कश्मीर में निर्णायक मोड़ पर है आतंक से युद्ध

14 Jul 2017 12:21:06


रवि पाराशर

कश्मीर में आतंकवाद के सफाए, पाकिस्तान को अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर अलग-थलग करने और पाकिस्तान में भारत समेत दुनिया भर में खून-खराबे के लिए चल रही आतंक की फैक्ट्रियों पर लगाम लगाने के मामलों में देश को लगातार कामयाबी मिल रही है। चाहे आतंकवादियों से जमीनी लड़ाई का मसला हो या कूटनैतिक स्तर पर आतंक के खिलाफ दुनिया को एकजुट करने की कोशिश, हमारे सुरक्षा बल और सरकार, दोनों ही सकारात्मक दिशा में आगे बढ़ रहे हैं। कश्मीर में भारतीय सुरक्षा बलों के ‘ऑपरेशन ऑलआउट’ की वजह से वहां सक्रिय आतंकी दहशत में हैं और अमेरिका ने आतंक से जंग के लिए भारत के हाथ और मजबूती से थाम लिए हैं। कश्मीर में आतंक के खात्मे की दिशा में अमेरिका का यह फैसला भी निर्णायक मोड़ साबित होगा, यह तय है।  दोनों देशों ने संयुक्त बयान में पाकिस्तान को टूक चेतावनी दी है कि वह सुनिश्चित करे कि उसकी जमीन से दूसरे देशों में आतंकी हमले नहीं हों। 

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के अमेरिका दौरे के दौरान इस सिलसिले में बड़ी रणनीतिक सफलता मिली है। पाक अधिकृत जम्मू कश्मीर से भारत के खिलाफ अघोषित युद्ध कर रहे और पूरे विश्व में आतंकवाद के बीज बो रहे हिज्ब-उल-मुजाहिदीन के मुखिया सैयद सलाहुद्दीन को अमेरिका ने वैश्विक आतंकवादी घोषित कर दिया है। अमेरिका ने यह घोषणा 26 जून को राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की प्रधानमंत्री मोदी से शिखर वार्ता से ठीक पहले कर जता दिया है कि वह आतंक के खात्मे के मामले में हर तरह से भारत के साथ है। सलाहुद्दीन को वैश्विक आतंकी घोषित किए जाने पर बौखलाए पाकिस्तान ने भले ही फैसले को गलत बताते हुए कहा है कि कश्मीरियों के आत्मनिर्णय के अधिकार का समर्थन करने वालों का वह समर्थन जारी रखेगा। लेकिन इससे कोई खास फर्क नहीं पड़ता। सलाहुद्दीन का नाम लिए बिना जारी किया गया यह बयान उल्टे साबित करता है कि पाकिस्तान आतंकवाद का खुलकर समर्थन कर रहा है।

अमेरिका की यह घोषणा उस पाकिस्तान के लिए बड़ा झटका भी है, जो अंतर्राष्ट्रीय बिरादरी के सामने बार-बार यह रोना रोता है कि वह आतंकवाद का पोषण नहीं करता, बल्कि खुद आतंक से पीड़ित है। प्रसंगवश बताते चलें कि हिज्ब सरगना सैयद सलाहुद्दीन कश्मीर के बडगाम जिले में पैदा हुआ। उसने यूनिवर्सिटी ऑफ कश्मीर से पढ़ाई की। वर्ष 1987 में उसने अपने मूल नाम यूसुफ शाह से मुस्लिम यूनाइटेड फ्रंट के टिकट पर जम्मू कश्मीर विधानसभा का चुनाव भी लड़ा, लेकिन जीता नहीं। बाद में उसने आतंक का रास्ता चुन लिया और पीओजेके के मुजफ्फराबाद पहुंच गया। यूसुफ शाह नाम बदल कर 5 नवंबर, 1990 को सैयद सलाहुद्दीन बन गया। वर्ष 2012 में उसने यह कहकर पाकिस्तान की किरकिसी की थी कि कश्मीर में जंग के लिए उसके संगठन को पाकिस्तान का समर्थन हासिल है। वह यह धमकी भी दे चुका है कि अगर पाकिस्तान ने उसका साथ नहीं दिया, तो हिज्ब के आतंकी वहां भी जंग छेड़ देंगे। साफ है कि एक तरह से उसकी पीठ पर पाकिस्तानी फौज का नापाक हाथ है। यही वजह है कि पाकिस्तान की राजधानी इस्लामाबाद में उसका एक खास ठिकाना भी है।

