फारुख अहमद धर और क़िस्सा-ए-बाबा जान

09 Jun 2017 20:13:29

डा० कुलदीप चन्द अग्निहोत्री

भारतीय सेना ने कश्मीर घाटी के बडगाम ज़िला में पिछले दिनों हुए उपचुनाव में एक मतदान केन्द्र पर पत्थरबाज़ों को हल्लाशेरी दे रहे किसी फारुख अहमद धर को जीप के बोनट पर बाँध कर कितने ही लोगों को मरने से बचा लिया था, उसका क़िस्सा अभी तक लोग भूले नहीं हैं। हज़ारों की संख्या में जो लोग उस दिन मतदान केन्द्र को घेर कर पत्थरबाज़ी कर रहे थे, वे भी व्यक्तिगत बातचीत में कह रहे हैं कि मेजर गोगोई ने ऐसी तरकीब निकाली कि घिरे हुए सभी कर्मचारियों और सुरक्षा बल के जवानों को बचा कर ले गया।

कश्मीर में लाशों की राजनीति करने वाले गोगोई की इस कारगुज़ारी को पचा नहीं पा रहे, इसलिए वे उसे गालियाँ दे रहे हैं। स्वभाविक ही इसमें गिलानियों का कुनबा, मीरवाइजों की जमात शामिल है। अब्दुल्ला परिवार (महरूम शेख़ अब्दुल्ला के कुनबे के लोग) भी इसमें शामिल है। यह उसकी राजनैतिक रणनीति का हिस्सा है, जिसमें लाशें भी महत्वपूर्ण भूमिका अदा करती हैं। साम्यवादी कुनबा (सीपी आई से लेकर एम से होते हुए जैड तक इसमें न जाने कितनी जमायतें हैं। वैसे घाटी की तर्ज़ पर कहना हो तो जमायत-ए-कम्युनिस्ट कहा जा सकता है) सदा से ही हर उस व्यक्ति और घटना का विरोध करता है जो भारत के हित में है। इसलिए उसने भी गोगोई को गोली मारने को छोड़कर और कोई भी सज़ा देने की माँग की है । इस जमायत के एक आलातरीन दानिशमन्द पार्थ चटोपाध्याय ने ग़ुस्से में आकर भारतीय सेना के सेनापति को जनरल डायर के बराबर बता दिया है। आदमी अक़्लमंद है, इसलिए पूरी घटना को घुमाने में माहिर है ही। इसलिए फारुख अहमद धर की वाक़फियत अपने पाठकों से यह कह कर करवाता है कि वह अपनी मोटरसाइकिल पर घटनास्थल के पास से गुज़र रहा था। इतना सफ़ेद झूठ बोलने की हिम्मत ख़ुद फारुख अहमद धर की भी नहीं हुई। उसने भी यह कहा कि वह मतदान केन्द्र पर वोट डाल रहा था। वह अपने अंगूठे पर काला निशान भी दिखा रहा है। सीताराम येचुरी भी ग़ुस्से में झाग छोड़ रहे हैं। साम्यवादियों की ये कलाबाज़ियाँ किसी को हैरान नहीं करतीं बल्कि मनोरंजन करती हैं। लोगबाग जानते हैं, ये इस प्रकार की अजीबोग़रीब हरकतें करते रहते हैं। वैसे ये आत्मा में विश्वास नहीं करते परन्तु कभी कभी वह जाग जाती है तो इस जमायत में क्या बड़ा क्या छोटा, सब हैरतअंगेज़ करतब दिखाता है। अब यह आत्मा जागी हुई है। इसलिए कश्मीर घाटी में मानवाधिकारों का जो हनन हो रहा है, उसको देख कर चिंघाड़ रही है।
उसे कोई मेजर गोगोई जैसा मिल जाता तो उसे भी जीप के बोनट पर घुमा कर छोड़ देता। लेकिन उसे मिला पाकिस्तान की सेना का मेजर।

