महाराजा हरि सिंह और नेहरु-अब्दुल्ला की जुगलबन्दी

21 Sep 2017 11:19:51



डा० कुलदीप चन्द अग्निहोत्री


देश की नई प्रशासनिक व्यवस्था में जम्मू कश्मीर रियासत की भागीदारी अंग्रेजों के चले जाने के लगभग दो महीने बाद 26 अक्तूबर 1947 को हुई। वह भी तब जब रियासत पर कबायलियों के रुप में पाकिस्तानी सेना ने आक्रमण कर दिया और उसके काफ़ी हिस्से पर कब्जा कर लिया। महाराजा ने तब अधिमिलन पत्र पर हस्ताक्षर किये। बाद में इतिहास में यही प्रचारित किया गया कि महाराजा हरि सिंह भारत में शामिल होने के इच्छुक ही नहीं थे और जम्मू कश्मीर को आजाद देश बनाना चाहते थे। इसे भारतीय इतिहास की त्रासदी ही कहा जायेगा कि महाराजा ने भी कभी जनता के सामने अपना पक्ष रखने की कोशिश नहीं की। कर्ण सिंह के अपने शब्दों में ही,"उन्होंने गरिमापूर्ण मौन धारण कर लिया। उनका एक व्क्तव्य सरकार को असहज कर देता " (. Harbans Singh, Maharaja hari Singh -The troubled years, speech of dr Karan Singh p -g )     सरकार तो शायद असहज न होती लेकिन हरि सिंह को लेकर दोषारोपण कर रहे लोगों के चेहरे से शायद नक़ाब उतर जाते। शेख अब्दुल्ला ने भी बाद में अपनी आत्मकथा आतिश-ए-चिनार के माध्यम से महाराजा पर और ज्यादा दोषारोपण किया।
                 

इसमें अब कोई शक नहीं कि ब्रिटेन की सरकार हर हालत में जम्मू कश्मीर रियासत पाकिस्तान को देना चाहती थी। लेकिन उनके दुर्भाग्य से भारत स्वतंत्रता अधिनियम 1947 के माध्यम से वह केवल ब्रिटिश भारत का विभाजन कर सकती थी, भारतीय रियासतों का नहीं। महाराजा हरि सिंह पर पाकिस्तान में शामिल होने के लिये दबाव डालने के लिये लार्ड माँऊटबेटन 15 अगस्त से दो मास पहले श्रीनगर भी गये थे। महाराजा पाकिस्तान में शामिल होने लिये तैयार नहीं थे और अंतिम दिन तो उन्होंने दबाव से बचने के लिये माँऊंटबेटन से मिलने से ही इन्कार कर दिया था। महाराजा कहीं रियासत में भारत की नई संघीय सांविधानिक व्यवस्था स्वीकार न कर लें, इसको रोकने के लिये ब्रिटेन ने पंद्रह अगस्त तक भारत और पाक की सीमा ही घोषित नहीं की और अस्थाई तौर पर गुरदासपुर ज़िला पाकिस्तान की सीमा में घोषित कर दिया। इस तकनीक के बहाने महाराजा पर पाकिस्तान में शामिल होने के लिये परोक्ष दबाव ही डाला जा रहा था, पर वे इस दबाव में नहीं आये। लेकिन सीमा आयोग की रपट को लार्ड माँऊटबेटन बहुत देर तक तो दबा नहीं सकते थे। जब सीमा आयोग की रपट आई तो शकरगढ़ तहसील को छोडंकर सारा गुरदासपुर ज़िला भारत में था। इस प्रकार जम्मू कश्मीर रियासत सड़क मार्ग से पूर्वी पंजाब से जुड़ गई। हरि सिंह एक ओर से निश्चिंत हो गये।
                

