जानिये क्या है अनुच्छेद 35 A ?

14 Aug 2017 11:56:31


हाल ही में जम्मू कश्मीर की मुख्यमंत्री महबूबा मुफ़्ती ने संविधान के अनुच्छेद 35(A) में बदलाव के मुद्दें को उठाते हुए चेतावनी दी है कि यदि इसमें बदलाव होता है तो वह तिरंगे के सुरक्षा के लिए आगे नहीं आयेंगी, जिसकी केंद्र सरकार ने आलोचना की है। महबूबा मुफ़्ती के इस बयान इस और इशारा करता है  कि अनुच्छेद 35A पर सुप्रीम कोर्ट में चल रहे मामले को लेकर जम्मू कश्मीर के कश्मीर क्षेत्र के दलों में कुछ डर बैठा हुआ है।  हो न हो  यह डर बरसो  पहले देश के साथ हुए फ्राड के खुलने का डर है। 

 

अनुच्छेद 35A  के चलते जम्मू-कश्मीर का एक बड़ा तबका आज़ादी के सात दशक बाद भी भारतीय संविधान के अनुसार प्राप्त अपने मूल अधिकारों से वंचित हैं। एक आज़ाद और सम्प्रभु राष्ट्र में किसी नागरिक के साथ ऐसा दुर्व्यवहार होना दुर्भाग्यपूर्ण है। आज भारत के साथ साथ पुरे विश्व की नज़रे जम्मू कश्मीर पर टिकी रहती है। जम्मू कश्मीर की चर्चा में नागरिकों के मूल अधिकारों, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और मानवाधिकारों की बात बड़े मुखर रूप से की जाती है। लेकिन इन सब के बीच जम्मू कश्मीर के लोगो के लिए अभिशाप के रूप में स्थापित अनुच्छेद 35 A की चर्चा हमेशा नदारद रहती है।

क्या है अनुच्छेद 35 A

अनुच्छेद 35A के अनुसार ‘जम्मू कश्मीर की विधानसभा वहाँ के स्थायी निवासी की परिभाषा तय करेगी साथ ही बचे हुए लोगो के अधिकारों को भी निश्चित करेगी।‘ इसका आशय है कि सीधे तौर पर जम्मू कश्मीर के सरकार को वहाँ के स्थायी निवासी चुनने का अधिकार है। भारतीय संविधान के अनुसार भारत देश में कोई भी नागरिक देश के किसी भी स्थान में जमीन खरीद सकता है, रोजगार कर सकता है और किसी भी स्थान पर निवेश कर सकता है किन्तु जम्मू कश्मीर के विधानसभा सभा ने अनुच्छेद 35A से मिले अधिकारों से अन्य राज्यों के व्यक्तियों पर इन सभी कार्यों पर प्रतिबंध लगा रखा है जो कि स्पष्ट तौर पर संविधान के अनुच्छेद 14, 15, 19(e), और 21 का हनन है। जम्मू कश्मीर से बाहर के व्यक्तियों के साथ साथ विभाजन के बाद और दूसरे राज्यों से आकर बसे व्यक्तियों को भी मूल अधिकारों से वंचित रखा जा रहा है। जिस तरह इस असंवैधानिक कृत्य का दुरुपयोग किया गया है परिणाम स्वरूप यह एक ही देश के नागरिकों को आपस में बाँट रहा है। अनुच्छेद 35A के कार्यान्वन के फलस्वरूप राज्य के लाखों लोग राजनैतिक, आर्थिक और सामाजिक रूप से पक्षपात के शिकार हो रहें हैं साथ ही किसी भी तरह के बराबरी का मौका नहीं मिल पा रहा है।

कैसे असंवैधानिक है 35 A

दरअसल संविधान के अनुच्छेद 368 के अनुसार किसी भी संवैधानिक संशोधन के लिए उसे संसद में पेश करना अनिवार्य है, अर्थात संसदीय कार्यवाही ही किसी भी संवैधानिक संशोधन की संवैधानिक प्रक्रिया है। किन्तु अनुच्छेद 35A के मामले में इसे संसद में पेश ही नहीं किया गया था। 1954 में तत्कालीन राष्ट्रपति डॉ. राजेन्द्र प्रसाद द्वारा भारतीय संविधान में  एक प्रेजिडेंशियल ऑर्डर के द्वारा भारतीय संविधान में अनुच्छेद ३५ ा जोड़ दिया।  यहाँ यह बात गौर करने लायक है कि संवैधानिक परम्परा और नियम यह कहते है कि यदि संविधान में कोई ही नया अनुच्छेद जोड़ा जाएगा तो वह केवल संसद के द्वारा ही जोड़ा जाएगा।  किन्तु भारतीय संसद के समक्ष कभी इस अनुच्छेद को नहीं लाया गया।  उस पर कमाल यह है कि इस अनुच्छेद को संविधान के मुख्य भाग में न रख कर अपेंडिक्स में रखा गया , जिसके चलते बहुत बड़ा वर्ग देश के साथ हुई इस असंवैधानिक धांधली  से अनजान रहा। 

आखिर अब तक कैसे छुपा था 35A

अनुच्छेद 35A का मुद्दा हाल ही के के दिनों  में सुर्ख़ियों में आया है, लेकिन सोचने वाली बात यह है कि जब यह इतना ही गंभीर मुद्दा है तो फिर जनता और बुद्धिजीवियों की बातों से कैसे नदारद था? दरअसल किसी भी आधिकारिक और मौलिक संविधान की किताब में अनुच्छेद 35A खोजने से भी नहीं मिलता, यही कारण है कि यह लोगों की पहुँच से हमेशा दूर बना रहा। अनुच्छेद 35A एक संवैधानिक धोखे की तरह है जिसे देश की जनता को दिया गया है।

 

उदाहरण के तौर पर देखते है जैसे कुछ समय पहले अनुच्छेद 21 से जोड़कर अनुच्छेद 21A के तहत ‘शिक्षा का अधिकार’ संविधान में जोड़ा गया। अनुच्छेद 21A की अवस्थिति संविधान में अनुच्छेद 21 एवं 22 के मध्य रखी गयी.

ठीक इसी तरह संविधान में यदि अनुच्छेद 35 के बाद कोई नया अनुच्छेद  जोड़ा जाना था तो वह अनुच्छेद संविधान में अनुच्छेद 35 A के रूप में अनुच्छेद 35 के बाद रखा जाना चाहिए था।  किन्तु ऐसा नहीं किया गया

 

 अनुच्छेद 35A को 35 एवं 36 के मध्य ना रखकर अपेंडिक्स  में रखा गया ताकि लोगो की नज़र आसानी से इस अनुच्छेद पर ना पड़े।  और ऐसा हुआ भी।  पिछले ६७ वर्षो से इस अनुच्छेद पर कोई छोटी मोटी चर्चा भी नहीं चली.

 

अनुच्छेद 35A देश की जनता के साथ  एक संवैधानिक धोखा है, जिसमें अब जल्द से जल्द सुधार और संशोधन की आवश्यकता है , ताकि देश एवं राज्य के निवासियों  को उनके मूल अधिकार मिलते रहें साथ ही संवैधानिक हनन और दुरुपयोग को रोका जा सके।

 

 

 

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