लेकिन इस जागी हुई आत्मा को लाईन के उस पार दिखाई नहीं दे रहा, यह सचमुच हैरानी की बात है। उस पार यानि जम्मू कश्मीर का जो हिस्सा पाकिस्तान ने अपने क़ब्ज़े में किया हुआ है। उस हिस्से में जमायत-ए-कम्युनिस्ट का ही एक आला कारकुन भी गिलगित बल्तीस्तान में वही कुछ कर रहा था जो बडगाम में फारुख अहमद धर कर रहा था। उस कारकुन का नाम बाबा जान है और वह गिलगित बल्तीस्तान की अवामी वरकर्ज पार्टी का उपाध्यक्ष है। वह भी उसी कार्ल मार्क्स का चेला है जिसकी क़समें हिन्दुस्तान में जमायत-ए-कम्युनिस्ट के लोग खाते हैं । इस लिहाज़ से बन्दा अपनी विरादरी का ही हुआ । उसकी सहायता करना एक ही कुनबे के नाते भी फ़र्ज़ बनता है । क़िस्सा क्या है , यह बयान करना भी लाज़िमी है। जनवरी 2010 में गिलगित बल्तीस्तान में हुंजा नदी का प्रवाह रुक गया था क्योंकि पहाड़ का एक हिस्सा उसमें गिर गया था जिसने नदी का प्रवाह रोक दिया था । उससे बनी झील में अनेकों गाँव डूब गए थे और हज़ारों लोग बेघर हो गए थे। ये लोग 11 अगस्त 2011 को  मुआवज़े की माँग कर रहे थे। बदक़िस्मती से वे यह माँग कराकोरम सड़क पर खड़े होकर कर रहे थे । यह वही कराकोरम मार्ग है जिसे चीन सरकार ने बनाया है। ऊपर से कोढ में खाज यह कि उस सड़क पर से उसी समय सैयद मेहंदी शाह गुज़रने वाले थे । ये सैयद अहमद शाह उन अरब-इरानियों के कुनबे में से हैं जो सैकड़ों साल पहले जम्मू कश्मीर को जीतने के लिए यहाँ आए थे। सैयद साहिब को पाकिस्तान सरकार ने गिलगित बल्तीस्तान का मुख्यमंत्री बनाया हुआ था ।  चीन की बनाई हुई सड़क और उस पर सैयद साहिब की सवारी और उसमें दीवार बन कर खड़े गिलगित बल्तीस्तान के पहाड़ी लोग! लाहौल बिला काबूत। ऐसे मौक़े पर गोली चलाना तो बनता है।  इसी तर्क से गोली चली और एक बाप-बेटा उसकी बलि चढ़ गए। बाबा जान ने इसका विरोध किया। वहाँ की पुलिस ने उसे जीप के बोनट पर बिठा कर घुमाया नहीं। ज़ाहिर है इससे उसके मानवाधिकारों का हनन होता। उसने  उसको आतंकवादी घोषित कर दिया और ता-उम्र के लिए जेल में बन्द कर दिया। अब बाबा जान लगभग छह साल से जेल में बन्द है।

सीता राम येचुरी जिनकी नींद, जीप के बोनट पर बैठे फारुख अहमद धर के चित्रों ने हराम कर रखी है उनके ज़ेहन में जेल में बैठा बाबा जान खलबली क्यों नहीं मचाता?

क़ायदे से वह भी जम्मू कश्मीर का उसी प्रकार वाशिन्दा है जिस प्रकार फारुख अहमद धर है । फ़र्क़ केवल इतना है कि वह जम्मू कश्मीर के उस हिस्से का वाशिन्दा है जिस  पर पाकिस्तान ने बलपूर्वक ग़ैरक़ानूनी क़ब्ज़ा किया हुआ है । फारुख अहमद धर और बाबा जान दोनों ही सरकार के ख़िलाफ़ प्रदर्शन कर रहे थे । पहले को जीप के बोनट पर बिठा कर छोड़ दिया गया और दूसरे को ज़िन्दगी भर के लिए जेल में डाल दिया गया । वैसे यदि शुद्ध रुप में पार्थ चटोपाध्याय के शब्दों का ही इस्तेमाल करना हो तो यह भी कहा जा सकता है कि जब प्रदर्शन हो रहा था तो बाबा जान वहाँ से गुज़र रहा था । लेकिन मुझे लगता है कि हमें पार्थ चटोपाध्याय के स्तर तक नीचे जाने की जरुरत नहीं है । इसलिए  हम यही कहेंगे की वह प्रदर्शन में शामिल ही नहीं था बल्कि उसका नेतृत्व कर रहा था । अपने इस जघन्य अपराध के लिए अब वह ज़िन्दगी भर के लिए जेल की सलाखों के पीछे चला गया है । फारुख अहमद धर की तरह अपने घर में नहीं बैठा है ।