यह भी जान लीजिए कि वैश्विक आतंकवादी घोषित किए जाने के बाद अब अमेरिकी अधिकार क्षेत्र में आने वाली उसकी सारी संपत्तियां जब्त कर ली जाएंगी। साथ ही अमेरिका का कोई भी नागरिक उसके साथ किसी तरह का संबंध नहीं रख पाएगा। पिछले दिनों घुसपैठ के खिलाफ भारतीय सुरक्षा बलों की सख्त कार्रवाई और अब कश्मीर में चलाए जा रहे ‘ऑपरेशन ऑलआउट’ न केवल सैयद सलाहुद्दीन तिलमिलाया हुआ है, बल्कि पाकिस्तान में बेखौफ रह रहे दूसरे आतंकी सरगना भी हाथ मलने को मजबूर हैं। पुख्ता खबर है कि हाल ही में सैयद सलाहुद्दीन पाकिस्तानी फौज के जनरल कमर अहमद बाजवा को हुक्मनुमा संदेश में कहा है कि पीओजेके में सक्रिय आतंकियों की मदद बढ़ाई जाए। अगर कश्मीर में नतीजे देखने हैं, तो ‘लोकल आर्मी’ (आतंकवादी) को सपोर्ट बढ़ाना पड़ेगा। इससे पहले पाकिस्तान सेना के प्रमुख रहे राहिल शरीफ को भी उसने ऐसा ही संदेश दिया था।

ईद के अवसर पर सामने आए दो वीडियो ने फिर दुनिया के सामने साफ कर दिया है कि पाकिस्तान की जमीन पर आतंक के कटीले झाड़ फल-फूल रहे हैं। एक वीडियो सैयद सलाहुद्दीन का है, जिसमें वह कश्मीर के हिज्ब सरगना रहे बुरहान वानी की बरसी पर पूरे हफ्ते यानी 8 जुलाई से 13 जुलाई तक खून-खराबा करने और विरोध प्रदर्शनों के लिए आतंकियों को हुक्म देता सुनाई दे रहा है। वीडियो में वह कश्मीर के हुर्रियत नेताओं को भी संदेश दे रहा है कि वे अपने हिसाब से विरोध प्रदर्शनों का कैलेंडर जारी कर सकते हैं। सलाहुद्दीन के इस जहर भरे वीडियो का ही नतीजा है कि कश्मीर में ईद की नमाज के बाद दिन भर जगह-जगह सुरक्षा बलों के जवानों पर पत्थर बरसाए गए। आगजनी की गई। जमात-उद-दावा के मुखिया और 26/11 को मुंबई पर हमले के मास्टरमाइंड हाफिज सईद का एक करीबी रिश्तेदार दूसरे वीडियो में श्रीनगर के पंथाचौक इलाके के डीपीएस स्कूल में हुई मुठभेड़ के दौरान फंसे दो आतंकियों के लिए दुआ करता हुआ सुनाई दे रहा है। इस वीडियो में जमात-उद-दावा का एक्टिंग चीफ अब्दुल रहमान मक्की भी दिखाई दे रहा है। यह वीडियो मुठभेड़ के वक्त ही बनाया गया था। गत 24 जून को सीआरपीएफ के दल पर हमला करने वाले दो आतंकी डीपीएस स्कूल में छुप गए थे। हमले में सीआरपीएफ के सब इंसपेक्टर शहीद हो गए। बाद में 17 घंटे चली मुठभेड़ में दोनों आतंकी ढेर कर दिए गए। मुठभेड़ में सेना के दो जवान भी घायल हुए। दोनों आतंकियों के मारे जाने से साफ़ है कि सुरक्षा बलों का ‘ऑपरेशन ऑलआउट’ कामयाब हो रहा है और सेना घाटी में सक्रिय आतंकियों को चुन-चुन कर मारने के लिए कटिबद्ध है। यह ऑपरेशन शुरू करते वक्त सुरक्षा बलों ने कश्मीर के 13 जिलों में सक्रिय 258 स्थानीय और विदेशी आतंकवादियों की लिस्ट तैयार की थी। इनमें से सात आतंकी 27 जून तक मारे जा चुके थे।   