इस पृष्ठभूमि में इस प्रश्न पर विचार करना आसान होगा कि महाराजा ने रियासत की सांविधानिक व्यवस्था को देश की नई संघीय सांविधानिक व्यवस्था में समाहित करने में इतनी देर क्यों की? इस मरहले पर नेहरू और शेख अब्दुल्ला की भूमिका सामने आती है। ब्रिटिशकाल में रियासतों में काँग्रेस ने अपनी शाखायें नहीं खोली थीं। इसका एक कारण यह था कि इन रियासतों में शासक भारतीय थे, और कांग्रेस का संघर्ष विदेशी अंग्रेज़ शासकों के ख़िलाफ़ था न कि भारतीय शासकों के ख़िलाफ़। इसके विपरीत मुस्लिमलीग की शाखा, मुस्लिम बहुल रियासतों यथा हैदराबाद, भोपाल और जूनागढ को छोड़कर शेष जहाँ तक संभव था, प्राय: प्रत्येक रियासत में थी। क्योंकि मुस्लिम लीग की लड़ाई विदेशी अंग्रेज़ शासकों के साथ नहीं थी बल्कि उसकी लड़ाई का उद्देष्य भारत में समाप्त हो चुके विदेशी मुग़ल साम्राज्य को पुनः स्थापित करना था। इसलिए रियासतों के हिन्दू राजा उनके निशाने पर थे। रियासतों में राजाओं के शासन के खिलाफ़ लोगों ने प्रजा मंडल के नाम से संगठन बनाये हुये थे जिनका संघर्ष का अपना इतिहास है। अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय से पढ़ कर आये  शेख अब्दुल्ला ने श्रीनगर में प्रजा मंडल के नाम से नहीं बल्कि मुस्लिम कान्फ्रेंस के नाम से आन्दोलन शुरू किया जो मुस्लिम लीग की तर्ज़ पर रियासत के हिन्दू राजा के ख़िलाफ़ संघर्ष था। यह लडाई राजाशाही के खिलाफ़ न होकर डोगरों के खिलाफ़ थी। शेख अब्दुल्ला का नारा राजाशाही का नाश नहीं था बल्कि डोगरो कश्मीर छोड़ो था। मतलब साफ था कि डोगरों का राज कश्मीर से समाप्त होना चाहिये, राज्य के अन्य संभागों में रहता है तो शेख को कोई एतराज नहीं था। वैसे तो अब्दुल्ला चाहते तो मुस्लिम लीग ही बना सकते थे लेकिन मुस्लिम नेतृत्व को लेकर अब्दुल्ला और जिन्ना में जिस कदर टकराव पैदा हो गया था उसमें यह संभव ही नहीं था। जिन्ना अपने आप को पूरे दक्षिण एशिया के मुस्लमानों का नेता मानने लगे थे। उनकी नज़र में शेख अब्दुल्ला की हैसियत स्थानीय नेता से ज्यादा नहीं थी। ब्रिटिश सरकार भी जिन्ना के पक्ष में ही थी। उधर अब्दुल्ला नेतृत्व में दोयम दर्जा स्वीकार करने को तैयार नहीं थे। लेकिन शेख अब्दुल्ला को डोगरों के खिलाफ़ अपनी इस लड़ाई में किसी न किसी की सहायता तो चाहिये ही थी। जिन्ना के कट्टर विरोधी जवाहर लाल नेहरू से ज्यादा उपयोगी भला इस मामले में और कौन हो सकता था? लेकिन उसके लिये ज़रूरी था कि अब्दुल्ला पंथ निरपेक्ष और समाजवादी प्रगतिवादी शक्ल में नज़र आते।
                   

इस मौके पर साम्यवादी तत्वों की अब्दुल्ला के साथ संवाद रचना महत्वपूर्ण है। साम्यवादी नहीं चाहते थे कि रियासत का भारत में विलय हो। रियासत की सीमा रूस और तिब्बत के साथ लगती है और साम्यवादी पार्टी चीन के साथ मिल कर ही उन दिनों भारत में सशस्त्र क्रांति के सपने देख रही थी। उनकी दृष्टि में इस क्रांति की शुरूआत कश्मीर से ही हो सकती थी। इसके लिये ज़रूरी था या तो कश्मीर आजाद रहता या फिर शेख अब्दुल्ला के कब्जे में, क्योंकि शेख़ अब्दुल्ला का रास्ता भी अन्ततः आज़ादी की ओर ही खुलता था। तभी साम्यवादियों का क्रांति का सपना पूरा हो सकता था। वैसे भी साम्यवादी पूरे हिन्दोस्तान को वििभन्न राष्ट्रियताओं का जमावडा ही मानते थे और उनका मानना था कि अलग अलग राष्ट्रीयताओं के लोगों को देश से अलग होने का भी अधिकार है। इसी सोच के चलते वे कश्मीर की आजादी के सबसे बडे पक्षधर थे। शेख अब्दुल्ला और साम्यवादियों ने इस प्रकार एक दूसरे का प्रयोग अपने अपने हित के लिये करना शुरू किया। शेख अब्दुल्ला को तो इसका तुरन्त लाभ हुया। नेहरू की दृष्टि में अब्दुल्ला समाजवादी बन गये जबकि श्रीनगर की मस्जिद में वे िहन्दुओं के खिलाफ़ पहले की तरह ही जहर उगलते रहे। इस प्रकार जम्मू कश्मीर में नेहरु, महाराजा हरि सिंह के ख़िलाफ़ शेख़ अब्दुल्ला के जोड़ीदार बने। भारत विभाजन के समय, जम्मू कश्मीर की सत्ता हथियाने में शेख़ अब्दुल्ला को अपने इस जोड़ीदार से बहुत फ़ायदा हुआ।

