कानून के जानकारों को भी जानकारी नहीं है, अनुच्छेद 35A की - इस वरिष्ठ अधिवक्ता ने किया था खुलासा।

17 Aug 2017 16:00:14

 

आपकी कभी तबियत ख़राब हो और डॉक्टर के पास जाने के बाद आपको पता चले कि डॉक्टर को बीमारी के बारे में ही नहीं पता तो आप क्या करेंगे ? क्या सोचेंगे ? आपको चिकित्सा शिक्षा और चिकित्सक पर शक़ जरूर होगा। बिल्कुल ऐसा ही कुछ जम्मू कश्मीर पर लागू अनुच्छेद 35A पर कहा जा सकता है। देश के जाने माने वरिष्ठ वकील और 2 बार सांसद रह चुके सत्यपाल जैन ने खुद अपना अनुभव शेयर करते हुए लोगो को यह सारी बात को बताया।

अनुच्छेद 35A संविधान में 1954 में तत्कालीन राष्ट्रपति द्वारा गैरसंवैधानिक तरीके से जोड़ा गया था। संविधान के अनुच्छेद 368 के अनुसार किसी भी संवैधानिक संशोधन के लिए संसद में कार्यवाही जरुरी होती है.  किन्तु 35A को भारतीय संविधान में जोड़ते हुए संसद को अँधेरे में रखा गया जो इस अनुच्छेद के अवैधता का सबसे बड़ा कारण है। नियम के अनुसार राष्ट्रपति आदेश को भी 6 माह के अंदर संसद में पेश करना अनिवार्य है किन्तु आज 63 साल बाद भी संसद में बिना पेश हुए 35A असंवैधानिक रूप से जम्मू कश्मीर में लागू है। सबसे आश्चर्यजनक तथ्य है कि इतना लम्बा समय बीतने के बाद भी यह अनुच्छेद कभी भी देश में बहस तो छोड़िये मामूली चर्चा का विषय नहीं बना।  परिणामस्वरूप इस असंवैधानिक अनुच्छेद के विषय में आम जनता के साथ साथ बौद्धिक वर्ग में जानकारी का अभाव था। 

 

सत्यपाल जैन ने बताया कि जब उन्होंने अपने वकील मित्रों से अनुच्छेद 35A के विषय में चर्चा करना चाही  तो वो हैरान हो गए कि कानून और संवैधानिक जानकारी रखने वाले बड़े-बड़े वकील अनुच्छेद 35A से अनजान हैं। वे जम्मू कश्मीर के विषय में बहुत सी बाते जानते थे किन्तु इस अनुच्छेद से पूर्णता अनभिज्ञ थे.  यह माना जा सकता है कि सभी को सभी संवैधानिक धाराएं और कानून की जानकारी होना अनिवार्य नहीं है।  किन्तु कुछ ऐसे विषय   जिससे राष्ट्र प्रभावित होता हो और जो गंभीर हो उसकी जानकारी ना होना चिंतनीय  है। अनुच्छेद भी ऐसे ही विषयो में से एक  विषय है

वरिष्ठ अधिवक्ता सत्यपाल जैन ने इसका प्रभाव देखते हुए बताया कि जिस तरह एक हाथ से भारत का संविधान देश के सभी नागरिकों को मौलिक अधिकार देता है, उसी के उलट दोनों हाथों से 35A ऐसा अनुच्छेद है जो जम्मू कश्मीर के निवासियों से यह अधिकार छीन लेता है। विशेषकर महिलाओं, दलित समुदाय, वाल्मीकि समुदाय, गोरखा समुदाय और पश्चिमी पाकिस्तान से आये शरणार्थियों से। PRC (स्थायी निवासी पात्रता) के नियम के कारण जम्मू कश्मीर में रहने वाले लोगों के शोषण और दोहरे नियम का बचाव भी 35A करता है। अनुच्छेद 35A आज जम्मू कश्मीर ही नहीं पूरे  देश के लिए खतरनाक है।

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सत्यपाल जी ने सुप्रीम कोर्ट के एक केस का जिक्र करते हुए बताया कि जम्मू कश्मीर में 6 से 7 दशक रहने वाले भारतीय नागरिक आज भी अपने संवैधानिक अधिकारों से वंचित है। 1987 के एक केस की चर्चा करते हुए उन्होंने बताया कि 4 दशक से रहने वाला एक व्यक्ति जो भारत-पाक विभाजन के समय से जम्मू कश्मीर में रह रहा है किन्तु उसके बाद भी उसे जमीन खरीदने का अधिकार नहीं, उसे वोट देने का अधिकार नहीं, इसे पंचायत में शामिल होने का अधिकार नहीं, आखिर यह शोषण नहीं तो और क्या है ? याचिकाकर्ता की याचिका को बताते हुए उन्होंने 35A के दोहरे रवैये को उजागर करते हुए बताया कि पाकिस्तान से आये शरणार्थियों को पूरे  देश में जमीन लेने, व्यापार करने, सरकारी शिक्षा/नौकरी, चुनाव लड़ने का अधिकार मिला है। किन्तु सालों से जम्मू कश्मीर में रह रहे पश्चिमी पाकिस्तान से आये शरणार्थियों को आज तक 35A की वजह से स्थायी निवासी की पात्रता नहीं मिली है। वहीं भारत पाक विभाजन के समय कुछ लोग जो भारत से पाकिस्तान चले गए थे और कुछ समय बाद लौट आये उन्हें भी जम्मू कश्मीर में अधिकार दिए गए हैं। याचिकाकर्ता ने याचिका में कम से कम उतने अधिकार मिलने की मांग भी की थी। सुप्रीम कोर्ट में हुई चर्चा की बात करते हुए उन्होंने बताया कि 35A की वजह से पीड़ित लोगो को पंचायत जैसे चुनाव में चुने जाने ही नहीं बल्कि वोट देने का भी अधिकार नहीं है।

यह सारी बातें वरिष्ठ अधिवक्ता सत्यपाल जैन ने न्यायिक व्यवस्था की खामियां और 35A के वजह से हो रहे दुर्व्यवहार को उजागर करते हुये बताया।

 

उन्होंने 35A की वजह से होने वाले महिला अधिकारों के हनन, गोरखा समुदाय के साथ होने वाले भेदभाव, वाल्मीकि समुदाय की दासता पर भी अपनी बात रखी। उन्होंने कहा कि जब विदेशों में किसी भारतीय पर होने वाले दुर्व्यवहार या हमले पर पूरा देश एकजुट होकर विरोध करता है तो फिर जम्मू कश्मीर में अपने ही लोगों के शोषण पर भी एकजुट होकर 35A के खिलाफ खड़े होना चाहिए।

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