यह भी जान लीजिए कि जमात-उद-दावा प्रतिबंधित लश्कर-ए-तैयबा का ही मुखौटा संगठन है। हाफिज सईद की पत्नी का भाई लश्कर के आतंकियों की सलामती के लिए दुआ कर रहा है, तो इससे भी यह बात साबित होती है। सलाहुद्दीन के वीडियो के साथ ही यह वीडियो भी इस बात का जीता-जागता सुबूत है कि पाकिस्तान की धरती से आतंकी भारत के विरोध में खुलकर काम कर रहे हैं, जिसे पाकिस्तान नकारता है।

कश्मीर में आतंक के खात्मे के लिए सुरक्षा बल कई स्तरों पर काम कर रहे हैं। ‘ऑपरेशन ऑलआउट’ के जरिए उन्होंने साफ कर दिया है कि किसी भी कीमत पर घाटी में सक्रिय आतंकियों को जीवित नहीं छोड़ा जाएगा। इसके तहत एक-एक आतंकी से जुड़ी सारी जानकारियां जुटाई गई हैं। इस काम में अमनपसंद कश्मीरियों ने भी उनकी सहायता की है। इसके साथ ही बंदूक उठा चुके स्थानीय आतंकियों के परिवारों और मित्रों के जरिए उन पर आत्मसमर्पण के लिए भावनात्मक स्तर पर भी दबाव डलवाया जा रहा है। यह ऑपरेशन आनन-फानन में नहीं शुरू किया गया, बल्कि काफी समय से आतंक के संहार की इस योजना पर काम चल रहा था। इसका ही नतीजा है कि गत 7 जून को जम्मू कश्मीर पुलिस ने जानकारी दी कि हिज्ब सरगना सब्जार भट के जनाजे में दिखाई दिए आतंकी दानिश अहमद ने सरेंडर कर दिया है। वह उत्तरी कश्मीर के हंदवाड़ा का रहने वाला है। पुलिस के मुताबिक दानिश के माता-पिता उसके खिलाफ निष्पक्ष कार्रवाई का आश्वासन पर उसे मनाने के लिए मान गए। दूसरे कई स्थानीय आतंकियों के परिवार भी बेटों को मनाने में लगे हैं। इसके अलावा अंतर्राष्ट्रीय सीमा और एलओसी पर घुसपैठ रोकने के भी पुख्ता इंतजाम किए गए हैं। टैरर फंडिंग के मामले में भारत की एनआईए ने हुर्रियत नेताओं के इर्दगिर्द कड़ा शिकंजा कस दिया है। 27 जून को ही हुर्रियत के कट्टरपंथी धड़े के नेता सैयद अली शाह गीलानी के दामाद अल्ताफ फंटूश समेत तीन अलगाववादियों को गिरफ्तार किया गया है।

