असंवैधानिक अनुच्छेद 35A की शिकार महिलाएं।

23 Aug 2017 15:02:41


Neeraj Mishra

देश भर में इस समय अनुच्छेद 35A पर जमकर बहस हो रही है। अनुच्छेद 35A एक अनैतिक और असंवैधानिक अनुच्छेद है जिसे गलत तरीके से पिछले दरवाज़े से संविधान में शामिल किया गया था।  जिसके बारे में बड़े बड़े कानून के जानकारों को भी जानकारी नहीं है। हम आपके सामने लेखो की एक सीरीज प्रस्तुत कर रहे है जिसके  माध्यम से  हम आपको बताएँगे की इस अनुच्छेद द्वारा कैसे राज्य के कुछ समुदायों के अधिकारों का हनन किया गया और कुछ विशेष परिवारों को अवैध तरीके से फायदा पहुंचाया गया। पेश है इस कड़ी में पहला लेख जो महिलाओं को लेके है

35A का शिकार महिलाएं।

समय–समय  पर देश में महिला अस्मिता और सम्मान के मुद्दों पर हमेशा से  मुखर होकर बातें की जाती रही है और इन मुद्दों को लेकर कई आंदोलन भी हुए हैं। देश के संविधान ने भी सभी के मौलिक और संवैधानिक अधिकारों की रक्षा के लिए कई नियम बनाए है जिनमें महिलाओं के अधिकारों की रक्षा भी प्रमुखता से की गई है। आज ही माननीय उच्चतम न्यायालय ने महिला समानता के इसी आयाम को लेकर सदियों से संघर्षरत मुस्लिम महिलाओं को तीन तलाक़ से मुक्ति दिलाई है।

पूरे देश में महिलाओं को आर्थिक,सामाजिक और शैक्षणिक स्वतन्त्रता देने वाले संविधान में एक अनुच्छेद ऐसा भी है जो एक प्रांत विशेष की महिलाओं के मौलिक अधिकारों का हनन करता आया है और समानता के अधिकार से उनको वंचित रखा है। सुप्रीम कोर्ट में अभी इस मामले को लेकर सुनवाई चल रही है।हम बात कर रहे  असंवैधानिक अनुच्छेद 35A की जिसके तहत जम्मू कश्मीर राज्य की महिलाएं संवैधानिक रूप से शोषित हो रही और खुलेआम समानता के सिद्धांत जैसे मौलिक अधिकार के लिए बने अनुच्छेद 14 का उल्लघंन कर रहा। यह अनुच्छेद असंवैधानिक इसलिए है क्योंकि इसे बिना संसदीय परम्परा का निर्वाहन किए संविधान में जोड़ा गया था। संविधान में अगर एक शब्द भी बदलना होता है तो सम्पूर्ण प्रकिया का पालन करते हुए संविधान संशोधन करना पड़ता है परन्तु ऐसे तो 1954 में महज राष्ट्रपति के आदेश से जोड़ दिया गया था।

संविधान में  लैंगिक समानता के सिद्धांत का उल्लंघन करने वाले इस अनुच्छेद के "राज्य के स्थायी निवासी" वाले प्रावधान की  वजह से  राज्य सरकार इसको ढ़ाल बनाकर ना सिर्फ महिलाओं का बल्कि उनके बच्चो के अधिकारों का भी हनन कर रही है।अनुच्छेद 35A की वजह से अगर कोई महिला राज्य के बाहर के पुरुष से शादी करती है तो उसके स्थायी नागरिक होने के सारे अधिकार खत्म हो जाते है । दुर्भाग्यवश अगर उसे राज्य में पुनः वापस बसना पड़े तो उसके स्थायी नागरिक के अधिकार दुबारा नहीं मिल सकते जिसके कारण न तो उसके बच्चे किसी सरकारी स्कूलों में दाखिला ले सकते और ना ही सरकारी नौकरी के लिए आवेदन कर सकते। मां की संपत्ति पर भी उसका कोई अधिकार नहीं रहता। इसको हम दो महिलाओं के उदाहरणों से समझ सकते हैं। पहली हैं सारा अब्दुल्लाह जो कि  राज्य की सबसे  प्रमुख राजनैतिक परिवारों मे से एक अब्दुल्लाह परिवार के सर्वेसर्वा फारूक अब्दुल्ला की बेटी हैं। सारा अब्दुल्लाह ने सचिन पायलट से शादी की तो उनके राज्य के स्थायी निवासी (पीआरसी) के सारे अधिकार खत्म हो गए। ऐसा ही सुनंदा पुष्कर के साथ हुआ जब उन्होंने एक दक्षिण भारतीय से शादी की थी।

सूबे की मुखिया खुद एक महिला है परन्तु विडम्बना देखिए कि महिलाओं के हक की आवाज सुनना तो दूर वह 35A को हटाने के खिलाफ तिरंगे को कंधा ना देने जैसी धमकियां देने लगी।मीडिया में अक्सर नारी अधिकारों के लिए लड़ने के लिए सुर्खियों में रहने वाले समूहों, तथाकथित मानवाधिकार के ठेकदारों और खुद को प्रगतिशील मानने वाली कुछ महिलाएं अपने शानदार ड्राइंग रूम में इसपर महिलाओं की दशा पर प्रवचन तो दे सकते हैं या ज्यादा से ज्यादा दिल्ली में फोटो खिंचाने के लिए कैंडल मार्च तो कर सकते है परन्तु जम्मू कश्मीर की महिलाओं के अधिकार के विषय में बोलने पर सांप सूंघ जाता है।

 

 

 

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