग अल्लाह की इच्छा से बंधे हैं, अल्लाह उन्हें ख़ुद अपनी इच्छाएं बताने के इंतज़ाम करता है। अलग-अलग वक़्त और जगहों पर अल्लाह ने अपने संदेश लोगों तक पहुंचाने के लिए नेक दूतों को चुना। अल्लाह के दूतों का सिलसिला पहले इंसान आदम से शुरू हुआ और मुहम्मद तक चला।” क़ुरान की आयतों के ज़रिए इस्लाम की लंबी व्याख्या भी वैबसाइट पर उपलब्ध है। इसमें यह भी कहा गया है कि  “आज जो भी राजनैतिक, सामाजिक या आर्थिक समस्याएं हैं, वे अल्लाह को न मानने और व्यक्तियों की बनाई प्रणालियों की वजह से हैं।”

फ्रीडम यानी आज़ादी की व्याख्या करते हुए वैबसाइट पर लिखा गया है कि “पार्टी का दूसरा लक्ष्य है आज़ादी। इस्लामी शिक्षाओं की रौशनी में आज़ादी का मतलब है कि लोगों को अल्लाह की मर्ज़ी के मुताबिक़ अपनी ज़िंदगी गुज़ारने का मौक़ा मिले। कोई किसी को गुलाम न बनाए, चाहे वे किसी भी कुल, जाति, धर्म के हों या दूसरी भाषा बोलने वाले हों। किसी को अल्लाह के सृजन को दास बनाने का अधिकार नहीं है। एक मुसलमान को आज़ादी की इस इस्लामी अवधारणा से अनभिज्ञ नहीं होना चाहिए और अपनी पूरी ज़िंदगी उसे आज़ादी के इस नज़रिए को हासिल करने के लिए संघर्ष करना चाहिए। मरने के बाद उससे उसके संघर्ष की उपलब्धियों के बारे में नहीं पूछा जाएगा, लेकिन यह ज़रूर पूछा जाएगा कि उसने संघर्ष किया या नहीं।”

गीलानी की तहरीक-ए-हुर्रियत जम्मू कश्मीर के मुताबिक़ “दुनिया में 57 देशों में मुसलमान बहुमत में हैं और वहां मुस्लिम सरकारें हैं। लेकिन इनमें से किसी एक देश में भी सच्ची इस्लामी आज़ादी नहीं है। ऐसी आज़ादी, जिसमें ज़िंदगी के निजी और सामाजिक पहलू सिर्फ़ अल्लाह के कानून से शासित हों। कोई हर्ज़ नहीं कि हालात कितने भी विपरीत हों, मुसलमान अपनी इस ज़िम्मेदारी से बच नहीं सकते। अपने लक्ष्य और सपनों को वक़्त के हिसाब से व्यवस्थित करना ग़लत है।”

इस्लाम के ये अलगाववादी झंडाबरदार यह मानने को राज़ी क्यों नहीं हैं कि अगर मुस्लिम विश्व में उनके हिसाब से जो बदलाव आ गए हैं या आ रहे हैं, वे सब अल्लाह की मर्ज़ी के मुताबिक़ ही तो नहीं हैं! किसी भी धर्म की शिक्षाएं तो सर्वकालिक हो सकती हैं, लेकिन उनके तहत आचरण या कहें कि उनका पालन करने के तौर-तरीक़े समय के हिसाब से बदल ही जाते हैं। बहुत स्थूल उदाहरण से इसे समझा जा सकता है। इस्लाम धर्म की स्थापना के बाद मस्जिदों में नमाज़ पढ़े जाने का सिलसिला शुरू हुआ होगा। लेकिन उस वक़्त लाउडस्पीकरों की ईजाद नहीं हुई थी। तो आज के आधुनिक मशीनी दौर में इस परंपरा के निर्वाह में इस उपकरण की अनिवार्यता के पक्ष में क्या किसी तरह के तर्क दिए जा सकते हैं? तीन तलाक़ भी इसी तरह का मसला है। धार्मिक किताबों के मुताबिक़ एक बार में तीन तलाक़ का कोई प्रावधान इस्लाम में नहीं है। लेकिन भारत में यह प्रथा चलन में है। इसी तरह हिंदू या किसी भी दूसरे धर्मों से जुड़े कर्मकांडों के पालन में बहुत से साधनों के स्वरूप बदल गए हैं और बदलते रहेंगे। Political

तहरीक-ए-हुर्रियत के मुताबिक़ “विवादित जम्मू कश्मीर में बहुसंख्यक लोगों को अधुनातन अवधारणा के तहत भी आज़ादी के हक़ से वंचित रखा गया है। जम्मू कश्मीर शताब्दियों से कुचला जा रहा है। सात सौ साल के मुस्लिम शासन के बाद इस पर विदेशी अफ़गानियों और मुग़लों का क़ब्ज़ा रहा। सन् 1819 में कश्मीर में सैनिक घुसपैठ की। उनका शासन 1846 तक चला। कश्मीर में अल्पसंख्यक शासकों ने बहुसंख्यक लोगों पर इस क़दर अत्याचार किए कि ऐसा बर्बर और शर्मनाक उदाहरण भारत के इतिहास में दूसरा नहीं मिलता। ब्रिटिश सेना ने जम्मू कश्मीर के सिख शासक को हरा दिया और डोगरा वंश के गुलाब सिंह को कश्मीर 75 हज़ार नानकशाही सिक्कों में बेच दिया। सारी आबादी, ज़मीन, घर और पशु बेच डाले गए। इतिहास में यह अपनी तरह का पहलार सौदा था, जिसमें कश्मीर का हर आदमी सात रुपए प्रति व्यक्ति की दर से बेच दिया गया।”

