क्या देश की मुस्लिम महिलाओं की तरह जम्मू कश्मीर की महिलाओं को भी सामाजिक न्याय मिलेगा ?

23 Aug 2017 12:31:08

 

 


शुभम उपाध्याय

 

कल भारत के इतिहास में सबसे बड़ा न्यायिक फैसला आया है। सुप्रीम कोर्ट ने तीन तलाक़ पर तत्काल प्रभाव से 6 माह के लिए प्रतिबंध लगा दिया है। साथ ही सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को तीन तलाक़ पर 6 माह के भीतर संसद द्वारा कानून लाने को भी कहा है। लगभग 1400 वर्षों से चली आ रही सामाजिक कुरीतियों में एक तीन तलाक़ पर प्रतिबंध लगाना एक ऐतिहासिक सामाजिक न्याय है। दुनिया के बड़े इस्लामिक देशों सहित लगभग 20 देशों में तीन तलाक़ पर प्रतिबंध है। अब भारत में भी यह लागू होने से लगभग 9-10 करोड़ मुस्लिम महिलाओं के लिए यह समानता के अधिकार के करीब जाने का एक मील का पत्थर साबित होगा। सुप्रीम कोर्ट के 5 जजों की बेंच ने 3-2 अपना फैसला सुनाते हुए तीन तलाक़ को असंवैधानिक करार दिया है। संविधान के अनुच्छेद 14 (समता का अधिकार) का हवाला देते हुए महिला अधिकारों के हनन का मुद्दा उठाया गया था जिसके बाद सुप्रीम कोर्ट ने मुस्लिम महिलाओं के हक़ में फैसला सुनाया है।

 

अब जब महिला अधिकारों के हनन और समता के अधिकार के हनन के दलील पर तीन तलाक़ को सुप्रीम कोर्ट ने रद्द किया है तो क्या इसी तरह महिला अधिकार का हनन और महिलाओं का संवैधानिक शोषण करने वाले अनुच्छेद 35A और 370 को भी क्यों ना ख़त्म किया जाना चाहिए ? 35A की वजह से आज जम्मू कश्मीर की महिलाएं अपने संवैधानिक अधिकारों से पूर्णतः वंचित है। अनुच्छेद 35A एक गैरसंवैधानिक धारा है जो कि जम्मू कश्मीर के महिलाओं के लिए गले की हड्डी बना हुआ है।

 

मई 1954 में तत्कालीन राष्ट्रपति ने राष्ट्रपति आदेश द्वारा संविधान में 35A को जोड़ा था। संविधान के अनुच्छेद 368 के अनुसार केवल भारत के संसद को संविधान में संशोधन करने का अधिकार है। किसी राष्ट्रपति आदेश को भी 6 माह के भीतर संसद में पेश किया जाना अनिवार्य है अन्यथा वह आदेश स्वतः ही रद्द हो जाता है, किन्तु आज 63 वर्षों के बाद भी यह जम्मू कश्मीर में असंवैधानिक रूप से लागू है। राष्ट्रपति डॉ. राजेन्द्र प्रसाद ने पिछले दरवाजे से 35A को संविधान में जोड़ा, जिससे आज जम्मू कश्मीर की महिलाओं का जीवन एक दोयम दर्जे की तरह हो चुका है।

 

35A राज्य की विधानसभा को स्थायी निवासी स्पष्ट करने का अधिकार देता है। इसी वजह से कोई स्थानीय पुरुष जिसके पास स्थायी निवासी पात्रता (PRC) है वह किसी पीआरसी नहीं रखने वाले महिला से शादी करता है तो उसके पत्नी एवं बच्चों को पीआरसी दी जाती है और उनके अधिकार उनको मिलते हैं किन्तु यही स्थिति किसी महिला के साथ हो तो पूरा का पूरा परिदृश्य ही बदल जाता है। यदि कोई स्थानीय महिला जिसके पास स्थायी निवासी पात्रता (PRC) है वह किसी पीआरसी नहीं रखने वाले पुरुष से शादी करती है तो उसके पति एवं बच्चों को पीआरसी नहीं दी जाती है जिसकी वजह से वो सभी तरह से संवैधानिक अधिकारों से वंचित हो जाते हैं।

 

भारतीय मुस्लिम महिलाओं को सामाजिक और संवैधानिक न्याय देते हुए सुप्रीम कोर्ट ने अब तीन तलाक़ को ख़त्म किया है तो अब जम्मू कश्मीर में भी महिलाओं की स्थिति सुधारने और महिलाओं को सशक्त करने की ओर बढ़ाने के लिए 35A और 370 जैसे धाराओं को भी असंवैधानिक करार देने की आवश्यकता है।

 

 

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