विवादस्पद अनुच्छेद 35A, किसने क्या खोया और क्या पाया।

25 Aug 2017 13:00:55

 

जम्मू कश्मीर के सफाई कर्मचारी

 

Neeraj Mishra

जम्मू कश्मीर के सफाई कर्मचारी जो सबकी गन्दगी साफ करते हैं और गली, मोहल्ले तथा शहरों को साफ सुथरा रखते हैं । परन्तु खुद क़ानूनी गंदगी का शिकार हैं । जी हाँ हम बात कर रहे अनुच्छेद 35A के दूसरे शिकार वाल्मीकि समुदाय की जो इसकी वजह से अपने ही देश में गैर बराबरी का दंश झेल रहे। 35A, किसने क्या खोया और क्या पाया श्रृंखला का दूसरा लेख जिसमे हम वाल्मीकि समुदाय के साथ हो रहे अन्याय को आपके सामने रखेंगे। आप खुद तय कीजिये की अनुच्छेद 35A संवैधानिक गन्दगी है या नहीं। 

35A का शिकार वाल्मीकि समुदाय

भारत का संविधान अपने समावेशी स्वरूप के कारण  संपूर्ण विश्व में सबसे अनूठा और अद्वितीय माना जाता  है। समाज के सभी वर्गो और समुदायों को ध्यान में रखते हुए तथा बिना किसी भेदभाव के सबको एकसमान अधिकार दिए हैं। परन्तु उसी संविधान में समाज के एक तबके के मौलिक अधिकारों का हनन करने वाला एक प्रावधान भी  मौजूद है। हम बात कर रहे अनैतिक और अवैध अनुच्छेद 35A जोकि गलत तरीके से सविधान का हिस्सा बना  और जिसकी वजह से  जम्मू कश्मीर में रहने वाले वाल्मीकि समुदाय के लोग दोयम दर्जे के नागरिक की तरह रहने को मजबूर है।

लगभग शरणार्थियों  जैसा  जीवन जीने  को मजबूर बाल्मीकि समुदाय के लगभग 200 परिवारों को ,जिनकी तादात आज बढ़कर लाखों में पहुंच चुकी है , जम्मू कश्मीर के तत्कालीन प्रधानमंत्री ने एक कैबिनेट आदेश द्वारा पंजाब से 1957 में बुलाया गया था। वाल्मीकि समुदाय के लोग इस शर्त के साथ वहां जाने को तैयार हुए थे कि उन्हें पीआरसी की पात्रता मिलेगी जिसे राज्य सरकार ने मान लिया था परन्तु आज 60 साल भी उनको पीआरसी से वंचित रखा गया है।

पीआरसी राज्य के स्थायी निवासियों को परिभाषित करने वाला एक प्रावधान है जिसके द्वारा राज्य सरकार यह तय करती है कि राज्य में कौन सरकारी नौकरी कर सकता और कौन सरकारी उच्च शिक्षा संस्थानों में पढ़ाई कर सकता है। इसी पीआरसी में एक और प्रावधान है जिसमें सिर्फ पीआरसी धारक ही राज्य में संपत्ति खरीद और बेंच सकता है। जो पीआरसी धारक नहीं है उन्हें उपर्युक्त कोई भी लाभ नहीं मिल सकते।

35A की वजह से 6 दशक बीतने के बावजूद उनकी स्थिति ज्यों की त्यों बनी हुई है। इनके बच्चे स्नातक तो कर सकते परन्तु पीआरसी धारक नहीं होने की वजह से ना ही सरकारी नौकरी कर सकते और ना ही किसी सरकारी महाविद्यालय में एडमिशन ले सकते। उनके पास सफाई कर्मचारी बनने के अलावा और कोई चारा नहीं। सफाई कर्मचारियों के उत्थान के लिए राष्ट्रीय सफाई कर्मचारी वित्त एवं विकास निगम और राज्य के समाजिक न्याय और अधिकारिता मंत्रालय के आपसी सहयोग से योजना चलाई गयी थी किन्तु निवास प्रमाण पत्र ना होने की वजह से वाल्मीकि समुदाय को इस योजना का कोई लाभ नहीं मिल पाया।आज देश भर में एससी एसटी के लोगों के लिए आरक्षण का प्रावधान है परन्तु इस समुदाय को इसका लाभ भी नहीं मिल पाता।अनुच्छेद 35A की एक अजीब बात और है कि लोकसभा चुनाव में तो  बाल्मीकि समुदाय वोट डाल सकता है परन्तु पंचायती और विधानसभा चुनावों में उसके पास वोट डालने का भी अधिकार नहीं है।

 

क्या यह आधुनिक और लोकतांत्रिक व्यवस्था में यह पुरातन काल के गुलामी जैसा नहीं है और इसे खत्म करने के प्रयास नहीं होने चाहिए? पूरे राज्य की गन्दगी को साफ करने वाला यह समुदाय अनुच्छेद 35A जैसी संवैधानिक गंदगी का शिकार हो रहा है। देश में आज स्वच्छता अभियान जैसे अच्छे कार्यक्रम चल रहे है लेकिन इसके इस संवैधानिक गन्दगी को दूर करने के प्रयास भी होने चाहिए ।

 

 

JKN Twitter