सेना के ‘ऑपरेशन ऑलआउट’ को प्रभावी बनाने के लिए दक्षिण कश्मीर में सुरक्षा बलों के दो हजार अतिरिक्त जवान तैनात किए जा रहे हैं। इसके अलावा खबर यह भी है कि जम्मू कश्मीर पुलिस को सौ बख्तरबंद गाड़ियां सितंबर तक मुहैया करा दी जाएंगी। आतंकियों को खत्म करने के लिए बनाए गए मास्टरप्लान के तहत जो लिस्ट बनाई गई है, उसमें सबसे ज्यादा 136 आतंकी लश्कर के हैं। हिज्ब के 95, जैश-ए-मोहम्मद के 23 और अलबद्र के एक आतंकी की पहचान की गई है। लिस्ट में शामिल जम्मू कश्मीर के 13 जिलों में सक्रिय 130 आतंकी स्थानीय हैं और 128 विदेशी, खासकर पाकिस्तानी  हैं। सबसे ज्यादा 39 आतंकी सोपोर में हैं, जिनमें 24 विदेशी हैं। इसके बाद कुपवाड़ा में सक्रिय 34 आतंकियों में से 32 विदेशी हैं। हंदवाड़ा में 28 विदेशियों समेत 31, शोपियां में 26, कुलगाम (एक विदेशी), पुलवामा (छह विदेशी) और अवंतीपोरा (पांच विदेशी) में 25-25 आतंकी, बारामूला में सात विदेशियों समेत 11, श्रीनगर में छह विदेशियों समेत नौ, अनंतनाग में एक विदेशी समेत नौ, गांदेरबल में चार (तीन विदेशी) और बडगाम में कुल चार स्थानीय आतंकी हैं।

इससे पहले सितंबर, 2016 में भी सेना, सीआरपीएफ और स्थानीय पुलिस कश्मीर में बड़े पैमाने पर ‘ऑपरेशन कामडाउन’ चला चुकी हैं। इसके तहत प्रदर्शनकारियों द्वारा जगह-जगह सड़कों पर पैदा किए गए अवरोधों को हटाया गया था। आठ जुलाई के बाद शुरू हुए हिंसक आंदोलन के दौरान लोगों ने सड़कों पर पेड़ काट कर डाल दिए थे। बिजली के खंभे उखाड़ दिए थे, जले हुए वाहन और कई दूसरे अवरोध पैदा कर दिए थे, ताकि सेना की गाड़ियां रफ्तार न पा सकें। पिछले दिनों सेना ने बड़े पैमाने पर सघन तलाशी अभियान भी शुरू किया था। ऐसे अभियान लोगों को होने वाली परेशानी को देखते हुए वर्ष 2000 में बंद कर दिए गए थे। लेकिन अब आतंक की कमर पूरी तरह तोड़ने का फैसला किया गया है, तो फिर स्थानीय लोगों को भी थोड़ी तकलीफ सहने के लिए तैयार रहना चाहिए, क्योंकि आखिरी तौर पर वही आतंक के शिकार हो रहे हैं।

पाकिस्तान से घुसपैठिए आतंकियों की संख्या में काफी कमी आई है। आने वाले दिनों में मौसम प्रतिकूल होने से यह संख्या और घटेगी, यह भी तय है। इसके अलावा पीओजेके में भी पाकिस्तान के खिलाफ आंदोलन तेज हुए हैं। ऐसे में सुरक्षा बलों का विजयी अभियान सफल होने की पूरी उम्मीद की जा सकती है। लेकिन सवाल यह भी है कि क्या यूसुफ शाह उर्फ सैयद सलाहुद्दीन जैसे आतंकियों को ‘ग्लोबल टेरेरिस्ट’ घोषित करा लेने भर से आतंक का पूरी तरह खात्मा हो सकता है?  ऐसे आतंकियों को जड़ से खत्म करने की जरूरत है। इसके लिए विश्व शक्तियों के साथ मिलकर कड़ी कार्रवाई की जानी चाहिए। पाकिस्तान हमारे अमन-चैन से खेल रहा है, हमारी अर्थव्यवस्था को तहस-नहस करना चाहता है। ऐसे में हमें अब यह सोचने की भी जरूरत है कि उसे मोस्ट फेवर्ड नेशन का दर्जा हमने क्यों दे रखा है?

 

 

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