उसका क़सूर केवल इतना था कि वह प्राकृतिक आपदा में फँसे लोगों के लिए मुआवज़े की माँग कर रहा था । उसे कोई मेजर गोगोई जैसा मिल जाता तो उसे भी जीप के बोनट पर घुमा कर छोड़ देता । लेकिन उसे मिला पाकिस्तान की सेना का मेजर । उन्होंने उसकी जितनी पिटाई हो सकती थी की और फिर उसे उमर भर जेल में सड़ने के लिए डाल दिया । जेल में से ही वह गिलगित बल्तीस्तान की विधान सभा के चुनावों में उम्मीदवार हो गया था और वहाँ के लोगों ने उसे अच्छी संख्या में वोट डाले । अगली बार 2016 के चुनावों में उसने फिर अपना पर्चा इसी चुनाव के लिए दाख़िल कर दिया लेकिन सरकार ने उसे आतंकवादी बता कर चुनाव लड़ने से मना कर दिया । लेकिन इसे बाबा जान का सौभाग्य ही कहना चाहिए कि दुनिया भर के लोगों का ध्यान उसके साथ हुए अन्याय की ओर गया है। अनेक देशों में लोग शोर मचा रहे हैं कि बाबा जान को जेल से छोड़ना चाहिए। गिलगित बल्तीस्तान में तो लोग सड़कों पर उतर कर इस बात के लिए प्रदर्शन भी कर रहे हैं। यहाँ तक कि वामपंथियों में जिसको सिर आँखों पर बिठाया जाता है, ऐसे नोयम चोमस्की ने भी माँग कर डाली कि बाबा जान बेक़सूर हैं और उसे छोड़ दिया जाना चाहिए। लेकिन भारत की जमायत-ए-कम्युनिस्ट इस पर मौन साधे हुए है।

सीता राम येचुरी जिनकी नींद, जीप के बोनट पर बैठे फारुख अहमद धर के चित्रों ने हराम कर रखी है और उसके कारण मेजर गोगोई के चित्र को देख कर जिनकी आँखों में ख़ून उतर आता है , उनके ज़ेहन में जेल में बैठा बाबा जान खलबली क्यों नहीं मचाता ? बाबा जान और सीता राम येचुरी तो वैसे भी एक ही गुरु कार्ल मार्क्स के शिष्य हैं । इसलिए उनके लिए तो और भी जरुरी है कि वें पाकिस्तान के पास बाबा जान के मामले को लेकर प्रोटैस्ट दर्ज करवाएँ । जमायत-ए-कम्युनिस्ट दिल्ली में पाकिस्तान के दूतावास के आगे प्रदर्शन भी कर सकती है । उनके मित्र पार्थ चटोपाध्याय अपनी भाषा और लियाक़त का प्रयोग बाबा जान के मामले में भी कर सकते हैं । पाकिस्तानी सेना की तुलना वे जनरल डायर से चाहे न करें वे उसे मानवाधिकारों का हनन करने वाली सेना तो लिख ही सकते हैं । लेकिन यक़ीनन वे ऐसा नहीं करेंगे । क्योंकि इससे जम्मू कश्मीर के उस हिस्से के लोगों को , जो पाकिस्तान के क़ब्ज़े में हैं , संदेश जाएगा कि भारत के लोग उनकी लड़ाई में उनके साथ हैं । यह संदेश न तो पार्थ चटोपाध्याय देना चाहते हैं और न ही हिन्दुस्तान में जमायत-ए-कम्युनिस्ट के लोग । वे तो फारुख अहमद धर के साथ हैं जो जम्मू कश्मीर की अपनी ही पुलिस पर पत्थर बरसाता है और और लोगों को भय से वोट डालने से रोकता है ।

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