               

भारत विभाजन से कुछ महीने पहले ही कश्मीर की सीमा पर खडे होकर नेहरु ने कश्मीर के राज्यपाल को कहा था,” तुम्हारा राजा कुछ दिन बाद मेरे पैरों पड कर गिडगिडायेगा।” शायद महाराजा हरि सिंह का कसूर केवल इतना था कि 1931 में ही उन्होंने लंदन में हुई गोल मेज कान्फ्रेंस में ब्रिटेन की सरकार को कह दिया था कि,”  हम सब भारतीय हैं और भारतीय होने के नाते अपनी जन्मभूमि भारत, जिसने हमें जन्म दिया है और पाला पोसा है, उसके सम्मान के लिए शेष भारतीयों के साथ हैं।” उस वक्त वे अपनी रियासत के राजा होने के साथ साथ एक आम गौरवशाली हिन्दुस्तानी के दिल की आवाज की अभिव्यक्ति भी कर रहे थे। हरि सिंह ने तो उसी वक्त अप्रत्यक्ष रुप से बता दिया था कि भारत की सीमाएं जम्मू कश्मीर तक फैली हुई हैं। लेकिन पंडित नेहरु 1947 में भी इसे स्वीकार करने को तैयार नहीं थे। वे अडे हुये थे कि जम्मू कश्मीर को भारत का हिस्सा तभी माना जायेगा जब महाराजा हरि सिंह सत्ता शेख अब्दुल्ला को सौंप देंगे। ऐसा और किसी भी रियासत में नहीं हुआ था। शेख इतनी बडी रियासत में, केवल कश्मीर घाटी में सक्रिय थे। वहाँ भी कश्मीरी भाषा बोलने वाले लोगों में से केवल सुन्नी मुसलमानों का प्रतिनिधित्व करते थे। बिना किसी चुनाव या लोकतांत्रिक पद्धति से शेख को सत्ता सौंप देने का अर्थ, रियासत में एक नई तानाशाही स्थापित करना ही था। नेहरु तो अधिमिलन की बात हरि सिंह की सरकार से करने के लिये ही तैयार नहीं थे। अधिमिलन पर निर्णय लेने के लिये वे केवल शेख को सक्षम मानते थे, जबकि वैधानिक व लोकतांत्रिक दोनों दृष्टियों से यह गलत था। महाराजा इस शर्त को मानने के लिये किसी भी तरह तैयार नहीं थे। नेहरू का दुराग्रह इस सीमा तक बढ़ा कि उन्होंने अब्दुल्ला की खातिर कश्मीर को भी दाँव पर लगा दिया। उस वक़्त रियासती मंत्रालय के सचिव वी.पी.मेनन के अनुसार, "हमारे पास उस समय कश्मीर की ओर ध्यान देने का समय ही नहीं था।"  दिल्ली के पास महाराजा से बात करने का समय ही नहीं था और नेहरु, शेख के सिवा किसी से बात करने को तैयार नहीं थे। शायद इसी अनिर्णय के कारण अफ़वाहें फैलना शुरु हुईं कि महाराजा तो जम्मू कश्मीर को आज़ाद देश बनाना चाहते हैं। कहना न होगा कि सरकारी इतिहासकारों ने इन अफ़वाहों को हाथों हाथ लिया और इसे ही इतिहास घोषित करने में अपना तमाम कौशल लगा दिया। इतना ही नहीं जब पाकिस्तान ने रियासत पर हमला कर दिया और उसका काफ़ी भूभाग क़ब्ज़े में कर लिया तब भी पंडित नेहरू रियासत का अधिमिलन भारत में स्वीकारने के लिये तैयार नहीं हुये। उनकी शर्त राष्ट्रीय संकट की इस घडी में भी वही थी कि पहले सत्ता शेख अब्दुल्ला को सौंप दो तभी जम्मू कश्मीर का भारत से अधिमिलन स्वीकारा जायेगा और सेना भेजी जायेगी। यही कारण था कि महाराजा को अधिमिलन  पत्र के साथ अलग से यह भी लिख कर देना पड़ा कि अब्दुल्ला को रियासत का आपातकालीन प्रशासक बनाया जा रहा है। एक बार हाथ में सत्ता आ जाने के बाद उसने क्या क्या नाच नचाये, यह इतिहास सभी जानते हैं। अब्दुल्ला ने नेहरू के साथ मिल कर महाराजा हरि सिंह को रियासत से ही निष्कासित करवा दिया और मुम्बई में गुमनामी के अन्धेरे में ही उनकी मृत्यु हुई।


To Be continued

 

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