महाराजा हरि सिंह और नेहरु-अब्दुल्ला की जुगलबन्दी -भाग 2

21 Sep 2017 12:03:38

 


डा० कुलदीप चन्द अग्निहोत्री

महाराजा हरि सिंह एक साथ तीन तीन मोर्चों पर अकेले लड रहे थे। पहला मोर्चा भारत के गवर्नर जनरल और ब्रिटिश सरकार का था जो उन पर हर तरह से दबाव ही नहीं बल्कि धमका भी रहा था कि रियासत को पाकिस्तान में शामिल करो। दूसरा मोर्चा मुस्लिम कान्फ्रेस और पाकिस्तान सरकार का था जो रियासत को पाकिस्तान में शामिल करवाने के लिये महाराजा को बराबर धमका रही थी और जिन्ना 26 अक्तूबर 1947 को ईद श्रीनगर में मनाने की तैयारियों में जुटे हुये थे। तीसरा मोर्चा जवाहर लाल नेहरु और उनके साथियों का था जो रियासत के भारत में अधिमिलन को तब तक रोके हुये थे, जब तक महाराजा शेख के पक्ष में गद्दी छोड़ नहीं देते। नेहरु ने तो यहाँ तक कहा कि यदि पाकिस्तान श्रीनगर पर भी क़ब्ज़ा कर लेता है तो भी बाद में हम उसको छुड़ा लेंगे, लेकिन जब तक महाराजा शेख की ताजपोशी नहीं कर देते तब तक रियासत का भारत से अधिमिलन  नहीं हो सकता। इसे त्रासदी ही कहा जायेगा, जब महाराजा अकेले इन तीन तीन मोर्चों पर लड रहे थे तो उनका अपना परिवार भी उनके साथ नहीं था।

महाराजा हरि सिंह ने माँऊटबेटन के प्रयासों को असफल करते हुये रियासत को भारत में मिलाने के लिये जो संघर्ष किया उसे इतिहास में से मिटाने का प्रयास हो रहा है। जून 1947 में लार्ड माऊंटबेटन का श्रीनगर जाकर हरि सिंह से बात करने को इतिहास में जिस गलत तरीके से लिखा गया है और अभी भी पेश किया जा रहा है, उसे पढ कर दुख होता है। माऊंटबेटन के ब्रिटिश जीवनीकार लिखें यह समझ में आता है, लेकिन भारतीय इतिहासकार भी उसी की जुगाली कर रहे हैं। माऊंटबेटन हरि सिंह के पुराने परिचित थे। वे विभाजन पूर्व हरि सिंह को समझाने के लिये श्रीनगर गये। शासकीय इतिहास के अनुसार उन्होंने हरि सिंह को कहा कि 15 अगस्त से पहले पहले आप किसी भी राज्य, भारत या पाकिस्तान में शामिल हो जाओ। यदि 15 अगस्त तक किसी भी देश में शामिल न हुये तो तुम्हारे लिये समस्याएं पैदा हो जायेंगीं। ऊपर से देखने पर यह सलाह बहुत ही निर्दोष लगती है। इस पृष्ठभूमि में कोई भी कह सकता है कि रियासत में जो घटनाक्रम हुआ उस का कारण महाराजा का 15 अगस्त तक निर्णय न ले पाना ही था। लेकिन यह उतना सच है जितना दिखाई देता है। छिपा हुआ सच कहीं ज्यादा कष्टकारी है। माऊंटबेटन भारत सरकार से यह आश्वासन लेकर गये थे कि यदि महाराजा हरि सिंह पाकिस्तान में शामिल होते हैं तो उनको कोई एतराज नहीं होगा। परोक्ष रुप से माऊंटबेटन हरि सिंह को गारंटी दे रहे थे कि पाकिस्तान में शामिल होने के लिये भारत सरकार से डरने की जरुरत नहीं है।  माऊंटबेटन स्पष्ट ही रियासत को पाकिस्तान में शामिल करवाने के लिये महाराजा की घेराबन्दी कर रहे थे। जब हरि सिंह ने उस घेराबन्दी को तोड दिया तो माऊंटबेटन ने गुस्से में हरि सिंह के बारे में आपत्तिजनक भाषा का प्रयोग किया। वैसे तो माऊंटबेटन का यह क्रोध ही हरि सिंह की भारत भक्ति का सबसे बडा प्रमाण पत्र है। यदि नेहरु इस ज़िद पर न अडे रहते कि अधिमिलन से पूर्व सत्ता शेख अब्दुल्ला को सौंपी जाये, तो रियासत के भारत में अधिमिलन की संभावना 15 अगस्त 1947 से पहले ही हो सकती थी और रियासत का इतिहास दूसरी तरह लिखा जाता। महाराजा हरि सिंह ने तो पूरे का पूरा राज्य भारत को दिया था, लेकिन नेहरु ने उतना ही रखा जितना शेख अब्दुल्ला को अपना राजनैतिक वर्चस्व बनाये रखने के लिये चाहिये था,बाक़ी सारा युद्ध विराम की घोषणा के हवाले कर दिया।

