अनुच्छेद 35-A के मुद्दे पर अलगाववादी ताकते अब छटपटाहट में दिख रही है

28 Aug 2017 13:52:20


शुभम उपाध्याय

जम्मू कश्मीर कोआर्डिनेशन कमिटी (JKCC) और जम्मू कश्मीर के वकीलों ने अलग अलग जगहों पर आर्टिकल 35A पर चल रहे संशोधन की मांग के खिलाफ मार्च निकाला है। 35A पर दायर याचिका को सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई के लिए स्वीकार कर लिया है तभी से अलगाववादी विचारधारा के तत्वों में एक छटपटाहट लगातार देखी जा रही है। जेकेसीसी ने 35A को रद्द करने या किसी भी तरह के बदलाव करने के खिलाफ में मार्च किया है। साथ ही अलगाववादी नेताओं ने 29 अगस्त को कश्मीर बंद करने का भी ऐलान किया है जिस दिन 35A पर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई होनी है। वहीं दूसरी ओर जम्मू कश्मीर के वकीलों ने बार एसोसिएशन के बैनर तले 35A का विरोध किया है। राज्य के अलग अलग शहरों में अलग अलग नेतृत्व के तहत यह मार्च निकाला गया है। जहाँ तक कथित तौर पर इन वकीलों के जेकेएलएफ के नेताओं से जुड़े होने की बाते भी आ रही है।

अब जब जेकेएलएफ समर्थित लोग 35A का विरोध करे तो हमें अचंभित नहीं होना चाहिए। जम्मू कश्मीर लिबरेशन फ्रंट (जेकेएलएफ) का मुखिया मुख्य अलगाववादी नेता यासीन मालिक है। 35A से जम्मू कश्मीर के अलगाववादी और क्षेत्रीय नेताओं को अपनी राजनीति चमकाने का मौका मिलता है। यह विरोध भी उन जैसो का ही है जिन्होंने हमेशा 35A से अपना फायदा निकाला है। जम्मू कश्मीर में एक तबका ऐसा है जो आज भी 35A की वजह से अपने अधिकारों से वंचित हैं वहीं दूसरी ओर ऐसे अलगाववादी तत्व लोगो का शोषण कर अपनी जेब भरने में लगे हुए हैं।

कुछ लोग कह रहें हैं कि 35A हटेगा तो राज्य में भूचाल आ जायेगा लेकिन सत्य तो यह है कि 35A हटेगा तो इन जैसे भ्रष्टाचारियों और अलगाववादियों की जिंदगी में भूचाल आ जायेगा। और ये लोग इस बात को बखूबी जानते हैं कि 35A की चर्चा होने से इनकी काली करतूते बाहर आएंगी, इनके पाप बाहर आएंगे इसी वजह से अलगाववादी तत्व अब इसके विरोध में एक होते दिख रहें हैं।
संविधान में 1954 में तत्कालीन राष्ट्रपति डॉ राजेंद्र प्रसाद द्वारा अनुच्छेद 35A को जोड़ा गया था। संविधान के अनुच्छेद 368 के तहत कोई भी संवैधानिक संशोधन केवल संसद कर सकती है लेकिन राष्ट्रपति ने संसद के अधिकारों का हनन करते हुए अपने आदेश द्वारा इसे संविधान में जोड़ा था। नियम अनुसार किसी राष्ट्रपति आदेश को भी 6 माह के भीतर संसद में पेश करना अनिवार्य है अन्यथा वह आदेश रद्द हो जाता है। किन्तु आज 63 साल के बाद भी अनुच्छेद 35A जम्मू कश्मीर में जस का तस गैरसंवैधानिक रूप से लागू है। और यह जम्मू कश्मीर सहित देश के निवासियों को आपस में बाँट रहा है।


अनुच्छेद 35-A राज्य की विधानसभा को मनमाने तरीके से जम्मू कश्मीर के “स्थायी निवासी” स्पष्ट करने का अधिकार देता है। यही स्थायी निवासी पात्रता आज जम्मू कश्मीर के लाखों लोगो के लिए परेशानी का सबब बना हुआ है। अनुच्छेद 35-A संविधान के अनुच्छेद 14, 15, 19, 21 का सीधा हनन करता है। किसी भी भारतीय नागरिक को जम्मू कश्मीर की स्थायी निवासी पात्रता नहीं होने पर उसके मूल अधिकारों से वंचित कर दिया जाता है। गैर राज़्यों के अलावा जम्मू कश्मीर की महिलाएं, वाल्मीकि समाज, गोरखा समुदाय और पश्चिमी पाकिस्तान से आये लाखों शरणार्थी जिसमें 80% दलित समुदाय के लोग हैं, आज भी शोषित हैं। इन सबका कारण है अनुच्छेद 35-A

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