फ्रेटर्निटी यानी बंधुत्व या बिरादरी के लक्ष्य की इस्लामी अवधारणा को स्पष्ट करते हुए पार्टी मानती है कि “इस्लाम समस्त मानव समुदाय के बीच भाईचारे का बंधन क़ायम करता है। ऐसा लक्षण किसी और धर्म में नहीं है। सभी बाक़ी धर्म इंसान को कुल-वंश, जाति, भाषा, भौगोलिक स्थितियों, रंग और आर्थिक आधार पर बांटते हैं। इस तरह के सामाजिक विभाजन से हिंसा और नफ़रत बढ़ती है। जैसा कि इस्लाम की स्थापना से पहले होता था, वही आज भी हो रहा है।”

ये सब जानने के बाद अब किसी भी भारतीय के मन में बहुत से सवाल उठने लाज़िमी हैं। साफ़ है कि तहरीक-ए-हुर्रियत जम्मू कश्मीर विरोधाभासों का पुलिंदा है। पार्टी क़ुरान के बताए इस्लाम की स्थापना का लक्ष्य पूरी दुनिया में रखती है। जिस संघर्ष की बात और वकालत पार्टी धार्मिक आधार पर कर रही है, वह संघर्ष क्या कश्मीर में सुरक्षा बलों पर पत्थर बरसाने वाले युवाओं में उसे दिखाई दे रहा है? जिस संघर्ष को जारी रखने और मरने के बाद के हिसाब-किताब से बचने के लिए ऑल पार्टी हुर्रियत कॉन्फ्रेंस के चेयरमैन सैयद अली शाह गीलानी अपनी पार्टी के ज़रिए क़ुरान और सुन्नतों का हवाला देकर कर रहे हैं, वह संघर्ष क्या उन्हें आतंकवादियों के ख़ूनी मंसूबों में नज़र आ रहा है? ज़रूर आ रहा होगा, क्योंकि अलगाववादी गीलानी ने कभी कश्मीर के पत्थरबाज़ों, स्कूलों में आगज़नी कर उन्हें स्वाहा कर कश्मीर के भविष्य को बर्बाद करने वालों, हड़तालों के दौरान रेहड़ी-पटरी वाले दुकानदारों पर पेट्रोल बमों से हमला करने वालों, ऑटो रिक्शा और टैक्सियां चलाकर अपने बच्चों का पेट भरने वालों के वाहन जला देने वालों की कभी निंदा नहीं की। ऐसे गुमराह युवाओं को गीलानी ने कभी समझाने तक की कोशिश नहीं की। क्या गीलानी की नज़र में यही इस्लामी संघर्ष का सच्चा रास्ता है, जिसमें फ़ेथ यानी विश्वास है, फ्रीडम यानी आज़ादी है और फ्रेटर्निटी यानी भाईचारा है। गीलानी अगर इस्लाम के झंडाबरदार हैं, उनकी सोच में ज़रा से भी सच्चे धार्मिक भाव हैं, तो कम से कम वे भारतीय फ़ौज के सच्चे सिपाही लेफ्टिनेंट उमर फ़ैयाज़ की नृशंस हत्या के विरोध में तो मुखर होते। लेकिन ऐसा कुछ भी नहीं है।

गीलानी और हुर्रियत कॉन्फ्रेंस के बहुत से नेताओं ने अपने चेहरे बहुत से मुखौटे लगाकर लोगों से छुपा रखे हैं। अपनी स्वार्थ सिद्धि के लिए वे तमाम ग़ैर-इस्लामी काम कर रहे हैं। भाईचारे की बात करने वाले ये लोग पाकिस्तान और दूसरे इस्लामिक देशों से अरबों रुपए लेकर फज़ा तो ख़राब कर ही रहे हैं, निजी तिजोरियां भरने में भी लगे हैं। आतंकवादी संगठनों से पैसे लेकर इस्लाम के प्रचार-प्रचार के मिथ्या उपदेश दिए जा रहे हैं। लेकिन अब लोग इनकी हक़ीक़त से वाक़िफ़ होते जा रहे हैं और ज़्यादा दिनों तक इनकी दाल नहीं गलने वाली। किसी धर्म विशेष की शिक्षाओं को पार्टी की स्थापना का लक्ष्य बनाने वाले ख़ुद को सियासी पार्टी और कश्मीर समस्या के सियासी समाधान की वक़ालत कैसे कर सकते हैं?

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