महाराजा हरि सिंह शासन के अंतिम दिनों में दो लोग ही निर्णायक रहे। पहले शेख़ मोहम्मद अब्दुल्ला और दूसरे उनके अपने सुपुत्र डा० कर्ण सिंह। शेख़ मोहम्मद अब्दुल्ला ने पंडित नेहरु को, जो मूल रुप से कश्मीरी थे, अपने साथ मिला कर महाराजा हरि सिंह को अपमानित करने में कोई कसर नहीं छोड़ी। अब्दुल्ला ने अपनी पार्टी नैशनल कान्फ्रेंस के माध्यम से कश्मीर घाटी में से हरि सिंह के शासन को समाप्त करने का आन्दोलन छेड़ रखा था। इतना तो कोई भी समझ सकता था कि अंग्रेज़ों के चले जाने के बाद पूरे देश में एक समान सांविधानिक शासन व्यवस्था लागू करने की ज़ोर पकड़ माँग के चलते देर सवेर राजशाही शासन प्रणाली को जाना ही होगा। जम्मू कश्मीर देश की नई एकीकृत संघीय सांविधानिक व्यवस्था में शामिल हो गया था। देश भर की बाक़ी रियासतों में से भी राजशाही समाप्त हो रही थी और बड़ी रियासतों के शासकों को नई सांविधानिक व्यवस्था के अन्तर्गत उनकी रियासतों का राज प्रमुख नियुक्त कर दिया गया था। इन रियासतों को नई सांविधानिक व्यवस्था में बी श्रेणी के राज्य कहा गया था। महाराजा हरि सिंह भी इसी व्यवस्था के तहत जम्मू कश्मीर राज्य के राजप्रमुख बने थे। लेकिन शेख़ मोहम्मद अब्दुल्ला का उद्देश्य तो महाराजा हरि सिंह को अपमानित करना था।  उन महाराजा हरि सिंह को, जिन्होंने नेहरु के आग्रह पर बिना कोई चुनाव करवाये शेख़ को रियासत का प्रधानमंत्री बना दिया था,वह भी उन मेहरचन्द महाजन को हटा कर जिनकी योग्यता की धाक सारे देश में थी।

ध्यान रखना होगा कि महाराज हरि सिंह का शेख़ मोहम्मद अब्दुल्ला से कोई व्यक्तिगत विरोध नहीं था। यदि व्यक्तिगत विरोध होता तो शायद उसका परिणाम कुछ और निकलता। जिन दिनों हरि सिंह राज्य के शासक थे, उन दिनों किसी ने सुझाव दिया कि शेख़ अब्दुल्ला आपका इस प्रकार विरोध कर रहा है, उसका खात्मा क्यों नहीं करवा देते ? राजशाही में, उन दिनों रियासतों में यह आम बात होती थी। हरि सिंह ने उत्तर दिया था, यह मुद्दों की लड़ाई है और इसे इसी धरातल पर लड़ना चाहिये। (.   Christopher Thomas, Faultline kashmir, p 67 ) शेख़ अब्दुल्ला भारत गणतंत्र के भीतर एक नया जम्मू कश्मीर गणतंत्र बनाने के प्रयासों में जुटे हुये थे। उनका चिन्तन पंथ निरपेक्ष न होकर, कश्मीर घाटी को मुसलमानों का राज्य बनाने पर आधारित था। वे चाहते थे कि राज्य की सुरक्षा की ज़िम्मेदारी भारत उठाये और घाटी व्यवहारिक रुप में इस्लामी राज्य बने। इसके विपरीत महाराजा हरि सिंह वर्तमान परिस्थियों में भारत में समान शासन व्यवस्था के पक्षधर थे और इस अभियान में जम्मू कश्मीर को भी शामिल कर चुके थे। इस प्रकार 1947 में महाराजा हरि सिंह एक पक्ष था, जिसे सरदार पटेल का समर्थन प्राप्त था और शेख़ अब्दुल्ला व नेहरु का दूसरा पक्ष था। जैसा कि उपर लिखा जा चुका है जब निर्णय की घड़ी आई तो कर्ण सिंह, अपने पिता का साथ छोड़ कर नेहरु-शेख़ खेमे में शामिल हो गये। क्योंकि कर्ण सिंह के अनुसार अब महाराजा हरि सिंह भूतकाल थे और नेहरु भविष्यकाल। कर्ण  सिंह को अब अपने राजनैतिक जीवन के भविष्यकाल को सुरक्षित करना था। यह महाराजा हरि सिंह पर पहला घातक प्रहार था जो उनके जीवन काल में उन्हीं के सुपुत्र द्वारा किया गया था।
               

