अनुच्छेद 35-A: विवादस्पद अनुच्छेद, जिसने जम्मू कश्मीर में नागरिकता के नाम पर छलावा किया

28 Aug 2017 13:07:50

 


Neeraj Mishra

 
अपने सियासी फायदे के लिए राज्य की राजनीतिक पार्टियां और तथाकथित बामपंथी बुद्धिजीवियों के गठजोड़ ने मिलकर अनुच्छेद 370 और 35A के बारे में जितना दुष्प्रचार और भ्रमकता पैदा की है शायद ही किसी और मुद्दे पर की होगी। पहले अस्थायी अनुच्छेद 370 को लेकर देश को काफी बरगलाया और फिर अनुच्छेद 35A को लेकर। हालांकि अनुच्छेद 35A खुद में एक अवैध और असंवैधानिक प्रावधान है जिसे गलत तरीके से संविधान में जोड़ा गया था। सन् 1954 को राष्ट्रपति के आदेश से संसदीय प्रकिया का पालन किए बिना इसे संविधान का हिस्सा बना दिया गया था और आश्चर्य की बात यह है कि संविधान की बहुत सारी किताबों में इसका उल्लेख भी नहीं है। समस्या यहीं से शुरू होती गई और निजी स्वार्थपरता के चलते कुछ लोग इसके बारे में आमजनता को दिग्भ्रमित करते गए।

अनुच्छेद 35A वास्तव में राज्य के कई समुदायों के मौलिक अधिकारों का हनन करता है, जैसे जम्मू कश्मीर की महिलाएं,वाल्मीकि समुदाय और पश्चिमी पाकिस्तानी शरणार्थी और इन सबका जिम्मेदार अनुच्छेद 35A में दिए गए राज्य के स्थायी निवासी वाला प्रावधान है। इन्हीं तथ्यों को छुपाने के लिए बामपंथियो और सियासी पार्टियों मिलकर राज्य के निवासी बनाम नागरिक मुद्दे को हवा देने की शुरुआत की और थोड़ा बहुत अपने मकसद में कामयाब भी रहे हैं। उनके मुताबिक जम्मू कश्मीर राज्य के निवासियों के पास दोहरी नागरिकता होती है एक राज्य की और दूसरी भारत की। अपने तर्क के बचाव में वह अनुच्छेद 35A के राज्य के स्थाई निवासी वाले प्रावधान सहारा लेते हैं। पीड़ितों के अधिकारों को लेकर उच्चतम न्यायालय में अभी सुनवाई चल रही है परन्तु लोगो के सामने इस सच्चाई को भी लाने की जरूरत है कि देश के अन्य राज्यों की तरह जम्मू कश्मीर के लोगों के पास भी सिर्फ एक ही नागरिकता है। कुछ तथ्यों के आधार पर हम यह भ्रम दूर कर सकते हैं।

भारतीय संविधान का दूसरा भाग “नागरिकता” को समर्पित है। इस भाग में 5 से 11 तक अनुच्छेद है जिसमें कहीं भी दोहरी नागरिकता का कोई प्रावधान नहीं लिखा है। इसमें साफ साफ यह लिखा है कि भारत के सभी राज्यो के निवासियों के पास केवल एक ही नागरिकता होगी और वह है भारतीय। भीमराव आंबेडकर ने भी संविधान निर्माण के समय दोहरी नागरिकता को खारिज करते हुए कहा था कि सम्पूर्ण भारत में सिर्फ एकल नागरिकता का ही प्रावधान होगा जो देश की एकता, एक समान कानून बनाने के लिए आवश्यक होगा।अगर हम जम्मू कश्मीर राज्य के कानून को देखे तो उसमे भी भाग 3 के धारा 6 में साफ साफ लिखा है कि पीआरसी का लाभ केवल उन्हीं को मिल सकता है जो भारत के निवासी हैं।

इस बात को हम एक और उदाहरण के माध्यम से समझ सकते हैं पिछले साल जब अलगाववादी नेता सैय्यद अली शाह गिलानी को सऊदी अरब जाना था तो पासपोर्ट ऑफिस में उन्हें अपनी भारतीय नागरिकता होने के प्रमाण पत्र पेश करने पड़े थे। ऐसे ही तमाम अलगाववादी नेता भारतीय पासपोर्ट पर यात्रा करते हैं और भारतीय नागरिक के तौर पर जाने जाते हैं ना कि राज्य के नागरिक के तौर पर।

संविधान शासन व्यवस्था, सामाजिक कार्य तथा सरकारी योजनाओं के ठीक से क्रियान्वयन के लिए राज्य को कुछ अधिकार देता है जिसके द्वारा राज्य अनुच्छेद 16 के तहत ऐसी व्यवस्था कर सकता कि उस राज्य में रहने वाले आर्थिक और सामाजिक रूप से पिछड़े लोगों को सरकारी नौकरियों, अथवा उच्च शिक्षा में आरक्षण दे सके।ऐसा वह राज्य के निवासियों की भलाई के लिए करते हैं। हालांकि संविधान देश के सभी नागरिकों को यह अधिकार भी देता है कि वह देश में कहीं भी रह सकते हैं, नौकरी और पढ़ाई भी कर सकते हैं। इसका आशय यह हुआ कि वह राज्य के निवासियों के लिए ऐसा कर रहा परन्तु नागरिकता भारतीय ही है। राज्य की नागरिकता जैसा कोई प्रावधान नहीं है

अनुच्छेद 35A के निवासियों को परिभाषित करने प्रावधान को जम्मू कश्मीर सरकार ने ढाल बनाकर देश के अन्य नागरिकों को यह अधिकार देने से वंचित रखा है और कहीं ना कहीं पीआरसी (स्थायी निवासी पात्रता) को भारतीय नागरिकता से ऊपर रखने की कोशिश की है। जोकि किसी भी रूप से सही नहीं हैं। इस प्रावधान के अनुसार जिनके पास पीआरसी है केवल वही राज्य में संपत्ति खरीद सकते , नौकरी कर सकते और उच्च शिक्षा संस्थानों में अध्ययन कर सकते हैं। इसी प्रावधान को दुष्प्रचारित करके दोहरी नागरिकता के मुद्दे को अलगाववादी, कुछ फिरकापरस्त लोगो ने हवा दे दी है । राज्य के निवासी भी भारतीय नागरिक ही है। भारत में दोहरी नागरिकता का कोई प्रावधान नही है। जम्मू कश्मीर से लेकर जितनी भी भ्रामक जानकारियां फैलाई जाती है वो केवल देश के आवाम को दिग्भ्रमित करने करने और भड़काने के उद्देश्य से किया जाता है।

 

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