लेकिन क्या नेहरु केवल व्यक्तिगत कारणों से ही हरि सिंह का विनाश की सीमा तक विरोध करते रहे और शेख़ अब्दुल्ला को आगे बढ़ाते रहे?  इसके उत्तर के लिए विभाजन के उपरान्त, नेहरु के मनोविज्ञान को समझ लेना जरुरी हैं। दरअसल 1947 में जम्मू कश्मीर रियासत के शासक महाराजा हरि सिंह ने पाकिस्तान में शामिल होने के लिये जिन्ना व लार्ड माऊंटबेटन के तमाम प्रत्यक्ष एवं परोक्ष दबावों को ठुकराते हुये, देश की नई संघीय सांविधानिक व्यवस्था में शामिल होने का निर्णय किया था। लेकिन पंडित नेहरु यह श्रेय हरि सिंह को देने के लिये किसी भी तरह तैयार नहीं थे। उन्होंने इसका सारा श्रेय, रियासत के पाँच विभिन्न संभागों में से एक, कश्मीर की नैशनल कान्फ्रेंस पार्टी के अध्यक्ष शेख़ मोहम्मद अब्दुल्ला को दिया। महाराजा हरि सिंह के प्रति उनका विरोध इतना ज़्यादा था कि उनसे किये गये अपने पत्र व्यवहार में उन्होंने वाकायदा लिखा भी कि जम्मू कश्मीर के इस पूरे मामले में आप का कोई अस्तित्व नहीं है। प्रश्न यह है कि आख़िर वे इस सांविधानिक अधिमिलन का श्रेय शेख़ अब्दुल्ला को क्यों देना चाहते थे ? उसके पीछे इतिहास है। जिन्ना ने इस आधार पर पाकिस्तान का प्रश्न उठाया था कि हिन्दुस्तान में मुसलमान और हिन्दू एक साथ नहीं रह सकते, इसलिये मुसलमानों के लिये भारत का एक हिस्सा अलग कर देना चाहिये। नेहरु राजनीति के क्षेत्र में तो जिन्ना और उसके ब्रिटिश सहयोगियों को हरा नहीं सके, उन्होंने उनकी विभाजन की माँग को अन्ततः स्वीकार कर लिया। लेकिन इस विभाजन से पैदा हुये अपने भीतरी अपराध बोध से निजात पाने के लिये, उन्हें जम्मू कश्मीर एक अच्छा अवसर दिखाई देने लगा। यदि जम्मू कश्मीर देश की सांविधानिक व्यवस्था में शामिल होने का निर्णय कर लेता है तो नेहरु दुनिया भर को यह बता सकेंगे कि जिन्ना झूठ बोलता था, मुसलमान तो अपनी इच्छा से भारत में रहना चाहते हैं, पाकिस्तान में शामिल नहीं होना चाहते। नेहरु का यह थीसिस तभी पूरा हो सकता था यदि भारत में अधिमिलन की इच्छा जम्मू कश्मीर का कोई मुस्लिम नेता करे और उसी की माँग पर रियासत के भारत में अधिमिलन को स्वीकार किया जाये। नेहरु को विश्वास था कि रियासत के पाँच संभागों ( जम्मू,लद्दाख,कश्मीर,गिलगित,बल्तीस्तान ) में से एक, कश्मीर के नेता शेख़ अब्दुल्ला ऐसा कर सकते हैं। नेहरु स्वयं भी कश्मीरी थे, इसलिये उनकी शेख़ के साथ स्वाभाविक मित्रता भी थी। नेहरु का यह भी विश्वास था कि शेख़ कश्मीर के मुसलमानों के एक मात्र नेता हैं और उन्हीं के कारण कश्मीर के मुसलमान भारत में अधिमिलन के लिये तैयार हो सकते हैं। शेख़ के बारे में नेहरु की पहली अवधारणा ठीक हो सकती थी लेकिन दूसरी ग़लत थी।

To be continued

 

 

 

JKN Twitter